
SANGUR, PUNJAB
|FRI, NOV 01, 2024
गांवों के त्योहार और उत्सवधर्मी ग्रामीण
पौराणिक कथाओं, प्रकृति और देवत्व का उत्सव, ऋतुओं का बदलना, अच्छी फ़सल से जुड़ी ख़ुशियां – भारतीय त्योहारों में ये सबकुछ शामिल है. ये त्योहार समुदायों को एकजुट करते हैं और लिंग व जाति की सीमाओं से उठकर, अनोखे तरीक़ों से धार्मिक खाई को पाट सकते हैं. एक तरफ़ ये निरंतरता लाते हैं, वहीं रोज़मर्रा के जीवन व श्रम से जुड़ी मुश्किलों के बीच राहत के दो पल भी प्रदान करते हैं. ग्रामीण भारत के विविध समुदायों के कारीगरों के बिना यह सब संभव नहीं होता, जिनकी मेहनत और शिल्पकलाओं के ज़रिए त्योहारों का संगीत, नृत्य, पूजा और भोज संभव हो पाता है. पारी की इन कहानियों में विविध त्योहारों और उत्सवों को दर्ज किया गया है.
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34. पट्टन कोडोली में पीले बादलों का पीछा…
हर साल होने वाली विट्ठल बीरदेव यात्रा के दौरान उत्सव और आस्था के जीवंत माहौल की झलक पेश करती फ़ोटो स्टोरी, जिसमें हर साल अक्टूबर महीने के आसपास धनगर और कुरुबा पशुपालक समुदाय के लोग इकट्ठे होते हैं
33. ‘अम्मा क्रोधित होकर समंदर में समा जाती हैं’
तमिल महीने मासी में इरुलर समुदाय के लोग चेन्नई के निकट मामल्लपुरम के समुद्र तटों पर कन्निअम्मा देवी को प्रसन्न करने के लिए एकत्र होते हैं, और उनकी आराधना करने के उद्देश्य से देवी को अपने घर ले जाते हैं. इस मौक़े पर समुद्रतट पर पुजारी विवाह संपन्न कराने के अलावा बच्चों का नामकरण भी करते हैं और श्रद्धालुओं को आशीर्वचन देते हैं
32. गंगरेल में विस्थापित देवी का नाच
दक्षिणी छत्तीसगढ़ में, गोंड आदिवासी गंगरेल मड़ई उत्सव मनाते हैं, और राज्य के अलग-अलग इलाक़ों से इस एकदिवसीय मेले में शामिल होते हैं
31. उगादी उत्सव: वर्चस्व और पहचान की कथा
आंध्र प्रदेश के मेडापुरम में सालाना उगादी उत्सव का भव्य आयोजन मडिगा समुदाय द्वारा किया जाता है, जो देवता की मूर्ति को अपने गांव में लेकर आए थे
30. मछुआरों के देवता में प्राण फूंकने वाला इकलौता मूर्तिकार
तिरुवल्लूर ज़िले के दिल्लि अन्ना उत्तरी चेन्नई के मछुआरा समुदायों के संरक्षक देवता कन्निसामी की मूर्तियों में जान फूंक देते हैं. ये मूर्तियां मिट्टी और धान की भूसी की मदद से बनाई जाती हैं. लेकिन अंधाधुंध शहरीकरण के कारण अब ये चीज़ें मुश्किल से मिल पाती हैं
29. इरुलर समुदाय के रीति-रिवाज़ों में कौन दे रहा है दख़ल?
तमिलनाडु के बंगलामेडु गांव में इरुलर समुदाय की देवी की पूजा और जश्न मनाने के जाने-पहचाने तौर-तरीक़ों में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा है
28. तुलुनाडु: सदियों पुरानी परंपरा का निबाह करते पटाखा कारीगर
कर्नाटक की धरती पर कई समन्वयवादी परंपराएं सांस लेती रही हैं. ऐसी ही एक परंपरा है, जिसमें मुस्लिम पुरुष विभिन्न धर्मों के धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए पटाखे बनाने और फेंकने का काम करते हैं. गर्नाल साइबेर और उनकी इस अनोखी कला पर आधारित फ़िल्म
27. चादर बादनी: संताली उत्सव में कठपुतली का खेल
तपन मुर्मू, बीरभूम के युवा आदिवासी किसान हैं, जो फ़सल की कटाई के उत्सव में कठपुतलियों का खेल भी दिखाते हैं. वह इस बात को लेकर ख़ासे चिंतित हैं कि उनकी पीढ़ी में इस कला को सीखने में किसी की दिलचस्पी नहीं है
26. माजुली का रास महोत्सव
असम में इस सालाना उत्सव को अलग-अलग जगहों पर बड़े धूमधाम से मनाया जाता है और लोग इसका साल भर इंतज़ार करते हैं. लेकिन समय के साथ असम के युवाओं में इस उत्सव के प्रति घटती दिलचस्पी और पलायन के चलते अब कलाकारों का मिलना मुश्किल होता जा रहा है
25. तुलुनाडु की भूत पूजा और भाईचारे की परंपरा
अरब सागर के किनारे स्थित, कर्नाटक के इस क्षेत्र में विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर भूत पूजा करते हैं. सैयद नासिर और उनकी संगीत मंडली इन अनुष्ठानों में संगीत प्रदर्शन करते हैं. यह फ़िल्म इस संगीत मंडली की विरासत पर आधारित है
24. लदाख में सागा दावा उत्सव का जुलूस
यह हनले नदी घाटी में मनाया जाने वाला तिब्बती बौद्धों का एक महत्वपूर्ण त्योहार है. ढोल-नगाड़ों की थाप और तुरही के संगीत के बीच, महामारी के बाद पहली बार छह बस्तियों के लोग एक साथ मिलकर इस उत्सव को मना रहे हैं
23. बस्तर: बांस के बंदूक से भगवान की सलामी
छत्तीसगढ़ में आयोजित वार्षिक गोंचा पर्व में, स्थानीय आदिवासी समुदाय अनूठे ढंग से अपने भगवान को सलामी पेश करते हैं
22. साईंनगर दरगाह के बगल में विराजे बच्चों के गणेश
आंध्रप्रदेश के अनंतपुर शहर में मनाया जाने वाला विनायक चविथी (चतुर्थी) बच्चों का पसंदीदा उत्सव है, जिसका जश्न वे कई हफ़्तों तक मनाते हैं
21. आठ दशकों से दीपावली को दीयों से रोशन करता एक कुम्हार
एस. परदेसम के हाथों से बने लाखों दीयों ने दिवाली के मौक़ों पर घरों को रोशनी से जगमग किया है. विशाखापट्टनम की कुम्मारी वीढ़ी के रहने वाले 92 वर्षीय परदेसम यहां के अंतिम कुम्हार हैं, जो दीप पर्व के लिए दिया बनाते हैं
20. सुरु घाटी में माह-ए-मुहर्रम
लद्दाख के करगिल ज़िले के ताई सुरु गांव में शिया मुसलमानों द्वारा मुहर्रम मनाने के लिए शुरू हो चुके रीति-रिवाज़ कई दिनों से जारी हैं. बच्चों, ख़ासकर लड़कियों के लिए यह अपनी सहेलियों से मिलने-जुलने और उनके साथ घंटों वक़्त गुज़ारने का एक बेहतर मौक़ा होता है
19. गुजरात: संक्राति के मौक़े पर आसमान में रंग भरने वाले पतंग-निर्माता
खंभात और अहमदाबाद की पतंग बनाने वाली महिलाओं का कठोर जीवन, उनकी मेहनत से रोशन होने वाले रंग-बिरंगे आसमान के बिल्कुल विपरीत है
18. ढाक और ढाकियों के होने से जुड़ी है दुर्गा पूजा की रौनक
11 अक्टूबर से दुर्गा पूजा शुरू हो रही है और अगरतला के ढाकियों के ड्रम अभी से बजने लगे हैं. साल के बाक़ी समय में ये ढाकी रिक्शा चलाते हैं, ठेला लगाते हैं या फेरीवाले, किसान, प्लंबर, और इलेक्ट्रिशियन के रूप में काम करते हैं
17. माला में पिरोए फूलों की तरह नाचना और गीत गाना
सर्दियों के महीने में होने वाले समारोहों और उत्सवों के दौरान, छत्तीसगढ़ के गोंड समुदाय के युवा पुरुष और महिलाएं हल्की मांदरी और कोलांग नृत्य करने के लिए एक साथ यात्रा करते हैं, और रेला गीत गाते हैं
16. विशाखापट्टनम: क़र्ज़ में डूबे कुम्हार परिवारों के अरमानों का विसर्जन
आंध्र प्रदेश के कारीगर इस सप्ताह गणेश चतुर्थी से शुरू हो रहे त्योहारों के मौसम में आम तौर पर सबसे अधिक कमाते हैं. लेकिन उन्हें इस साल अब तक गणेश की मूर्तियों और अन्य उत्पादों के लिए एक भी थोक ऑर्डर नहीं मिला है
15. लॉकडाउन के बीच नुक़सान से घिरे कुम्हार
इस सप्ताह शुरू होने वाला गणपति उत्सव, फिर दुर्गा पूजा और दिवाली, दिल्ली के उत्तम नगर के कुम्हारों के लिए सबसे ज़्यादा कमाई वाले सीज़न हुआ करते थे. लेकिन अब, वे कच्छ और पश्चिम बंगाल के कुम्हारों की तरह ही बिक्री का सबसे ख़राब समय देख रहे हैं
14. देव, नृत्य की रंगमंचीय प्रस्तुति और दैवीय हस्तक्षेप
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ और उडुपी ज़िले में तक़रीबन एक सदी पुराने इस अनुष्ठान में देव रूप में अभिनय करने वाला व्यक्ति दलित समुदाय से आने वाले भुला दिए गए नायकों की कहानियां रंगमंचीय भंगिमाओं के साथ प्रस्तुत करने के साथ-साथ, आपसी वाद-विवाद को सुलझाता है और प्रबल भावनाओं का शमन करते हुए दर्शकों को विरेचन की अवस्था तक ले जाता है
