समीरुद्दीन शेख़ अहमदाबाद के भीड़भाड़ वाली पुरानी सड़कों पर दिन में अपनी साइकिल से आते-जाते हुए दिखते हैं. जुहापुरा की फ़तेहवाड़ी में अपने घर से ताज एन्वेलप्स, जहां वह काम करते हैं, की 13 किलोमीटर की यात्रा एक तरफ़ से पूरी करने में उन्हें कोई एक घंटा लगता है. “मैं अपने काम पर जाने के लिए अपनी मोटरसाइकिल नहीं निकालता हूं, क्योंकि मैं पेट्रोल की क़ीमत का बोझ नहीं उठा सकता हूं,” 36 साल के मृदुभाषी समीरुद्दीन अपनी साइकिल खड़ी करते हुए कहते हैं.

वह पूरे दिन पुराने शहरी इलाक़े के एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट में 10 गुणा 20 फीट के एक कमरे में काम करते हैं. शहर का यह इलाक़ा खड़िया कहलाता है. उनके साथ लिफ़ाफ़ा बनाने वाले 10 अन्य कामगार भी काम करते हैं. एक दिन में सबसे ज़्यादा लिफ़ाफ़े उन्होंने 6,000 से 7,000 तक बनाए हैं.

समीरुद्दीन बताते हैं कि लिफ़ाफ़ा बनाना उतना भी आसान काम नहीं है जितना कि यह दिखता है. “इस कारीगरी को सीखने में डेढ़-दो साल लग जाते हैं,” वह कहते हैं. “आप एक स्वतंत्र कारीगर, जो अपना मेहनताना ख़ुद तय करता हो, तबतक नहीं बन सकते हैं, जबतक आपके उस्ताद (जो अमूमन एक बुज़ुर्ग और अनुभवी कारीगर होता है) आपके काम की गुणवत्ता से सहमत नहीं हों और उसपर अपनी मुहर नहीं लगा दें,” वह विस्तार से बताते हैं.

गुणवत्ता का आधार यहां काम की तेज़ी, सफ़ाई, निपुणता और सही औज़ारों के इस्तेमाल के संतुलन से है. कटिंग और पंचिंग करने वाली दो मशीनों को छोड़ कर वर्कशॉप में बाक़ी सभी काम हाथ से किए जाते हैं.

सबसे पहले, वर्कशॉप में मशीनें काग़ज़ की बड़ी चादरों को पहले से निर्धारित छोटे टुकड़ों में काट लेती हैं. उसके बाद विशेष रूप से बने पारंपरिक सांचे की मदद से काग़ज़ के उन टुकड़ों को अलग-अलग आकारों में मोड़ा जाता है. कारीगर उन टुकड़ों को गिनते हैं और एक बार में सौ काग़ज़ के टुकड़ों का बंडल मोड़ने, चिपकाने, सील करने और अंततः पैकिंग करने जैसे काम के लिए लेते हैं.

Left: Sameeruddin Shaikh cycling through the old city to Taj Envelopes in Khadia.
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Right: Craftsmen at work, sitting on the floor at Taj Envelopes’ workshop in the basement of a shopping complex
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बाएं: समीरुद्दीन शेख़ पुराने शहर से अपनी साइकिल पर बैठ कर खड़िया के ‘ताज एन्वेलप्स’ जाते हुए. दाएं: एक शॉपिंग कॉम्पेक्स के बेसमेंट में स्थित ताज एन्वेलप्स के फ़र्श पर बैठे और अपने-अपने काम में लगे कारीगर

लिफ़ाफ़ा बनाने की पूरी कारीगरी बारीकियों से भरी हुई है. लिफ़ाफ़े के हर हिस्से का अलग नाम होता है – सबसे ऊपर का हिस्सा माथु कहलाता है, नीचे के फ्लैप को पेंदी, बगल के फ्लैप, जिसे गोंद से चिपकाया जाता है, को ढापा, और बगल के फ्लैप, जिसे गोंद लगे फ्लैप पर चिपकाया जाता है, को खोला कहते हैं. निर्माण की हर प्रक्रिया और चरण का भी अलग नाम होता है, और हर प्रक्रिया को उसी सफ़ाई के साथ करना होता है. औज़ारों के इस्तेमाल में भी सावधानी और समझदारी बरती जाती है, अन्यथा लापरवाही के कारण गंभीर चोट लगने का ख़तरा बना रहता है.

