हर महीने कारावास झेलती हैं काडूगोल्ला समुदाय की औरतें

क़ानून, सामाजिक जागरूकता अभियान, और व्यक्तिगत संघर्षों के बावजूद सामाजिक कलंक और दैवीय प्रकोप के डर से, कर्नाटक के काडूगोल्ला समुदाय की औरतें प्रसव के बाद और माहवारी के दौरान पेड़ों के नीचे और झोपड़ियों में खुद को अलग-थलग रखने के लिए मजबूर हैं.

5 जुलाई, 2021 | तमन्ना नसीर

मुझ तवायफ़ से कौन शादी करेगा!

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले के चतुर्भुज स्थान की सेक्स वर्कर्स (यौनकर्मी), अक्सर अपने 'परमानेंट' ग्राहकों को ख़ुश करने चक्कर में कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं; कोविड-19 की वजह से लगे लॉकडाउन के कारण उनके हालात बेहद ख़राब हैं.

15 जून, 2021 | जिज्ञासा मिश्रा

मलकानगिरीः जहां प्रसव से पहले पहाड़ लांघती हैं गर्भवती औरतें

ओडिशा के मलकानगिरी में जलाशय क्षेत्र की आदिवासी बस्तियों में, घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और राज्य-मिलिटेंट संघर्ष के बीच, नाव की अनियमित यात्रा-सेवाएं और टूटी सड़कें ही वहां की दुर्लभ स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने का एकमात्र ज़रिया हैं

4 जून, 2021 | जयंती बुरुदा

बिहारः कोरोना काल में भी नहीं रुका बाल विवाह का सिलसिला

बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में पिछले साल लॉकडाउन के दौरान, गांव लौटे प्रवासी मज़दूर युवकों से बहुत सी किशोरियों की शादी कर दी गई थी. उनमें से कई अब गर्भवती हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं

7 मई, 2021 | कविता अय्यर

मधुबनी में बदलाव की चाहत, चुपके-चुपके

एक दशक पहले, बिहार के हसनपुर गांव में परिवार नियोजन को दरकिनार कर दिया जाता था। लेकिन अब यहां की महिलाएं सलहा और शमा स्वास्थ्य कर्मियों के पास गर्भनिरोधक इंजेक्शन लगवाने आ रही हैं। यह बदलाव कैसे हुआ?

3 अप्रैल, 2021 | कविता अय्यर

बिहार की ‘महिला’ डॉक्टरों पर काम का दबाव, लोगों का क्रोध

बिहार के किशनगंज जिले में काम करने वाली कुछ महिला स्त्रीरोग विशेषज्ञों के लिए, दिन लंबा होता है, चिकित्सा आपूर्ति कम है, और अपनी विभिन्न गर्भवती मरीज़ों और गर्भनिरोधक को लेकर उनकी अनिच्छा से निपटना एक कठिन कार्य है

7 अप्रैल, 2021 | अनुभा भोंसले

‘मेरी नौ लड़कियां हैं और यह दसवां — एक लड़का है’

गुजरात के ढोलका तालुका में भारवाड़ पशुपालक समुदाय की महिलाओं के लिए, बेटे पैदा करने का दबाव और परिवार नियोजन के कुछ विकल्पों का मतलब है कि गर्भनिरोधक विकल्प और प्रजनन अधिकार केवल शब्दों तक सीमित हैं

1 अप्रैल, 2021 | प्रतिष्ठा पांडे

‘वह कहते हैं अगर मैं पढ़ती रही, तो मुझसे शादी कौन करेगा?’

बिहार के समस्तीपुर जिले में, महादलित समुदायों की किशोर लड़कियों को समाज के ताने सुनने पड़ते हैं, बल्कि कई बार शारीरिक हिंसा का भी सामना करना पड़ता है कि वे स्कूल न जाएं, अपने सपनों को छोड़ दें और शादी कर लें — कुछ लड़कियां तो इसका विरोध करने की कोशिश करती हैं, लेकिन अन्य हार मान लेती हैं

29 मार्च, 2021 | अमृता ब्यातनाल

‘हमारा कार्यालय और सोने की जगह एक है’

बिहार के दरभंगा जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जगह की कमी और सुविधाओं के अभाव के कारण वहां के स्वास्थ्य कर्मियों को कार्यालय में, वार्ड के बिस्तर पर, और कभी-कभी फ़र्श पर भी सोने के लिए मजबूर होना पड़ता है

26 मार्च, 2021 | जिज्ञासा मिश्रा

गर्भ में मृत घोषित, अगले दिन जन्म प्रमाणित

बिहार के वैशाली जिले के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में, अल्ट्रासाउंड मशीन मकड़ियों का घर है, कर्मचारी पैसे मांगते हैं, और एक परिवार को बताया गया कि उनका अजन्मा बच्चा मर चुका है — जिससे उन्हें ज़्यादा पैसा ख़र्च करके निजी अस्पताल की ओर भागना पड़ा

