html तमिलनाडु की समुद्री शैवाल इकट्ठा करने वाली महिलाएं

वे रोज़ाना सुबह में 3 बजे जग जाती हैं। उन्हें सुबह के 5 बजे तक काम पर होना होता है और उससे पहले अपने सभी घरेलू कामों को पूरा करना पड़ता है। उनके काम करने के विशाल, और गीले स्थान तक की दूरी बहुत ज़्यादा नहीं है, जहां वे पैदल चलकर जाती हैं। वे अपने घरों से निकलती हैं, समुद्र तक पहुंचती हैं – और उसके अंदर गोते लगाना शुरू कर देती हैं।

कभी-कभी वे नाव से पास के द्वीपों पर पहुंचती हैं – और वहां गोते लगाती हैं। वे इस काम को अगले 7-10 घंटों तक बार-बार करती हैं। हर एक गोते के बाद जब वे पानी से ऊपर आती हैं, तो उनके हाथों में समुद्री शैवाल होता है, मानो उनका जीवन इसी पर टिका हो – यही वास्तविकता भी है। तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के भारतीनगर की मछुआरा समुदाय की महिलाओं द्वारा समुद्र में गोता लगाकर समुद्री पौधों और शैवाल को इकट्ठा करना ही उनकी कमाई का मुख्य स्रोत है।

काम के दिन, वे कपड़े और जालीदार थैलों के साथ ‘सुरक्षात्मक वस्त्र’ भी लेकर चलती हैं। नाविक जहां एक तरफ़ उन्हें समुद्री शैवाल से भरे द्वीपों पर ले जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ महिलाएं अपनी साड़ियों को धोती की तरह टांगों के बीच से बांध लेती हैं, जालीदार थैलों को अपनी कमर के चारों ओर लपेटती हैं, और अपनी साड़ियों के ऊपर टी-शर्ट पहनती हैं। ‘सुरक्षा’ उपकरण में शामिल है उनकी आंखों के लिए काले चश्मे, उंगलियों पर कपड़े के पट्टियां लपेटी हुई या कुछ के लिए सर्जिकल दस्ताने, और रबर की चप्पलें ताकि उनके पैर धारदार चट्टानों से कट ना सकें। इनका उपयोग वे हर समय करती हैं, चाहे खुले समुद्र में हों या द्वीपों के आसपास।

समुद्री शैवाल इकट्ठा करना इस क्षेत्र का एक पारंपरिक व्यवसाय है जो पीढ़ियों से मां से बेटी को पास किया जाता रहा है। कुछ अकेली और निराश्रित महिलाओं के लिए, यह आय का एकमात्र स्रोत है।

एक ऐसी आय जो तेज़ी से कम होते समुद्री शैवाल के कारण घट रही है, और तापमान में वृद्धि, समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी, बदलते मौसम और जलवायु, तथा इस संसाधन के अत्यधिक दोहन का नतीजा है।

“समुद्री शैवाल का बढ़ना बहुत कम हो गया है,” 42 वर्षीय पी रक्कम्मा कहती हैं। यहां काम करने वाली अन्य महिलाओं की तरह, वह भी भारतीनगर की रहने वाली हैं, जो तिरुपुल्लनी ब्लॉक के मायाकुलम गांव के पास है। “हमें अब उतनी मात्रा नहीं मिल रही है जितनी पहले मिला करती थी। अब यह कभी-कभी हमें महीने में केवल 10 दिनों का ही काम देता है।” इस बात को देखते हुए कि साल में केवल पांच महीने ही ऐसे होते हैं जब महिलाओं द्वारा व्यवस्थित तरीके से शैवाल इकट्ठा किए जाते हैं, यह एक झटका है। रक्कम्मा को लगता है कि “लहरें मज़बूत हो गई हैं और” दिसंबर 2004 की “सुनामी के बाद समुद्र का स्तर बढ़ गया है।”

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समुद्री शैवाल इकट्ठा करना इस क्षेत्र का एक पारंपरिक व्यवसाय है जो मां से बेटी को पास किया जाता रहा है; यहां, यू. पंचावरम भित्तियों से समुद्री शैवाल एकत्र कर रही हैं