जब बगल के फ्लैप मोड़े जाते हैं, तो कारीगर पहले अपनी मुट्ठियों का और उसके बाद पत्थर नाम के एक औज़ार का उपयोग करते हैं, ताकि काग़ज़ को साफ़-साफ़ और धारदार तरीक़े से मोड़ा जा सके. ‘फोल्डिंग स्टोन’ अब ग्राइंडिंग स्टोन से नहीं बनाए जाते हैं. अब कारीगर एक भारीभरकम लोहे के स्लैब का इस्तेमाल करते हैं. “जब मैं यह काम सीख रहा था तब पत्थर मेरी उंगली से आ टकराया,” 51 साल के अब्दुल मुत्तलिब अंसारी बताते हैं. “मेरी उंगली से ख़ून का फव्वारा फूट पड़ा और मेरे क़रीब की दीवार ख़ून से तरबतर हो गई. तब मेरे उस्ताद ने मुझे बताया कि अगर मुझे एक उम्दा कारीगर बनना है, तो मुझे ताक़त का इस्तेमाल करने के बजाय तकनीक का इस्तेमाल करना सीखना होगा.”

‘स्टोन’ का वजन कोई एक किलोग्राम के आसपास होता है. अब्दुल बताते हैं, “एक सामान्य लिफ़ाफ़ा बनाने के लिए आपको इसे चार से पांच दफ़ा इस्तेमाल करना होता है. काग़ज़ की मोटाई के हिसाब से आपको अपनी तकनीक बदलनी पड़ती है. आपको कितनी ऊंचाई तक ‘स्टोन’ को उठाना है, कितनी ज़ोर से उससे प्रहार करना है, और कितनी बार प्रहार करना है - यह सभी काम आप इन्हें करते-करते ही सीख सकते हैं,” 52 साल के अब्दुल गफ़ार अंसारी कहते हैं. “इस पूरी प्रक्रिया में एक लिफ़ाफ़ा हमारे हाथों से कोई 16-17 बार गुज़रता है. ऐसे में हर दिन अपनी उंगलियों के कटने का ख़तरा बहुत अधिक होता है. अगर गोंद आपकी कटी ऊंगली से छू भी जाए, तो उसमें बहुत तेज़ जलन होती है.” वह आगे बताते हैं.

लिफ़ाफ़ा बनाने वाले 64 साल के मुस्तंसिर उज्जैनी बताते हैं कि कहीं कट जाने की स्थिति में वह अपने ज़ख़्मों पर कोकम का तेल लगाते हैं. कुछ दूसरे लोग आराम पाने के लिए वैसलीन या नारियल तेल का उपयोग करते हैं. इस काम की चुनौतियां उस काग़ज़ की क़िस्म पर निर्भर हैं जिसका इतेमाल लिफ़ाफ़ा बनाने में किया जाता है. “कई बार जब हमें कड़क माल [120 जीएसएम का आर्ट पेपर] मिलता है, तो हमारे हाथ अक्सर ज़ख़्मी हो जाते हैं. मैं आराम के लिए उन्हें नमक मिले गर्म पानी में सात-आठ मिनट के लिए डुबो देता हूं,” सोनल एन्वेलप्स में काम करने वाले मोहम्मद आसिफ़ कहते हैं. समीरुद्दीन शेख़ उनकी बातों से सहमत होते हुए कहते हैं, “मौसम के ठंड होने पर भी हमारे हाथों में दर्द उठता है.”