13. ओडिशा में, अनाज के ख़िलाफ़ जश्न
ओडिशा के कंधमाल जिले में, आदिवासी महिलाएं स्वदेशी बीजों का संरक्षण पीढ़ियों से करती आ रही हैं; वार्षिक उत्सव में, वे बीजों पर चर्चा करने और अनुष्ठान तथा उत्सव के माध्यम से उनका आदान-प्रदान करने के लिए एक जगह एकत्र होती हैं
12. क्रोधित और भयावह, नाचना और कोड़े लगाना
हैदराबाद के एक ऑटो-पार्ट्स डीलर, पोसानी अश्विन हर साल बोनालू उत्सव के दौरान पोथुराजू – जिनके बारे में मान्यता है कि वह बीमारियों को ठीक करने वाले देवता हैं – का रूप धारण करते हैं, लोगों को आशीर्वाद देते और भीड़ को अपनी ओर आकर्षित करते हैं
11. धूलपेट के देवताओं के मूर्तिकार
शिल्पकारों का समूह, जिनमें से अधिकतर प्रवासी हैं, अभी चल रहे गणेश चतुर्थी उत्सव के पहले मूर्तियां बनाने हैदराबाद आते हैं, लेकिन वे कहते हैं कि बाज़ार में सस्ता सामान होने के कारण काम स्थाई नहीं है
10. मदुरई में भगवान के अपने वस्त्र निर्माता
मदुरई में ऐतिहासिक अझगर उत्सव में – इसका अंतिम दिन आज ही, 22 अप्रैल को है – एक विशाल जुलूस निकलता है, जिसमें कुछ भक्त रंगीन वेशभूषा धारण करते हैं। लेकिन उनके वस्त्र निर्माता कौन हैं यह इससे भी ज़्यादा दिलचस्प है
9. वारलियों की बस्ती में हाल की एक दीवाली
मुंबई के ठीक बाहर एक आदिवासी पाड़ा में, आतिशबाजी और शहर की रोशनी से दूर, मेरे परिवार ने पारंपरिक व्यंजनों, सामुदायिक अनुष्ठानों, प्रकृति की श्रद्धा तथा खुशी के साथ इस साल दीवाली मनाई, जैसा कि वे हर साल मनाते हैं
8. बदलते अयोध्या में बदलता रामकथा के मंचन का स्वरूप
दशहरे के महीने में, रामकथा सिंगिंग पार्टी नामक साधारण सी गायन मंडली, दिन की अपनी नौकरी पर वापस लौटने के पहले, एक मंच से दूसरे मंच तक भागती-दौड़ती रहती हैं. वहीं, दूसरी ओर रामकथा का मंचन समकालीन राजनीति के साए से घिरता जा रहा है
7. बंगाल और बड़ौदा साथ मिलकर गढ़ते हैं गणपति की अद्भुत मूर्तियां
वड़ोदरा में पश्चिम बंगाल से गए प्रवासी मूर्तिकार इस कला में अपने गृहराज्य के स्थानीय प्रभावों का सुंदर समायोजन करते हैं. शहर में तपन मंडल जैसे कुछ मूर्तिकार अपना ख़ुद का मूर्तिखाना चलाते हैं, जबकि बहुत से ऐसे कारीगर भी हैं जो आजीविका के लिए खेतिहर मज़दूरी, घरों में रंग-रोगन, और कई तरह के दूसरे काम भी करते हैं
5. मुनस्यारी की महिलाओं के होली गीत
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के गांवों में, होली का त्योहार वह मौक़ा होता है जब महिलाएं जमकर नृत्य करती हैं और उनके गाए गीत पहाड़ों में गूंजते सुनाई देते हैं. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर केंद्रित, पारी की शृंखला के तहत यह फ़ोटो स्टोरी प्रस्तुत है
4. सोहराई के गीत
बिहार की चिरचिरिया बस्ती में रहने वाली संताल महिलाएं कटाई के सीज़न में होने वाले उत्सव के दौरान अपनी जीवनशैली के बारे में गीत गाती हैं, वहीं पुरुष वाद्ययंत्र बजाते हैं, और इस मौक़े पर महुआ के साथ-साथ भोज होता है
3. कुमारटुलि की गलियां, कुम्हारों की मूर्तियां
कोलकाता की सदियों पुरानी कुम्हारों की बस्ती में, कारीगर रात भर मिट्टी की मूर्तियां बनाते हैं, जिन्हें वे जल्द ही दुर्गा पूजा के लिए शहर में भेजेंगे
2. मनुष्यों और बाघों की मां बनबीबी
पश्चिम बंगाल के सुंदरबन की जंगल देवी की मांग है कि जानवरों की दुनिया के साथ उनके समझौते को हिन्दू और मुसलमान, दोनों साथ मिलकर बरक़रार रखें
1. पश्चिम बंगाल की तुबड़ी प्रतियोगिता
पश्चिम बंगाल के मकरदह गांव का पूर्बान्नपाड़ा समुदाय सबसे प्रकाशमान व बड़ी तुबड़ी या आतिशबाज़ी वाली बत्ती बनाने की वार्षिक प्रतियोगिता का आयोजन करता है
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