22 फरवरी, 2021 | जिज्ञासा मिश्रा

जर्जर स्वास्थ्य केंद्र, बिना डिग्री के डॉक्टर

कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जहां जंगली जानवर घूमते हों, अस्पतालों के बारे में डर, फ़ोन की ख़राब कनेक्टिविटी — ये सभी चीज़ें इस बात को सुनिश्चित करती हैं कि बिहार के बड़गांव ख़ूर्द गांव की गर्भवती महिलाएं घर पर ही प्रसव कराएं

15 फरवरी, 2021 | अनुभा भोंसले और विष्णु सिंह

अल्मोड़ा में, प्रसव के लिए पहाड़ों में घूमना

पिछले साल, उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की रानो सिंह ने पहाड़ी मार्ग से अस्पताल जाते हुए, बीच रास्ते में ही बच्चे को सड़क पर जन्म दिया। यह एक ऐसा इलाक़ा है, जहां के भू-भाग और ख़र्चे पहाड़ी बस्तियों में रहने वाली बहुत सी महिलाओं को घर पर ही बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करते हैं

11 फरवरी, 2021 | जिज्ञासा मिश्रा

जबरन नसबंदी, संवेदनहीन मृत्यु

राजस्थान के बांसी गांव की भावना सुथार की पिछले साल एक ‘शिविर’ में नसबंदी प्रक्रिया के बाद मृत्यु हो गई, जहां नियमों का उल्लंघन करते हुए उन्हें विकल्पों पर विचार करने का समय नहीं दिया गया था। उनके पति दिनेश को अभी भी न्याय की तलाश है

20 नवंबर, 2020 | अनुभा भोंसले

‘नौ महीने की गर्भावस्था में भी ग्राहक आते हैं’

चार बार गर्भपात, शराबी पति, और कारखाने की नौकरी चली जाने के बाद दिल्ली स्थित हनी ने पांचवीं बार गर्भवती होने पर यौनकर्मी बनने का फ़ैसला किया और तब से उन्हें एसटीडी है। अब, लॉकडाउन में वह कमाने के लिए संघर्ष कर रही हैं

15 अक्टूबर, 2020 | जिज्ञासा मिश्रा

‘मेरी पत्नी संक्रमित कैसे हो गई?’

नसबंदी के बाद संक्रमण हो जाने के कारण, राजस्थान के दौसा जिले की 27 वर्षीय सुशीला देवी को तीन वर्षों तक दर्द झेलना पड़ा, अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े, क़र्ज़ बढ़ता गया और अंत में उन्हें अपना गर्भाशय निकलवाना पड़ा

3 सितंबर, 2020 | अनुभा भोंसले और संस्कृति तलवार

‘डॉक्टर का कहना है कि मेरी हड्डियां खोखली हो चुकी हैं’

जीवन भर बीमारी और कई सर्जरी के बाद, पुणे जिले के हडशी गांव की बिबाबाई लोयरे झुक गई हैं। फिर भी, वह खेती का काम और अपने लक़वाग्रस्त पति की देखभाल करना जारी रखे हुई हैं

2 जुलाई, 2020 | मेधा काले

‘मेरा काट [गर्भाशय] बाहर निकलता रहता है’

महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में बाहर निकले गर्भाशय वाली भील महिलाओं की पहुंच चिकित्सा सुविधाओं तक नहीं है। सड़क या मोबाइल कनेक्टिविटी न होने के कारण संघर्षरत इन महिलाओं को कठिन प्रसव और कष्टदायी दर्द सहना पड़ता है

17 जून, 2020 | ज्योति शिनोली

‘डॉक्टरों ने गर्भाशय निकलवाने की सलाह दी थी’

मानसिक रूप से अक्षम महिलाओं के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन अक्सर उन्हें अपना गर्भाशय निकलवाने के लिए मजबूर करके किया जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के वाडी गांव में, मालन मोरे भाग्यशाली हैं कि उन्हें अपनी मां का साथ मिला

9 जून, 2020 | मेधा काले

‘लगभग 12 बच्चों के बाद यह अपने आप रुक जाता है’

हरियाणा के बीवां गांव में, गर्भनिरोधक तक मेव मुसलमानों की पहुंच सांस्कृतिक कारकों, दुर्गम स्वास्थ्य सेवाओं और उदासीन प्रदाताओं के कारण मुश्किल है – परिणामस्वरूप वहां की महिलाएं बच्चे पैदा करने के चक्र में फंस जाती हैं