Left: Mohammad Asif Shaikh at Sonal Envelopes hitting the 'stone' on dhapa to create a fold.
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Right: Mustansir Ujjaini applying warm kokum oil on his sore hands
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बाएं: सोनल एन्वेलप्स के मोहम्मद आसिफ़ शेख़ ढापा पर काग़ज़ को मोड़ने के लिए ‘स्टोन’ से ठोंक रहे हैं. दाएं: फ़ोटो मुस्तंसिर उज्जैनी अपनी हथेलियों की सूजन पर कोकम का गर्म तेल लगा रहे हैं

इस काम में कारीगरों को कई-कई घंटों तक फ़र्श पर बैठे रहना पड़ता है. समीरुद्दीन कहते हैं, “हम काम करने के लिए एक बार साढ़े नौ बजे सुबह जो बैठते हैं, तो दोपहर को एक बजे खाना खाने के लिए ही उठते हैं. मेरी पीठ में दर्द होता है. काम ख़त्म हो जाने पर उठ खड़े होने पर भी यह दर्द बना रहता है.” काम करते हुए लंबे समय तक एक ही शारीरिक मुद्रा में बैठे रहने के कारण उनके टखनों में घट्टे पड़ गये हैं. “यह परेशानी हर किसी को होनी ही है,” वह कहते हैं. यह बात वह शायद इसलिए कह रहे हैं कि हर एक कारीगर को फ़र्श पर पालथी लगा कर बैठना होता है. वह आगे कहते हैं, “अगर मैं अपने पैरों की परवाह करूंगा, तो मेरी पीठ में दर्द शुरू हो जाएगा.”

इस दर्द और ऐंठन, दर्द और जलन के बाद भी इस काम से होने वाली आमदनी नाकाफ़ी है. क़रीब 33 साल के मोहसिन खान पठान के लिए यह चिंता की बात है. वह कहते हैं, “मेरा परिवार अकेले मेरी आमदनी पर ही गुज़र-बसर करता है. घर का किराया 6,000 रुपए है. मेरे हल्के-फुल्के नाश्ते और चाय पर रोज़ 50 रुपए और बस तथा ऑटो के भाड़े के रूप में 60 रुपए ख़र्च होते हैं.” उनकी चार साल की बेटी ने अभी हाल-फ़िलहाल ही एक अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में दाख़िला लिया है “उसकी सालाना फीस 10,000 रुपए है,” वह चिंतित आवाज़ में हिसाब बताते हैं, और फिर से लिफ़ाफ़ा बनाने के काम में लग जाते हैं.

समीरुद्दीन के परिवार में कुल छह लोग हैं - तीन बच्चे और उनके बुज़ुर्ग पिता. वह कहते हैं, “बच्चे अब बड़े होने लगे हैं, और लिफ़ाफ़ा बनाने के इस काम से मुझे कुछ अधिक नहीं मिल पा रहा है. मैं किसी तरह अपना परिवार पाल-पोस रहा हूं, लेकिन कोई बचत नहीं कर पा रहा हूं.” वह आमदनी बढ़ाने का कोई वैकल्पिक काम करने की सोच रहे हैं और एक ऑटो लाइसेंस की कोशिश में लगे हैं, ताकि एक ऑटोरिक्शा ख़रीद कर बेहतर आमदनी कर सकें. वह हमें बताते हैं, “लिफ़ाफ़े के काम में आमदनी निश्चित नहीं है. जिस दिन हमें काम नहीं मिलता उस दिन हम दोपहर 2-3 बजे तक फुर्सत पा लेते हैं. हम सभी कमीशन पर काम करने वाले कामगार हैं, हमारी कोई तय तनख़्वाह नहीं है.”

