जर्जर स्वास्थ्य केंद्र, बिना डिग्री के डॉक्टर

कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जहां जंगली जानवर घूमते हों, अस्पतालों के बारे में डर, फ़ोन की ख़राब कनेक्टिविटी — ये सभी चीज़ें इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि बिहार के बड़गांव ख़ूर्द गांव की गर्भवती महिलाएं घर पर ही प्रसव कराएं

15 फरवरी, 2021 | अनुभा भोंसले और विष्णु सिंह

अल्मोड़ा में, प्रसव के लिए पहाड़ों में घूमना

पिछले साल, उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की रानो सिंह ने पहाड़ी मार्ग से अस्पताल जाते हुए, बीच रास्ते में ही बच्चे को सड़क पर जन्म दिया। यह एक ऐसा इलाक़ा है, जहां के भू-भाग और ख़र्चे पहाड़ी बस्तियों में रहने वाली बहुत सी महिलाओं को घर पर ही बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करते हैं

11 फरवरी, 2021 | जिज्ञासा मिश्रा

जबरन नसबंदी, संवेदनहीन मृत्यु

राजस्थान के बांसी गांव की भावना सुथार की पिछले साल एक ‘शिविर’ में नसबंदी प्रक्रिया के बाद मृत्यु हो गई, जहां नियमों का उल्लंघन करते हुए उन्हें विकल्पों पर विचार करने का समय नहीं दिया गया था। उनके पति दिनेश को अभी भी न्याय की तलाश है

20 नवंबर, 2020 | अनुभा भोंसले

‘नौ महीने की गर्भावस्था में भी ग्राहक आते हैं’

चार बार गर्भपात, शराबी पति, और कारखाने की नौकरी चली जाने के बाद दिल्ली स्थित हनी ने पांचवीं बार गर्भवती होने पर यौनकर्मी बनने का फ़ैसला किया और तब से उन्हें एसटीडी है। अब, लॉकडाउन में वह कमाने के लिए संघर्ष कर रही हैं

15 अक्टूबर, 2020 | जिज्ञासा मिश्रा

‘मेरी पत्नी संक्रमित कैसे हो गई?’

नसबंदी के बाद संक्रमण हो जाने के कारण, राजस्थान के दौसा जिले की 27 वर्षीय सुशीला देवी को तीन वर्षों तक दर्द झेलना पड़ा, अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े, क़र्ज़ बढ़ता गया और अंत में उन्हें अपना गर्भाशय निकलवाना पड़ा

3 सितंबर, 2020 | अनुभा भोंसले और संस्कृति तलवार

‘डॉक्टर का कहना है कि मेरी हड्डियां खोखली हो चुकी हैं’

जीवन भर बीमारी और कई सर्जरी के बाद, पुणे जिले के हडशी गांव की बिबाबाई लोयरे झुक गई हैं। फिर भी, वह खेती का काम और अपने लक़वाग्रस्त पति की देखभाल करना जारी रखे हुई हैं

2 जुलाई, 2020 | मेधा काले

‘मेरा काट [गर्भाशय] बाहर निकलता रहता है’

महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में बाहर निकले गर्भाशय वाली भील महिलाओं की पहुंच चिकित्सा सुविधाओं तक नहीं है। सड़क या मोबाइल कनेक्टिविटी न होने के कारण संघर्षरत इन महिलाओं को कठिन प्रसव और कष्टदायी दर्द सहना पड़ता है

17 जून, 2020 | ज्योति शिनोली

‘डॉक्टरों ने गर्भाशय निकलवाने की सलाह दी थी’

मानसिक रूप से अक्षम महिलाओं के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन अक्सर उन्हें अपना गर्भाशय निकलवाने के लिए मजबूर करके किया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के वाडी गांव में, मालन मोरे भाग्यशाली हैं कि उन्हें अपनी मां का साथ मिला

9 जून, 2020 | मेधा काले

‘लगभग 12 बच्चों के बाद यह अपने आप रुक जाता है’

हरियाणा के बीवां गांव में, गर्भनिरोधक तक मेव मुसलमानों की पहुंच सांस्कृतिक कारकों, दुर्गम स्वास्थ्य सेवाओं और उदासीन प्रदाताओं के कारण मुश्किल है – परिणामस्वरूप वहां की महिलाएं बच्चे पैदा करने के चक्र में फंस जाती हैं

20 मई, 2020 | अनुभा भोंसले और संस्कृति तलवार

घरों में बंद छात्राएं: कोई बुनियादी ज़रूरत, पीरियड नहीं

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में स्कूल बंद हो जाने के कारण ग़रीब परिवारों की लड़कियों को मुफ़्त सैनिटरी नैपकिन नहीं मिल पा रहा है, इसलिए अब वे जोखिम भरा विकल्प अपनाने लगी हैं। अकेले यूपी में ऐसी लड़कियों की संख्या लाखों में है