20 मई, 2020 | अनुभा भोंसले और संस्कृति तलवार

घरों में बंद छात्राएं: कोई बुनियादी ज़रूरत, पीरियड नहीं

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में स्कूल बंद हो जाने के कारण ग़रीब परिवारों की लड़कियों को मुफ़्त सैनिटरी नैपकिन नहीं मिल पा रहा है, इसलिए अब वे जोखिम भरा विकल्प अपनाने लगी हैं। अकेले यूपी में ऐसी लड़कियों की संख्या लाखों में है

12 मई, 2020 | जिज्ञासा मिश्रा

गायों की गिनती, ग्रामीण स्वास्थ्य सूचकांक की नहीं

मामूली वेतन और अनंत सर्वेक्षणों, रिपोर्टों तथा कार्यों के बोझ से लदी सुनीता रानी व हरियाणा के सोनीपत जिले की अन्य आशा कार्यकर्ता ग्रामीण परिवारों की प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही हैं

8 मई, 2020 | अनुभा भोंसले और पल्लवी प्रसाद

नीलगिरी में, कुपोषण की विरासत

लगभग बिना हीमोग्लोबिन वाली माताएं, दो साल के बच्चों का वज़न 7 किलो, शराब की लत, कम आमदनी और जंगल से उनकी बढ़ती दूरी, यह सब तमिलनाडु के गुडलूर की आदिवासी महिलाओं में तीव्र कुपोषण को बढ़ावा दे रहे हैं

1 मई, 2020 | प्रीति डेविड

‘उस पोते की चाहत में, हमारे चार बच्चे हो गए’

दिल्ली से लगभग 40 किलोमीटर दूर हरियाणा के हरसाना कलां गांव की महिलाएं बता रही हैं कि पुरुषों की शत्रुता के बीच उन्हें अपने जीवन और प्रजनन विकल्पों पर कुछ हद तक नियंत्रण पाने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है

21 अप्रैल, 2020 | अनुभा भोंसले और संस्कृति तलवार

‘अब मेरी बकरियां ही मेरे बच्चों जैसी हैं’

महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में धड़गांव क्षेत्र की भील महिलाएं कलंक, सामाजिक बहिष्कार और ग्रामीण चिकित्सा प्रणाली, जो बांझपन का कारगर इलाज प्रदान करने में नाकाम है, की वजह से संघर्ष कर रही हैं

13 अप्रैल, 2020 | ज्योति शिनोली

‘पिछले साल, केवल एक आदमी नसबंदी के लिए सहमत हुआ’

परिवार नियोजन में ‘पुरुषों की वचनबद्धता’ एक चर्चित शब्द है, लेकिन बिहार के विकास मित्र और आशा कार्यकर्ताओं को पुरुषों को नसबंदी कराने के लिए समझाने में बहुत कम सफलता मिली है, और गर्भनिरोधक केवल महिलाओं तक ही सीमित है

18 मार्च, 2020 | अमृता ब्यातनाल

‘उन्हें सिर्फ़ एक गोली देकर वापस भेज दिया जाता है’

सभी सुविधाओं से लैस छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कई आदिवासी महिलाओं की पहुंच से दूर है, इसलिए वे संभावित खतरनाक गर्भपात और प्रसव के लिए अयोग्य चिकित्सकों की ओर रुख करती हैं

11 मार्च, 2020 | प्रीति डेविड

‘परेशानियों का अंत’ — नेहा ने नसबंदी करा ली

सुप्रीम कोर्ट के 2016 के आदेश के बाद नसबंदी शिविरों की जगह अब ‘नसबंदी दिवस’ ने ले ली है, लेकिन आज भी नसबंदी मुख्य रूप से महिलाओं की ही की जाती है – और यूपी में बहुत सी महिलाएं ऐसा केवल इसलिए करती हैं क्योंकि उनके पास आधुनिक गर्भनिरोधक विधियों का कोई दूसरा विकल्प नहीं है

28 फरवरी, 2020 | अनुभा भोंसले

कूवलापुरम का अनोखा गेस्ट हाउस

मदुरई जिले के कूवलापुरम और चार अन्य गांवों में, मासिक धर्म वाली महिलाओं को अलग-थलग करके ‘गेस्ट हाउस’ में भेज दिया जाता है। देवताओं और मनुष्यों के प्रकोप के डर से कोई भी इस भेदभाव को चुनौती नहीं दे पाता

20 फरवरी, 2020 | कविता मुरलीधरन

हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

Translator : Mohd. Qamar Tabrez

Mohd. Qamar Tabrez is the Translations Editor, Hindi/Urdu, at the People’s Archive of Rural India. He is a Delhi-based journalist, the author of two books, and was associated with newspapers like ‘Roznama Mera Watan’, ‘Rashtriya Sahara’, ‘Chauthi Duniya’ and ‘Avadhnama’. He has a degree in History from Aligarh Muslim University and a PhD from Jawaharlal Nehru University, Delhi.

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