Workers sit in this same position for most of their working hours. Sameeruddin Shaikh (left) showing calluses on his ankle due to continuously sitting with one leg folded under him.
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Mustansir Ujjaini (right) and two others working, seated on the floor
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अपने काम के अधिकतर घंटों में कारीगर एक ही स्थिति में बैठे रहते हैं. समीरुद्दीन शेख़ (बाएं) ताज एन्वेलप्स में अपने दाएं टखने का घट्टा दिखा रहे हैं, जो उन्हें लगातार एक पैर को दबा कर बैठने के कारण हुआ है. मुस्तंसिर उज्जैनी (दाएं) और दो अन्य कामगार फ़र्श पर बैठ कर काम कर रहे हैं

लिफ़ाफ़ा कारीगरों का एक यूनियन 1988 में स्थापित किया गया था. यह कभी सक्रिय रहता था और कभी निष्क्रिय, और आख़िरकार यह एक दिन भंग हो गया. ये कारीगर, यूनियन के भंग होने की ठीक-ठीक तारीख़ नहीं जानते हैं, लेकिन बताते हैं कि कुछ साल बाद उनमें से कुछ लोगों ने संगठन को पुनर्जीवित किया था. और, तब संगठन में वर्कशॉप मालिकों के साथ यह तय हुआ था महंगाई बढ़ने की स्थिति और काम के अनुपात में बोनस और छुट्टी तथा सालाना बढ़ोतरी के रूप में कारीगरों की मज़दूरी में 10 प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी.

अहमदाबाद में, इस इंडस्ट्री में पूरी तरह से पुरुषों का ही दबदबा रहता है - यहां केवल एक ही महिला कारीगर है जो लिफ़ाफ़ा बनाने का काम करती है.

मेहनताना हफ़्ते के हिसाब से चुकाया जाता है जो बनाए गए लिफ़ाफ़ों की कुल संख्या के साथ-साथ उनके आकार और मोटाई के अनुसार तय होता है. सामान्य काग़ज़ से बनाए गए प्रत्येक 1,000 लिफ़ाफ़े के बदले कारीगरों को लगभग 350 रुपए मिलते हैं, जबकि आर्ट पेपर से बनाए गए लिफ़ाफ़ों की मज़दूरी 489 रुपए होती है. एक कारीगर एक दिन में 2 से लेकर 6 हज़ार तक लिफ़ाफ़े बनाता है. यह संख्या लिफ़ाफ़ों की क़िस्मों, उनको बनाने की गति और अलग-अलग सीज़न में आने वाली मांग पर निर्भर होती है.

दफ़्तरों में इस्तेमाल होने वाला 11 X 5 इंच आकार का एक लिफ़ाफ़ा, जिसका वज़न 100 जीएसएम (ग्राम प्रति वर्ग मीटर) होता है, पांच रुपए में बिकता है.

कारीगरों को 100 जीएसएम गुणवत्ता वाले 1,000 लिफ़ाफ़ों के बदले 100 रुपए की दिहाड़ी मिलती है. दूसरे शब्दों में, एक ऑफिस लिफ़ाफ़े को बनाने में लगने वाले श्रम के बदले उन्हें मिलने वाला पैसा लिफ़ाफ़े के बाज़ार मूल्य के पचासवें हिस्से के बराबर होता है.

साथ ही, एक कारीगर को 100 रुपए कमाने के लिए दो घंटे कड़ी मेहनत करनी पड़ती है.

S. K. Sheikh the owner of Taj Envelopes arranging the die on the rectangle sheets before cutting the paper in the machine
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ताज एन्वेलप्स के मालिक एस.के. शेख़ मशीन से काग़ज़ों की कटिंग करने से पहले आयताकार काग़ज़ों पर सांचे को व्यवस्थित कर रहे हैं


Maqbul Ahmad Jamaluddin Shaikh a worker at Om Traders operating the punching machine that cuts sheets of paper to a size and shape of ready for folding. Most workshop owners handle the cutting and punching machines themselves
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ओम ट्रेडर्स में काम करने वाले एक कारीगर मक़बूल जमालुद्दीन शेख़ सांचे के आकार और प्रकार के अनुसार काग़ज़ों को पंचिंग मशीन पर काट रहे हैं. इसके बाद, कटे हुए काग़ज़ों को निश्चित जगहों से मोड़ा जाएगा. अधिकतर वर्कशॉप मालिक कटिंग और पंचिंग मशीनों को ख़ुद चलाते हैं