12 मई, 2020 | जिज्ञासा मिश्रा

गायों की गिनती, ग्रामीण स्वास्थ्य सूचकांक की नहीं

मामूली वेतन और अनंत सर्वेक्षणों, रिपोर्टों तथा कार्यों के बोझ से लदी सुनीता रानी व हरियाणा के सोनीपत जिले की अन्य आशा कार्यकर्ता ग्रामीण परिवारों की प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही हैं

8 मई, 2020 | अनुभा भोंसले और पल्लवी प्रसाद

नीलगिरी में, कुपोषण की विरासत

लगभग बिना हीमोग्लोबिन वाली माताएं, दो साल के बच्चों का वज़न 7 किलो, शराब की लत, कम आमदनी और जंगल से उनकी बढ़ती दूरी, यह सब तमिलनाडु के गुडलूर की आदिवासी महिलाओं में तीव्र कुपोषण को बढ़ावा दे रहे हैं

1 मई, 2020 | प्रीति डेविड

‘उस पोते की चाहत में, हमारे चार बच्चे हो गए’

दिल्ली से लगभग 40 किलोमीटर दूर हरियाणा के हरसाना कलां गांव की महिलाएं बता रही हैं कि पुरुषों की शत्रुता के बीच उन्हें अपने जीवन और प्रजनन विकल्पों पर कुछ हद तक नियंत्रण पाने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है

21 अप्रैल, 2020 | अनुभा भोंसले और संस्कृति तलवार

‘अब मेरी बकरियां ही मेरे बच्चों जैसी हैं’

महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में धड़गांव क्षेत्र की भील महिलाएं कलंक, सामाजिक बहिष्कार और ग्रामीण चिकित्सा प्रणाली, जो बांझपन का कारगर इलाज प्रदान करने में नाकाम है, की वजह से संघर्ष कर रही हैं

13 अप्रैल, 2020 | ज्योति शिनोली

‘पिछले साल, केवल एक आदमी नसबंदी के लिए सहमत हुआ’

परिवार नियोजन में ‘पुरुषों की वचनबद्धता’ एक चर्चित शब्द है, लेकिन बिहार के विकास मित्र और आशा कार्यकर्ताओं को पुरुषों को नसबंदी कराने के लिए समझाने में बहुत कम सफलता मिली है, और गर्भनिरोधक केवल महिलाओं तक ही सीमित है

18 मार्च, 2020 | अमृता ब्यातनाल

‘उन्हें सिर्फ़ एक गोली देकर वापस भेज दिया जाता है’

सभी सुविधाओं से लैस छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कई आदिवासी महिलाओं की पहुंच से दूर है, इसलिए वे संभावित खतरनाक गर्भपात और प्रसव के लिए अयोग्य चिकित्सकों की ओर रुख करती हैं

11 मार्च, 2020 | प्रीति डेविड

‘परेशानियों का अंत’ — नेहा ने नसबंदी करा ली

सुप्रीम कोर्ट के 2016 के आदेश के बाद नसबंदी शिविरों की जगह अब ‘नसबंदी दिवस’ ने ले ली है, लेकिन आज भी नसबंदी मुख्य रूप से महिलाओं की ही की जाती है – और यूपी में बहुत सी महिलाएं ऐसा केवल इसलिए करती हैं क्योंकि उनके पास आधुनिक गर्भनिरोधक विधियों का कोई दूसरा विकल्प नहीं है

28 फरवरी, 2020 | अनुभा भोंसले

कूवलापुरम का अनोखा गेस्ट हाउस

मदुरई जिले के कूवलापुरम और चार अन्य गांवों में, मासिक धर्म वाली महिलाओं को अलग-थलग करके ‘गेस्ट हाउस’ में भेज दिया जाता है। देवताओं और मनुष्यों के प्रकोप के डर से कोई भी इस भेदभाव को चुनौती नहीं दे पाता

20 फरवरी, 2020 | कविता मुरलीधरन

हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

Mohd. Qamar Tabrez is PARI’s Urdu/Hindi translator since 2015. He is a Delhi-based journalist, the author of two books, and was associated with newspapers like ‘Roznama Mera Watan’, ‘Rashtriya Sahara’, ‘Chauthi Duniya’ and ‘Avadhnama’. He has a degree in History from Aligarh Muslim University and a PhD from Jawaharlal Nehru University, Delhi. You can contact the translator here: