
SANGUR, PUNJAB
|SAT, JAN 30, 2021
महिला स्वास्थ्य पर केंद्रित पारी की शृंखला
इस शृंखला के तहत पूरे भारत के अलग-अलग इलाक़ों से स्टोरी/रपटें तैयार की गई हैं, जिन्हें पारी आपके लिए लेकर आया है. इस शृंखला में महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को व्यापक स्तर पर कवर किया गया है. मसलन, मां न बन पाने को लेकर बदनाम किया जाना, महिला नलबंदी पर ज़ोर, परिवार नियोजन में ‘पुरुषों के भागीदारी’ में कमी, अपर्याप्त ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणालियां (तमाम समुदायों/लोगों को तो ये अपर्याप्त सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं), अयोग्य चिकित्सक और बच्चों की जोख़िम भरी डिलीवरी, माहवारी के कारण भेदभाव, और संतान के रूप में बेटों को वरीयता देने जैसे मुद्दे इस शृंखला में शामिल किए गए हैं. इन स्टोरीज़ में स्वास्थ्य संबंधी पूर्वाग्रहों और कुप्रथाओं, लोगों और समुदायों, जेंडर (लिंग) और अधिकारों, और ग्रामीण भारत की महिलाओं के रोज़मर्रा के संघर्षों व बेहद कभी-कभार मिलने वाली छोटी-छोटी जीतों के किस्सों को जगह दी गई है
Author
Translator
49. वज़ीरिथल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर छाया अंधेरा
जम्मू और कश्मीर के बांदीपुर ज़िले के एक सुदूर गांव में गर्भवती महिलाएं अनियमित बिजली आपूर्ति और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली से जूझ रही हैं. उनकी एकमात्र उम्मीद गांव की एक बूढ़ी दाई हैं
48. बीड़ी बांधने में धुआं होती महिला मज़दूरों की ज़िंदगी
मुर्शिदाबाद ज़िले में, सबसे ज़्यादा ग़रीब तबकों से आने वाली औरतें बीड़ी बनाने का काम करती हैं, जो शारीरिक रूप से थकाऊ और बेहद कम पारिश्रमिक वाला रोज़गार है. तंबाकू के लगातार संपर्क में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य तो ख़राब रहता ही है, प्रजनन स्वास्थ्य भी ख़तरे में बना रहता है
47. माहवारी के चलते ख़ुद के घर में बेदख़ल आधी आबादी
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर की महिलाएं उन पूर्वाग्रहों और कठिनाइयों के बारे में बताती हैं जो उन्हें माहवारी और प्रसव के दिनों में झेलनी पड़ती हैं
46. हिमाचल प्रदेश: जीप की पिछली सीट पर बच्चे की डिलीवरी
सुलभ चिकित्सा सेवाओं के अभाव और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की निष्क्रियता के चलते, हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को मातृत्व स्वास्थ्य से जुड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है
45. असहनीय यंत्रणाओं से गुज़रतीं असुंडी की दलित महिलाएं
कम मज़दूरी और पेट भरने लायक खाना नहीं मिलने के कारण हावेरी ज़िले के इस गांव की औरतों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है. उनकी कॉलोनी में शौचालयों की अनुपलब्धता के कारण माहवारी संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रसित औरतों की स्थिति ज़्यादा ख़राब है
44. ‘मैं नलबंदी कराने के लिए घर से अकेली ही निकल गई थी’
उनके परिवारों के मर्द सामान्यतः सूरत और अन्य शहरों में प्रवासी मज़दूरों के रूप में काम करते हैं, इसीलिए उदयपुर की गमेती समुदाय की इन अकेली औरतों ने स्वास्थ्य और गर्भनिरोध जैसे मामलों में आत्मनिर्भर होना सीख लिया है, और अपने फ़ैसले ख़ुद लेती हैं
43. ‘मुझे पांचवां बच्चा नहीं चाहिए था’
सुनीता देवी भविष्य में गर्भ ठहरने से बचने के लिए एक सुरक्षित और आसान तरीक़ा चाहती थीं, लेकिन कॉपर-टी के नाकाम होने के बाद उन्हें गर्भपात कराने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) से लेकर निजी क्लिनिकों और दिल्ली के सरकारी अस्पतालों से लेकर बिहार तक का चक्कर लगाने को विवश होना पड़ा
42. अमेठी: जिनके पास सुरक्षित है औरतों की तबीयत की कुंजी
अमेठी ज़िले के टिकरी गांव की महिलाओं के लिए कलावती सोनी भरोसे की एक ऐसी कड़ी हैं जिनसे उन्हें गर्भनिरोधक गोलियां और कंडोम जैसी आवश्यक वस्तुएं मिल जाती हैं. कलावती ही गांव में प्रजनन अधिकारों के संदेश की संवाहक बनी हुई हैं
41. बीड की महिला मज़दूर: गर्भाशय निकलवाने के बाद टूटा मुश्किलों का पहाड़
बीड ज़िले में गन्ने के खेतों में काम करने वाली महिला मज़दूरों की एक बड़ी आबादी को गर्भाशय निकलवाने की सर्जरी से गुज़रने के बाद से तनाव, अवसाद, शारीरिक बीमारियों, तथा क्लेशपूर्ण वैवाहिक संबंधों से जूझना पड़ रहा है
40. ‘मैं नहीं चाहती थी कि लोगों को मेरे गर्भपात के बारे में मालूम चले’
उनकी नदी का पानी ज़रूरत से ज़्यादा खारा है, गर्मी के दिनों में ज़रूरत से ज़्यादा गर्मी पड़ती है, और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच अभी सपना मात्र है. इन सब कारणों के चलते, सुंदरबन की महिलाएं स्वास्थ्य समस्याओं के चक्रव्यूह में फंस गई हैं
39. ‘दवाओं के बदले वे मेरा बदन टटोलते हैं’
यौनकर्मियों को अस्पताल के कर्मचारियों का शोषण झेलना पड़ता है, उन्हें अपमानित किया जाता है, उनकी गोपनीयता का उल्लंघन होता है. देश की राजधानी में रहते हुए भी, धारणाओं के बोझ तले दबकर वे स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाती हैं. अब महामारी ने उन्हें और भी हाशिए पर ढकेल दिया है
38. झारखंड: 'झोला-छाप' डॉक्टरों के भरोसे छूटा स्वास्थ्य सेवाओं का संसार
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम ज़िले के दूरदराज़ के गावों में स्वास्थ्य सेवाएं बेहिसाब ख़स्ता-हाल हैं. बुनियादी ढांचे की चुनौतियां इसे और भी अधिक जर्जर बनाती हैं. ऐसे में 'रूरल मेडिकल प्रैक्टिशनर' यानी 'झोला-छाप डॉक्टरों' को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन हो गया है, और स्वास्थ्य सेवाओं का सारा बोझ इंसानी भरोसे की महीन डोर पर आ टिका है
37. मेलघाट की आख़िरी पारंपरिक प्रसाविकाएं
महाराष्ट्र के मेलघाट टाइगर रिज़र्व के आसपास की आदिवासी बस्तियों में, रोपी और चारकू जैसी पारंपरिक दाइयों ने ही दशकों से घर पर बच्चों की डिलीवरी करवाई है. लेकिन, अब दोनों बूढ़ी हो चुकी हैं और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं है
36. उत्तर प्रदेश: पुरुष नसबंदी तो कोई विकल्प ही नहीं
उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले की मुसहर महिलाओं के पास बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच न होना उन्हें और हाशिए पर ढकेलता है. साथ ही, समुदाय के जातिगत उत्पीड़न का इतिहास उनके अधिकारों को और सीमित कर देता है
35. मधुबनी: जहां बेटियों के जन्म प्रमाणपत्र नहीं बनते
बिहार के मधुबनी ज़िले के ग़रीब व आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों से ताल्लुक़ रखने वाली औरतों को मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बनाने व उनका लाभ उठाने के लिए मुसीबतों के भंवर से गुज़रते हुए तमाम तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है. इसलिए व्यवस्था के जिस तंत्र से उन्हें थोड़ी-बहुत मदद या राहत मिल जाती है, जब उसमें भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, तो फिर बेबसी के आलम में उनके पास बस हताशा ही बचती है
34. यूपी: हाथरस जैसे मामलों के डर से दलितों में बढ़ रहा बाल विवाह का चलन
सोनू और मीना की कहानी, प्रयागराज के ग्रामीण इलाक़ों की दलित बस्तियों में रहने वाली तमाम किशोर बच्चियों की कहानी है. सोनू और मीना की जल्द ही शादी होने वाली है, जबकि उनकी उम्र अभी काफ़ी कम है
33. 'सास कहती है कि तीन बेटियां हुईं, इसलिए कम से कम दो बेटे पैदा करने होंगे'
ग़रीबी, अशिक्षा, और जीवन पर अपने नियंत्रण के अभाव के चलते, बिहार के गया ज़िले की भिन्न-भिन्न तबकों की औरतों का स्वास्थ्य लगातार जोख़िम में बना हुआ है
32. दिल्ली: महामारी के बीच औरतों के स्वास्थ्य के साथ चल रहा खिलवाड़
जब दीपा डिलीवरी के बाद दिल्ली के एक अस्पताल से वापिस लौटीं, तो उन्हें नहीं मालूम था कि उनके शरीर में कॉपर-टी लगाया जा चुका था. दो साल बाद जब उन्हें दर्द और रक्तस्राव होने लगा, तो डॉक्टर कई महीनों तक डिवाइस का पता ही नहीं लगा सके
31. 'हर वक़्त यही लगता है कि किसी मर्द की आंखें मुझे घूर रही हैं'
बंद पड़े सार्वजनिक शौचालय, सुदूर ब्लॉक, परदे से ढंके छोटे डब्बे जैसे टॉयलेट, नहाने और सैनिटरी पैड के इस्तेमाल व निपटान के लिए निजता का अभाव, रात के समय शौच के लिए रेल की पटरियों पर जाने की मजबूरी: ये ऐसी मुश्किलें हैं जिनका सामना पटना की झुग्गी बस्तियों में रहने वाली लड़कियां हर रोज़ करती हैं
30. नदियों की कसमें खाने वाले देश में पानी के बदले कैंसर मुफ़्त
बिहार के गांवों में ग्राउंडवॉटर (भूजल) में मौजूद आर्सेनिक के चलते कैंसर होने से, प्रीति जैसे तमाम परिवारों ने घर के पुरुष और महिला सदस्यों को खोया है, और ख़ुद प्रीति के स्तन में भी गांठ बन गई है. इतना सबकुछ झेलने के बाद, यहां की औरतों को इलाज कराने में भी अक्सर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है
29. ‘मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटियों की भी वही हालत हो जो मेरी है’
बिहार के पटना ज़िले की बालिका और किशोर वधुओं के सामने बेटे की चाह में बच्चे पैदा करते जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है. उनके हालात में सामाजिक रीति-रिवाज़ों और पूर्वाग्रहों की भूमिका क़ानून और क़ानूनी क़ायदों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है...