Different shapes and sizes of metal frames (called a die) are used in the punching machines
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पंचिंग मशीनों में अलग-अलग आकार और प्रकार के धातु के फ्रेम (सांचे) इस्तेमाल किए जाते हैं


Artisans at Om Traders counting the sheets and getting piles of 100 each ready to be folded
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ओम ट्रेडर्स के कारीगर काग़ज़ की तहों को मोड़ने से पहले उन्हें गिन कर उनका बंडल बना रहे हैं. एक बंडल में कटे हुए काग़ज़ के 100 टुकड़े होते हैं


Workers begin by folding the envelope sheets to give them shape. Each flap is identified by its distinctive name – mathu (top flap), pendi (bottom flap), dhapa (right flap, where the glue will be applied), khola (let flap). Bhikbhai Rawal of Taj Envelopes is folding pendi of a large envelope to hold an x-ray
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कारीगर काम की शुरुआत लिफ़ाफ़े के काग़ज़ को मोड़कर उन्हें एक आकार देने से शुरू करते हैं. हरेक फ्लैप अपने एक ख़ास नाम से पहचाना जाता है - माथु (ऊपर का फ्लैप), पेंदी (निचला फ्लैप), ढापा (दायां फ्लैप, जहां गोंद लगाई जाती है), खोला (बायां फ्लैप). ताज एन्वेलप्स के भीखाभाई रावल एक्स-रे के लिए बने एक बड़े लिफ़ाफ़े की पेंदी को मोड़ रहे हैं


Abdul Majeed Abdul Karim Sheikh (left) and Yusuf Khan Chotukhan Pathan of Sameer envelopes are using their side of their palms on the folded dhapa and pendi to make a sharp crease
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समीर एन्वेलप्स के अब्दुल मजीद अब्दुल करीम शेख़ (बाएं) और यूसुफ़ खान छोटूखान पठान अपनी हथेलियों के किनारों के इस्तेमाल से मुड़े हुए ढापा और पेंदी को धारदार बना रहे हैं


Mohammad Ilyas Shaikh of Dhruv Envelopes, using his fist on the side flap. He works on 100 envelopes at a time and needs to repeat the same action some 16 times leaving the sides of his palm sore
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ध्रुव एन्वेलप्स के मोहम्मद इलियास शेख़, बगल के फ्लैप पर अपनी मुट्ठियों को ठोंक रहे हैं. वह एक समय में 100 लिफ़ाफ़ों को तैयार करने का काम करते हैं और एक लिफ़ाफ़े पर उन्हें क़रीब 16 बार ठोंकना होता है. ऐसा करने से उनकी हथेली के किनारे सूज जाते हैं

Abdul Ghaffar Gulabbhai Mansuri at Taj Envelopes uses mal todvano patthar (a folding stone) on the bottom flap. The ‘stone’ is actually a piece of iron weighing about a kilogram and a half and is an essential tool in the process
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ताज एन्वेलप्स के अब्दुल ग़फ़्फ़ार गुलाबभाई मंसूरी निचले फ्लैप पर ‘माल तोडवानो पत्थर’ (फोल्डिंग स्टोन) का इस्तेमाल करते हुए. यह ‘स्टोन’ असल में लोहे का एक टुकड़ा होता है, जिसका वज़न एक किलोग्राम के आसपास होता है. यह कारीगरों के लिए एक ज़रूरी औज़ार है


Craftsmen use a wooden tool, known as silas to pull the right side of the stack of envelopes into a slide, making it easy to apply glue
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लिफ़ाफ़ों की दाईं तरफ़ के हिस्से पर सुविधाजनक तरीक़े से लाई लगाई जा सके, इसके लिए फ्लैप को भीतर की तरफ़ सरकाया जाता है. इस काम के लिए कारीगर एक लकड़ी के औज़ार का उपयोग करते हैं जिन्हें वे ‘सिलास’ कहते हैं