ऐसे परिवर्तन ए. मूकुपोरी जैसी हार्वेस्टर को चोट पहुंचा रहे हैं, जो आठ साल की उम्र से ही समुद्री शैवाल इकट्ठा करने के लिए गोता लगा रही हैं। वह जब बहुत छोटी थीं, तो उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई थी, और रिश्तेदारों ने उनकी शादी एक शराबी से कर दी थी। अब 35 वर्ष की आयु में मूकुपुरी की तीन बेटियां हैं, लेकिन वह अभी भी अपने पति के साथ रहती हैं, हालांकि वह कुछ भी कमाने और परिवार की सहायता करने की स्थिति में नहीं है।

अपने घर में एकमात्र कमाने वाली सदस्य के रूप में वह कहती हैं कि अपनी तीन बेटियों को आगे पढ़ाने में मदद करने के लिए “अब शैवाल से होने वाली कमाई अपर्याप्त है।” उनकी सबसे बड़ी बेटी बी कॉम की पढ़ाई कर रही है। दूसरी बेटी कॉलेज में दाखिले का इंतजार कर रही है। सबसे छोटी बेटी छठी कक्षा में है। मूकुपुरी को डर है कि चीज़ें जल्द ही “सुधरने वाली नहीं हैं।”

वह और उनके साथी हार्वेस्टर मुथुरइयार हैं, जिन्हें तमिलनाडु में सबसे पिछड़े समुदाय (एमबीसी) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। रामनाथपुरम मछुआरा संगठन के अध्यक्ष, ए. पलसामी का अनुमान है कि तमिलनाडु के 940 किलोमीटर के तट पर समुद्री शैवाल इकट्ठा करने वाली महिलाओं की संख्या 600 से ज़्यादा नहीं है। लेकिन वे जो काम करती हैं, उस पर बहुत बड़ी आबादी निर्भर है जो केवल इसी राज्य तक सीमित नहीं है।

42 वर्षीय पी. रानीअम्मा समझाती हैं, “हम जो शैवाल इकट्ठा करते हैं, उसका उपयोग अगार बनाने में किया जाता है।” यह एक जिलेटिन जैसा पदार्थ है जिसका उपयोग खाद्य पदार्थों को गाढ़ा बनाने के लिए किया जाता है।

यहां से प्राप्त समुद्री शैवाल का उपयोग खाद्य उद्योग में, कुछ उर्वरकों में एक तत्व के रूप में, फार्मा कंपनियों द्वारा औषधीय तैयारियों में, और अन्य प्रयोजनों के लिए भी किया जाता है। महिलाएं समुद्री शैवाल को इकट्ठा करके सुखाती हैं, जिसे बाद में मदुरई जिले की फैक्ट्रियों में प्रसंस्करण के लिए भेजा जाता है। इस क्षेत्र की दो प्रमुख किस्में हैं – मट्टकोरइ (gracilaria) और मरिकोझुन्तु (gelidium amansii)। जेलिडियम को कभी-कभी सलाद, पुडिंग और जाम के रूप में परोसा जाता है। यह उन लोगों के लिए उपयोगी माना जाता है जो डाइटिंग कर रहे हैं और कभी-कभी कब्ज को दूर करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। मट्टकोरइ (gracilaria) का उपयोग कपड़े की रंगाई सहित अन्य औद्योगिक प्रावधानों में भी किया जाता है।

लेकिन उद्योगों में इतने बड़े स्तर पर समुद्री शैवाल की लोकप्रियता ने इसके अत्यधिक दोहन को भी जन्म दिया है। केंद्रीय नमक और समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (मंडपम कैम्प, रामनाथपुरम) ने बताया है कि असिंचित तरीके से शैवाल को इकट्ठा करने के कारण इसकी उपलब्धता में भारी गिरावट आई है।

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पी. रानीअम्मा मरिकोझुन्तु के साथ, जो शैवाल की एक छोटी खाने लायक किस्म है

आज की मात्रा इस गिरावट को दिखाती है। “पांच साल पहले, हम सात घंटे में कम से कम 10 किलोग्राम मरिकोझुनतु इकट्ठा कर लेते थे,” 45 वर्षीय एस अमृतम कहती हैं, “लेकिन अब, एक दिन में 3-4 किलो से ज़्यादा नहीं मिलता। इसके अलावा, समुद्री शैवाल का आकार भी पिछले कुछ वर्षों में छोटा हो गया है।”

इससे जुड़ा उद्योग भी सिकुड़ गया है। 2014 के अंत तक, मदुरई में अगार की 37 इकाइयां थीं, ए बोस कहते हैं, जो इस जिले में समुद्री शैवाल के प्रसंस्करण की एक कंपनी के मालिक हैं। वह बताते हैं कि आज ऐसी केवल 7 इकाइयां हैं – और वे अपनी कुल क्षमता के केवल 40 प्रतिशत पर ही काम कर रही हैं। बोस अखिल भारतीय अगार और अल्गिनेट निर्माता कल्याणकारी मंडल के अध्यक्ष हुआ करते थे – सदस्यों की कमी के कारण यह संगठन पिछले दो वर्षों से काम नहीं कर रहा है।

“हमें जितने दिनों तक काम मिलता था, उसकी संख्या कम हो गई है,” 55 वर्षीय एम मरियम्मा कहती हैं, जो समुद्री शैवाल के लिए चार दशकों से गोता लगा रही हैं। “ऑफ-सीज़न में हमें नौकरी का कोई अन्य अवसर नहीं मिलता है।”

मरियम्मा जब 1964 में जन्मी थीं, तो मायाकुलम गांव एक वर्ष में ऐसे 179 दिनों की आशा कर सकता था जब तापमान 38 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तक पहुंच जाए। वर्ष 2019 में, 271 ऐसे गर्म दिन होंगे –यानी 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि। इस साल जुलाई में न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा ऑनलाइन पोस्ट किए गए जलवायु और ग्लोबल वार्मिंग पर एक संवादात्मक उपकरण से गणना के अनुसार, अगले 25 वर्षों में, यह क्षेत्र ऐसे 286 से 324 दिन देख सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि समुद्र भी गर्म हो रहे हैं।

इन सभी चीज़ों का भारतीनगर के मछुआरों से परे भी प्रभाव पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की ताज़ा रिपोर्ट (आईपीसीसी) बिना समर्थन किए उन अध्ययनों का उल्लेख करती है, जो समुद्री शैवाल को जलवायु परिवर्तन को कम करने के संभावित महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखते हैं। यह रिपोर्ट खुद स्वीकार करती है कि: “समुद्री शैवाल की जलीय कृषि आगे का अनुसंधान करने की ज़रूरत पर ध्यान केंद्रित करती है।”

कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में सागरशास्त्र विभाग के प्रोफ़ेसर तुहिन घोष उस रिपोर्ट के प्रमुख लेखकों में से एक थे। उनके विचार मछुआरा समुदाय की इन महिलाओं के बयान से प्रमाणित होते हैं जो अपनी पैदावार में गिरावट की बात कह रही हैं। “केवल समुद्री शैवाल ही नहीं, बल्कि बहुत सी अन्य प्रक्रियाओं में भी गिरावट या वृद्धि देखने को मिल रही है [जैसे प्रवासन],” उन्होंने फोन पर पारी (PARI) को बताया। “यह मछलियों की पैदावार, झींगों के बच्चों की पैदावार, और समुद्र तथा ज़मीन दोनों से जुड़ी कई चीजें के लिए सही होगा, जिनमें केकड़ा जमा करना, शहद इकट्ठा करना, पलायन (जैसा कि सुंदरबन में देखा गया है) आदि शामिल है।”

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कभी-कभी, यहां से महिलाएं पास के द्वीपों पर नाव ले जाती हैं जहां से वे गोता लगाती हैं

प्रोफ़ेसर घोष कहते हैं कि मछुआरा समुदाय जो कुछ कह रहा है उसमें दम है। “हालांकि, मछली के मामले में, यह सिर्फ बदलती जलवायु का मामला नहीं है – बल्कि महाजाल से मछली पकड़ने वाले जहाज़ द्वारा और औद्योगिक पैमाने पर मछली पकड़ने का गंभीर दोहन भी है। इसने पारंपरिक मछुआरों द्वारा सामान्य जलस्रोतों से मछली पकड़ने को भी तेज़ी से कम कर दिया है।”

हालांकि महाजाल वाले जहाज़ समुद्री शैवाल को प्रभावित नहीं कर सकते, लेकिन औद्योगिक दोहन निश्चित रूप से हो रहा है। भारतीनगर की महिलाएं और उनकी साथी हार्वेस्टरों ने इस प्रक्रिया में छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए चिंतन मनन किया है। उनके साथ काम करने वाले कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं का कहना है कि सिकुड़ती पैदावार से चिंतित होकर, उन्होंने आपस में बैठकें कीं और जुलाई से व्यवस्थित कटाई को पांच महीने तक सीमित रखने का फैसला किया। फिर तीन महीने तक, वे समुद्र के चक्कर बिल्कुल भी नहीं लगाती हैं – जिससे समुद्री शैवाल को पुनर्जीवित होना का मौका मिलता है। मार्च से जून तक, वे शैवाल ज़रूर इकट्ठा करती हैं लेकिन महीने में केवल कुछ ही दिनों के लिए। सीधे शब्दों में कहें, तो महिलाओं ने अपनी स्व-नियामक व्यवस्था बनाई है।

यह एक विचारशील दृष्टिकोण है – लेकिन इसकी उन्हें कुछ क़ीमत चुकानी पड़ती है। “मछुआरा समुदाय की महिलाओं को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत काम नहीं दिया जाता है,” मरियम्मा कहती हैं। “शैवाल इकट्ठा करने के मौसम के दौरान भी, हम मुश्किल से एक दिन में 100-150 रुपये कमाते हैं।” सीज़न में, प्रत्येक महिला एक दिन में 25 किलोग्राम तक समुद्री शैवाल एकत्र कर सकती है, लेकिन उन्हें मिलने वाली दर (इसमें भी गिरावट आ रही है) उनके द्वारा समुद्र से लाए गए शैवाल की किस्म के आधार पर अलग-अलग होती है।

नियमों और कानूनों में बदलाव ने मामले को और भी जटिल बना दिया है। 1980 तक, वे काफी दूर तक के द्वीपों पर जा सकती थीं, जैसे कि नल्लथीवु, चल्पी, उप्पुथन्नी – उनमें से कुछ की दूरी नाव से लगभग दो दिनों की है। वे घर लौटने से पहले समुद्री शैवाल एकत्र करने पर एक सप्ताह तक का समय बिता सकती थीं। लेकिन उस साल, वे जिन द्वीपों पर गई थीं उनमें से 21 को मन्नार की खाड़ी के समुद्री राष्ट्रीय उद्यान में सम्मिलित कर दिया गया – और इस तरह वे सभी वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आ गए। विभाग ने उन्हें इन द्वीपों पर रहने की अनुमति देने से इनकार कर दिया और इन स्थानों पर उनकी पहुंच को बंद कर दिया। इस प्रतिबंध के विरोध में सरकार से कोई सहानुभूतिपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं मिली है। जुर्माना के डर से, जो 8,000 रुपये से 10,000 रुपये तक हो सकता है, वे उन द्वीपों पर अब नहीं जाती हैं।

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जालीदार थैले जो महिलाएं समुद्री शैवाल इकट्ठा करने के लिए उपयोग करती हैं; इस प्रक्रिया में उन्हें अक्सर चोट लग जाती है और खून बहने लगता है, लेकिन पूरी तरह भरे थैले का मतलब है अपने परिवारों की सहायता करने के लिए आय

इसलिए आय में और कमी आई है। “हम जब उन द्वीपों पर एक सप्ताह बिताया करते थे, तो कम से कम 1,500 रुपये से 2,000 रुपये तक कमा लेते थे,” एस अमृतम कहती हैं, जो 12 साल की उम्र से समुद्री शैवाल एकत्र कर रही हैं। “ हमें मट्टकोरइ और मरिकोझुनतु समुद्री शैवाल दोनों ही मिल जाते थे। अब एक सप्ताह में 1,000 रुपये कमाना भी मुश्किल है।”

हो सकता है शैवाल एकत्र करने वाली महिलाएं जलवायु परिवर्तन पर चल रही बहस के बारे में न जानती हों, लेकिन उन्होंने इसका अनुभव किया है और इसके कुछ प्रभावों को जानती हैं। वे समझ चुकी हैं कि उनके जीवन और व्यवसाय में कई बदलाव चल रहे हैं। उन्होंने समुद्र, और तापमान, मौसम तथा जलवायु के व्यवहार में बदलावों का अवलोकन और अनुभव किया है। उन्होंने फिलहाल जारी बदलावों में मानवीय गतिविधियों की कुछ भूमिका (अपनी स्वयं की भूमिका सहित) को भी महसूस किया है। इसके साथ ही, उनकी एकमात्र आय प्रक्रियाओं के इस पूरे, जटिल संग्रह में क़ैद है। और वे जानती हैं कि उन्हें कोई विकल्प नहीं दिया जा रहा है – जैसा कि मनरेगा में सम्मिलित ना करने के बारे में मरियम्मा की टिप्पणी दर्शाती है।

पानी का स्तर दोपहर से बढ़ना शुरू हो जाता है, इसलिए वे दिन की अपनी गतिविधि को समेटना शुरू कर देती हैं। कुछ ही घंटों में, वे एकत्र किए गए शैवाल को उन नावों पर वापस ले आई हैं जिनसे वे समुद्र के भीतर गई थीं और जालीदार थैले में उन्हें किनारे पर जमा कर रखा था।

उनकी गतिविधि चाहे कुछ भी हो लेकिन सरल और बिना जोखिम के नहीं है। समुद्र में जाना कठिन होता जा रहा है, कुछ सप्ताह पहले ही इस क्षेत्र में एक तूफान के कारण चार मछुआरों की मौत हो गई थी। केवल तीन शव ही बरामद हुए, और स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि हवाएं तभी धीमी और समुद्र शांत होंगे जब झाग बनेगी।

जैसा कि स्थानीय लोग कहते हैं, हवाओं का साथ मिले बिना, समुद्र से संबंधित सभी कार्य चुनौतीपूर्ण हैं। जलवायु परिस्थितियों में बड़े परिवर्तन के कारण, बहुत सारे दिन अप्रत्याशित होते हैं। फिर भी महिलाएं अपनी एकमात्र आजीविका के स्रोत की तलाश में अशांत पानी में उतर जाती हैं – लाक्षणिक और कभी-कभी शाब्दिक रूप से यह जानते हुए भी कि वे उफनते समुद्र में भटक चुकी हैं।

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समुद्री शैवाल के लिए गोता लगाने के लिए नाव को समुद्र में खेना: हवाओं का साथ मिले बिना, समुद्र से संबंधित सभी कार्य चुनौतीपूर्ण हैं। जलवायु परिस्थितियों में पड़े परिवर्तन के कारण, बहुत सारे दिन अप्रत्याशित होते हैं

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समुद्री शैवाल एकत्र करने वाली महिला फटे दस्ताने के साथ – जो  चट्टानों और अस्थिर पानी के विरुद्ध एक कमज़ोर सुरक्षा कवच है

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जाल तैयार करना: महिलाओं के सुरक्षात्मक कवच में शामिल है धूप का चश्मा, हाथों के लिए कपड़े की पट्टी या दस्ताने और रबर की चप्पलें ताकि वे अपने पैरों को धारदार चट्टानों से कटने से बचा सकें

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एस अमृतम तेज़ लहरों से लड़ते हुए, शैल-भित्ति तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं

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एम मरियम्मा समुद्री शैवाल इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले जालीदार थैले की रस्सी को कस रही हैं

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गोता लगाने की तैयारी में

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और फिर गोता लगाना, समुद्र तल की ओर खुद को ढकेलते हुए

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गहराई में – महिलाओं का कार्यस्थल, मछलियों और समुद्री जीवों की पानी के नीचे एक अपारदर्शी दुनिया

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लंबे पत्तों वाला इस समुद्री शैवाल, मट्टकोरइ, को एकत्र किया जाता है, सुखाया जाता है और फिर कपड़ों की रंगाई में इस्तेमाल किया जाता है

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समुद्र तल पर ठहरने के दौरान, रानीअम्मा कई सेकंडों तक अपनी सांस को नियंत्रित करके मरिकोझुन्तु एकत्र करती हैं

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फिर सतह पर वापस आ जाती हैं, अस्थिर लहरों के बीच, बड़ी मुश्किल से हासिल किए गए अपने शैवाल के साथ

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ज्वार आना शुरू हो गया है, लेकिन महिलाएं दोपहर तक काम करना जारी रखती हैं

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गोता लगाने के बाद शैवाल इकट्ठा करने वाली एक महिला अपने सुरक्षा कवच को साफ़ करते हुए

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समुद्र तट की ओर वापस जाते हुए, पूरी तरह थकी हुईं

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इन्होंने जो समुद्री शैवाल एकत्र किए, उसे खींचकर किनारे पर लाते हुए

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अन्य लोग दिन की गहरे हरे रंग की फसल से भरे जालीदार थैलों को नाव पर लाद रहे हैं

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समुद्री शैवाल से भरी एक छोटी नाव किनारे तक पहुंचती है; शैवाल एकत्र करने वाली एक महिला लंगर का मार्गदर्शन करती है

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समुद्री शैवाल को नाव से नीचे उतारता एक समूह

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दिन भर के संग्रह का वज़न करते हुए

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समुद्री शैवाल को सुखाने की तैयारी

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अन्य लोग सुखाने के लिए फैलाकर रखे गए समुद्री शैवाल के अपने संग्रह को ले जाते हुए

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और फिर, समुद्र में और पानी की गरहाई में घंटों बिताने के बाद, ये महिलाएं जमीन पर स्थित अपने घरों को वापस जाते हुए

कवर फोटो: ए. मूकुपोरी जालीदार थैले को खींच रही हैं। अब 35 साल की हो चुकीं, वह आठ साल की आयु से ही समुद्री शैवाल एकत्र करने के लिए गोता लगा रही हैं। (फोटो: एम. पलानी कुमार/PARI)

इस स्टोरी में उदार सहायता प्रदान करने के लिए सेंथालिर एस. का बहुत आभार।

जलवायु परिवर्तन पर PARI की राष्ट्रव्यापी रिपोर्टिंग, आम लोगों की आवाज़ों और जीवन के अनुभव के माध्यम से उस घटना को रिकॉर्ड करने के लिए UNDP-समर्थित पहल का एक हिस्सा है।

इस लेख को प्रकाशित करना चाहते हैं? कृपया zahra@ruralindiaonline.org को लिखें और उसकी एक कॉपी namita@ruralindiaonline.org को भेज दें

हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़

Mohd. Qamar Tabrez is PARI’s Urdu/Hindi translator since 2015. He is a Delhi-based journalist, the author of two books, and was associated with newspapers like ‘Roznama Mera Watan’, ‘Rashtriya Sahara’, ‘Chauthi Duniya’ and ‘Avadhnama’. He has a degree in History from Aligarh Muslim University and a PhD from Jawaharlal Nehru University, Delhi. You can contact the translator here:

M. Palani Kumar

M. Palani Kumar is a 2019 PARI Fellow, and a photographer who documents the lives of the marginalised. He was the cinematographer for ‘Kakoos’, a documentary on manual scavengers in Tamil Nadu by filmmaker Divya Bharathi.

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