आर. कृष्णा तमिलनाडु की कोटागिरी पंचायत के वेलरीकोम्बई गांव में एक तरह से प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। उन्होंने परंपरागत कुरुंबा चित्रकारी में अपनी निपुणता से स्थानीय तौर पर प्रसिद्धि हासिल की है। यह शैली ज्यामितीय और न्यूनतम है, और विषयों में शामिल हैं फ़सल कटाई के त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान, शहद इकट्ठा करने का अभियान और नीलगिरी के आदिवासियों की अन्य प्रथाएं।

हम उनसे घने जंगल में मिले, हरे-भरे चाय के बागानों और जोखिम भरे कटहल के पेड़ों से होकर, दो-घंटे की सीधी चढ़ाई के बाद। एकांत पहाड़ी रास्ते पर हेयरपिन को घुमाते हुए, मेरे दो साथी और मैं अचानक सूरज की रोशनी से भरे इलाके में लड़खड़ाते हुए, और कृष्णा के रास्ते में आ गए।

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कृष्णा के गांव, वेलरीकोम्बई के रास्ते में हरे-भरे चाय के बागान

उन्होंने हमारे अनौपचारिक आगमन पर कोई आपत्ति नहीं जताई, बल्कि काफी खुश हुए और अपने काम के बारे में बताने के लिए एक साफ़ जगह पर बैठ गए। एक पीले रंग की बोरी में नारंगी प्लास्टिक के अकॉर्डियन फोल्डर में कई दर्जन अख़बारों की कटिंग, तस्वीरें और उनकी कला के नमूने थे। वह इस पार्सल को अपने साथ हर जगह लेकर जाते हैं, शायद इसी तरह की आकस्मिक मुलाक़ात की चाह के लिए।

“एक बार, जिला कलेक्टर ने मेरी कुछ चित्रकारी में दिलचस्पी ली और [उन्हें] खरीदा,” 41 वर्षीय कृष्णा, हमें बडागा भाषा में बताते हैं। वह कहते हैं कि यह उनके करियर का सबसे गौरवपूर्ण पल था।

कृष्णा आदिवासी कलाकारों की लंबी क़तार के अंतिम कुछ में से एक हैं। कई कुरुंबा मानते हैं कि एलुथुपारई की विचित्र चट्टान कला के जनक उनके पूर्ज हैं। यह वेलरकोम्बई से तीन किलोमीटर दूर स्थित एक पुरातत्त्वीय स्थल है, जो 3,000 साल पुराना बताया जाता है। “इससे पहले, हम एलुथुपारई के पास रहते थे, जंगल के भीतरी इलाकों में,” कृष्णा कहते हैं। “आप इन चित्रों को केवल कुरुंबा [के बीच] में पा सकते हैं।”

कृष्णा के दादा भी प्रसिद्ध चित्रकार थे, जिन्होंने कई स्थानीय मंदिरों को सजाने में मदद की, और कृष्णा ने पांच वर्ष की आयु में उन्हीं से सीखना शुरू किया। आज, वह अपने दादा की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, कुछ परिवर्तनों के साथ: उनके पूर्वज जहां खड़ी चट्टानों पर छड़ी से चित्रकारी करते थे, वहीं कृष्णा कैनवास और हाथ से बने काग़ज़ पर ब्रश का प्रयोग करते हैं। वह, हालांकि, जैविक, घर में बने रंग का उपयोग स्थायी रूप से करते हैं, जो कि हमारे अनुवादक हमें बताते हैं, अपने रासायनिक रंगों की तुलना में कहीं ज़्यादा चमकदार और लंबे समय तक चलते हैं।

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बाएं : कृष्णा की चित्रकारी करते हुए एक फोटो का चित्र। दाएं: उनकी पूर्ण कलाकृतियों में से एक

कृष्णा के 8x10 आकार के मूल चित्र कोटागिरी में लास्ट फॉरेस्ट एंटरप्राइज़ेज़ की उपहार की दुकान में लगभग 300 रुपये में बिकते हैं। यह संस्था शहद और अन्य स्थानीय-उत्पादित माल बेचती है। उन्हें दो चित्र बनाने में लगभग एक दिन लगता है, और वह सप्ताह में 5-10 चित्र बेचते हैं। वह ग्रीटिंग कार्ड और बुकमार्क भी बनाते हैं, और उन्हें अक्सर स्थानीय घरों और व्यवसायों की दीवारों को कुरुंबा शैली में सजाने के लिए भी बुलाया जाता है। वह कभी-कभी कुरुंबा के बच्चों को कक्षाओं में यह कला सिखाते हैं। सभी ने कहा, अपनी इस कलात्मक कोशिश से वह प्रति माह 10,000-15,000 रुपये कमा लेते हैं।

वह शहद इकट्ठा करने वाले अभियान में शामिल होकर इसे परिपूर्ण करते हैं, जिससे वह सीज़न में 1,500-2,000 रुपये प्रति माह कमा लेते हैं। इस काम में ज़मीन से कई सौ फीट ऊपर चढ़कर, टीले की दरारों में बने छत्तों में धुआं करके वहां से शहद की मक्खियों को भगाना, फिर उनके द्वारा छोड़े गए तरल पदार्थ को इकट्ठा करना शामिल है। इन अभियानों के दौरान घातक दुर्घटनाएं होती हैं, भले ही वह कभी-कभार होती हों। इस शिकार में कितना बुरा हो सकता है उसकी याद दिलाते हुए, हमने जिस जगह पर कैम्प लगाया था, वहां से हमें एक सीधी चट्टान दिखाई दी, जहां कई साल पहले किसी की गिरकर मौत हो गई थी। अपने उस साथी के सम्मान में, शहद के शिकारी अब उस जगह बिल्कुल भी नहीं जाते हैं। खुशकिस्मती से, शहद इकट्ठा करते हुए स्वयं कृष्णा को जो सबसे बुरी चोट लगी, वह उनकी नाक पर मधुमक्खी का डंक है।

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वह चट्टान जहां से कई साल पहले शहद इकट्ठा करने वाले एक कुरुंबा की गिरकर मौत हो गई थी

हमारे वहां से रवाना होने से पहले, कृष्णा ने हमें वेलरीकोम्बई में अपने गांव का रास्ता बताया और वहां जाने के लिए आमंत्रित किया। हम वहां कुछ घंटे बाद पुहंचे। उनकी पत्नी, सुशीला ने हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया, और उनकी दो साल की बेटी, गीता ने कम उत्साहपूर्ण तरीके से अभिनंदन किया।

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कृष्णा की बेटी गीता, चौखट से शर्माते हुए झांक रही है (फोटो : ऑड्रा बास)। दाएं: उनकी पत्नी सुशीला, गीता के साथ

सुशीला ने शालीनता से उनके जैविक चित्रों के नमूने हमें दिखाए, जिसे कृष्णा पारंपारिक साधनों के अनुसार, वन्य पदार्थों से तैयार करते हैं। उनकी कलाकृतियों की प्रचुरता, मिट्टी की विशेषता सीधे तौर पर इन वन्य सामाग्रियों में देखी जा सकती है। कट्टेगाडा की पत्तियों से हरा रंग आता है; विभिन्न प्रकार के भूरे रंग वेंगई मारम पौधे के रस से आते हैं। करिमारम की छाल से काला रंग निकलता है, कलिमान रेत से पीला रंग, और बुरिमन रेत पूरी तरह से चमकदार सफेद रंग प्रदान करती है। लाल और नीले रंग कुरुंबा चित्रों में बहुत ही कम मिलते हैं।

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कृष्णा की कला के चरण : कट्टेगाडा के पत्ते, हाथ से बने जैविक रंग, और कुछ तैयार चित्र

कृष्णा अडिग हैं कि कुरुंबा कला आने वाली कई पीढ़ियों तक जीवित रहेगी। उनके लिए, चित्रकारी केवल व्यक्तिगत शौक ही नहीं है, बल्कि कुरुंबा संस्कृति को बनाए रखने का साधन भी है, जिसके बारे में वह महसूस करते हैं कि तेज़ी से नष्ट हो रही है। जब उनसे पूछा गया कि वह युवा कलाकारों को क्या सलाह देंगे, तो वह कहते हैं, “आप चाहें तो विश्वविघालयों में जा सकते हैं, लेकिन हमारी संस्कृति से बाहर न जाएं। फॉस्ट फूड अच्छी चीज़ नहीं है – वही खाएं जो प्राचीन लोग खाते थे। इन चित्रकारियों को जारी रखें, शहद इकट्ठा करना जारी रखें... सभी दवाएं यहां वनों में उपलब्ध हैं।”

कृष्णा प्राचीन और आधुनिक के बीच की अनिश्चितता से पूरी तरह सचेत हैं; बल्कि, जब हम बात कर रहे थे, उनका फोन बजने लगा, उसी प्रकार के संगीत से जो आपने शायद मुंबई के नाइट क्लब में सुना हो। हम सभी हंसने लगे और इंटरव्यू को जारी रखा, लेकिन कुछ पल के लिए, एकांत पहाड़ी की शांति भंग हो गई थी।

लास्ट फॉरेस्ट एंटरप्राइज़ेज़ के मार्केटिंग एग्ज़ीक्यूटिव, और नीलगिरी में मेरे अनुवादक और गाइड, सर्वानन राजन का तहेदिल से शुक्रिया। लास्ट फॉरेस्ट एंटरप्राइज़ेज़ से जुड़ी एआईएफ क्लिंटन फेलो, ऑड्रा बास का भी शुक्रिया जिन्होंने कोटागिरी में मेरे रहने की व्यवस्था की और मेरे साथ क्षेत्र का दौरा किया।

हिंदी अनुवादः वसुंधरा मनकोटिया

Olivia Waring

Olivia Waring is pursuing graduate studies in medicine and humanitarian engineering at Harvard University and the Massachusetts Institute of Technology. She worked at PARI in Mumbai from 2016-17, supported by an American India Foundation Clinton Fellowship.

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