Abdul Muttalib Mohammad Ibrahim Ansari at Taj Envelopes is applying lai (a glue made from either refined flour or tamarind seed) on the covers using a putlo , a little bundle-like tool made using thin strips of cloth tied inside a piece of rexine
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ताज एन्वेलप्स में अब्दुल मुत्तलिब मोहम्मद इब्राहिम अंसारी, कवर पर एक पुतलो की मदद से लाई (आटे, मैदे या इमली के बीजों से बनाई गई गोंद) लगा रहे हैं. पुतलो एक छोटा सा बंडलनुमा औज़ार होता है जिसे कपड़ों की पतली-पतली पट्टियों को एक रेक्सीन के टुकड़े के भीतर बांध कर बनाया जाता है


Sameeruddin Shaikh applying paste to dhapa , the right flap of the envelope paper. He works on 100 envelopes at a time
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समीरुद्दीन शेख़, लिफ़ाफ़े के काग़ज़ के दाएं फ्लैप (ढापा) पर पेस्ट लगा रहे हैं. ज़्यादातर कारीगरों की तरह वह भी एक समय में 100 की संख्या के हिसाब से अपना काम करते हैं

Bhikhabhai Rawal at Taj Envelopes folds the papers to paste the glued right flap on khola , the left flap
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ताज एन्वेलप्स में भीखाभाई रावल लाई लगे दाएं फ्लैप को बाएं फ्लैप (खोला) से चिपकाने के लिए काग़ज़ को मोड़ रहे हैं

Mohammad Ilyas Shaikh at Dhruv Envelope seals the bottom of the cover by fixing the glued pendi
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मोहम्मद इलियास शेख़ ध्रुव एन्वेलप्स में कवर के निचले हिस्से (पेंदी) पर लाई लगा कर उसे सील कर रहे हैं

Artisans at Om Traders taking a break for lunch. This is the only time in the day that they stop working
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ओम ट्रेडर्स के कारीगर साथ में दोपहर का खाना खा रहे हैं. यह इकलौता मौक़ा होता है, जब उनको अपने काम के लंबे घंटों के बीच थोड़ा सा आराम मिलता है

Abdul Muttalib Mohammad Ibrahim Ansari shows a large-size lamination cover that he has been making at Taj Envelopes
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ताज एन्वेलप्स में काम करने वाले अब्दुल मुत्तलिब मोहम्मद इब्राहिम अंसारी एक बड़े आकार का लेमिनेशन कवर दिखाते हुए जिसे वह ख़ुद तैयार कर रहे हैं


An average worker takes about six to seven minutes to get 100 envelopes ready. Shardaben Rawal(left) has been making the envelopes for the last 34 years. She learnt it while working with her husband Mangaldas Rawal (right)
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सामान्यतः एक कारीगर को 100 लिफ़ाफ़े तैयार करने में छह से सात मिनट का समय लगता है. शारदाबेन रावल (बाएं) पिछले 34 सालों से लिफ़ाफ़े बनाने के काम में लगी हैं. उन्होंने यह कारीगरी अपने पति मंगलदास रावल (दाएं) के साथ काम करते हुए सीखी थी


An envelope goes through 16 rounds in the hands of a worker during the entire process and the chances of getting your fingers cut, are high. Kaleem Sheikh shows his injured thumb
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एक लिफ़ाफ़े को अपनी निर्माण-प्रक्रिया में कोई सोलह बार कारीगर के हाथों से गुज़रना पड़ता है. ऐसे में उंगलियों के कटने के ख़तरे बहुत बढ़ जाते हैं. कलीम शेख़ अपनी अपना कटा हुआ अंगूठा दिखा रहे हैं


When the lai (handmade glue) touches the injured fingers they burn and pain. Kaleem Shaikh of Dhruv Envelopes shows his recent injuries
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जब लाई उंगलियों के कटे हुए हिस्से पर लगती है तब बहुत तेज़ जलन और दर्द होता है. ध्रुव एन्वेलप्स के कलीम शेख़ कटने-फटने के निशान दिखा रहे हैं, जो हाल-फ़िलहाल के हैं


Hanif Khan Bismillah Khan Pathan at Taj Envelopes stacks the covers with open flaps according to their sizes
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ताज एन्वेलप्स में हनीफ़ खान बिस्मिल्लाह खान पठान खुले हुए फ्लैपों के साथ कवर के ढेर को व्यवस्थित कर रहे हैं. ये ढेर लिफ़ाफ़ों के आकार और संख्या के अनुसार बनाए जा रहे हैं

Mohammad Hanif Nurgani Shaikh closes the mouth of the envelope by folding the top flap. He is the current president of the envelope workers union
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मोहम्मद हनीफ़ नूरगनी शेख़ ऊपर के फ्लैपों को मोड़कर लिफ़ाफ़ों का मुंह बंद कर रहे हैं. वह एन्वेलप वर्कर्स यूनियन के वर्तमान अध्यक्ष भी हैं


The finished envelopes are packed in bundles of hundred each by Hanif Pathan
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तैयार हो चुके लिफ़ाफ़ों को सौ-सौ बंडलों में पैक करते हुए हनीफ़ पठान


Shardaben Rawal placing the envelopes in a box. Other than her, there is not a single woman working in any of the 35 envelope workshops in Ahmedabad
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लिफ़ाफ़ों की बॉक्सिंग करती हुईं शारदाबेन रावल. उनके सिवा कोई दूसरी महिला कारीगर अहमदाबाद के 35 वर्कशॉप में कहीं भी काम नहीं करती है


The Rawal couple giving a report on their work to Jietendra Rawal, the owner of Dhruv Envelopes. They will be paid on Saturday for the week
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रावल दंपत्ति अपने कामों का ब्यौरा ध्रुव एन्वेलप्स के मालिक जीतेन्द्र रावल को दे रहा है. इसी ब्योरे के आधार पर उनका हिसाब-किताब होता है और हर आने वाले शनिवार को भुगतान होता है


A photo of the document listing the increase in wages of artisan labour between January 1, 2022 to December 31, 2023, prepared after discussion between the two unions, of workers and manufacturers in Ahmedabad. In 2022, cover-craft prices were increased by 6 per cent
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वर्कर यूनियनों और अहमदाबाद के लिफ़ाफ़ा निर्माताओं के बीच हुए विचार-विमर्श के बाद, 1 जनवरी 2022 से लेकर 31 दिसंबर 2023 की अवधि के लिए कारीगरों की बढ़ी हुई मज़दूरी की सूची तैयार की गई है. साल 2022 में कवर-क्राफ्ट मूल्यों में 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी


लेखक स्टोरी को दर्ज करने में मदद के लिए हुज़ैफ़ा उज्जैनी का आभार व्यक्त करते हैं.

अनुवाद: प्रभात मिलिंद

Umesh Solanki

Umesh Solanki is an Ahmedabad-based photographer, reporter, documentary filmmaker, novelist and poet. He has three published collections of poetry, one novel-in-verse, a novel and a collection of creative non-fiction to his credit.

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Editor : Pratishtha Pandya

Pratishtha Pandya is a Senior Editor at PARI where she leads PARI's creative writing section. She is also a member of the PARIBhasha team and translates and edits stories in Gujarati. Pratishtha is a published poet working in Gujarati and English.

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Binaifer Bharucha is a freelance photographer based in Mumbai, and Photo Editor at the People's Archive of Rural India.

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Prabhat Milind, M.A. Pre in History (DU), Author, Translator and Columnist, Eight translated books published so far, One Collection of Poetry under publication.

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