28. हर महीने कारावास झेलती हैं काडूगोल्ला समुदाय की औरतें
क़ानून, सामाजिक जागरूकता अभियान, और व्यक्तिगत संघर्षों के बावजूद सामाजिक कलंक और दैवीय प्रकोप के डर से, कर्नाटक के काडूगोल्ला समुदाय की औरतें प्रसव के बाद और माहवारी के दौरान पेड़ों के नीचे और झोपड़ियों में खुद को अलग-थलग रखने के लिए मजबूर हैं.
27. समाज मुझे शादी के लायक नहीं समझता है!
बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले के चतुर्भुज स्थान की सेक्स वर्कर्स (यौनकर्मी), अक्सर अपने 'परमानेंट' ग्राहकों को ख़ुश करने चक्कर में कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं; कोविड-19 की वजह से लगे लॉकडाउन के कारण उनके हालात बेहद ख़राब हैं.
26. मलकानगिरी: जहां प्रसव से पहले पहाड़ लांघती हैं गर्भवती औरतें
ओडिशा के मलकानगिरी में जलाशय क्षेत्र की आदिवासी बस्तियों में, घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और राज्य-मिलिटेंट संघर्ष के बीच, नाव की अनियमित यात्रा-सेवाएं और टूटी सड़कें ही वहां की दुर्लभ स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने का एकमात्र ज़रिया हैं
25. बिहारः कोरोना काल में भी नहीं रुका बाल विवाह का सिलसिला
बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में पिछले साल लॉकडाउन के दौरान, गांव लौटे प्रवासी मज़दूर युवकों से बहुत सी किशोरियों की शादी कर दी गई थी. उनमें से कई अब गर्भवती हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं
24. मधुबनी में हौले से बह रही बदलाव की बयार
एक दशक पहले तक बिहार के हसनपुर गांव में परिवार नियोजन को दरकिनार कर दिया जाता था. लेकिन अब यहां की महिलाएं अक्सर स्वास्थ्यकर्मियों सलहा और शमा के पास गर्भनिरोधक इंजेक्शन लगवाने आती हैं. यह बदलाव कैसे हुआ?
23. बिहार: मुट्ठी भर महिला डॉक्टरों के कंधों पर पूरे महिला स्वास्थ्य का बोझ
बिहार के किशनगंज ज़िले में काम करने वाली कुछ महिला स्त्रीरोग विशेषज्ञों का दिन काफ़ी लंबा बीतता है; चिकित्सकीय आपूर्ति कम ही रहती है, और मरीज़ों की एक से ज़्यादा बार गर्भावस्था व गर्भनिरोधक को लेकर उनकी अनिच्छा से निपटना एक कठिन कार्य होता है
22. गुजरात: बेटे की चाह में बच्चा पैदा करने की मशीन बनीं औरतें
गुजरात के ढोलका तालुका में भारवाड़ पशुपालक समुदाय की महिलाओं के लिए, बेटे पैदा करने का दबाव और परिवार नियोजन के कुछ ही विकल्पों का मतलब होता है कि गर्भनिरोधक और प्रजनन से जुड़े अधिकार केवल शब्दों तक ही सीमित हैं
21. ‘वह कहते हैं कि अगर मैं पढ़ती रही, तो मुझसे शादी कौन करेगा?’
बिहार के समस्तीपुर ज़िले में, महादलित समुदायों की किशोर लड़कियों को सिर्फ़ इसलिए समाज के ताने सुनने पड़ते हैं, और शारीरिक हिंसा का भी सामना करना पड़ता है कि वे स्कूल न जाएं, अपने सपनों को छोड़ दें, और शादी कर लें. कुछ लड़कियां इसका विरोध करने की कोशिश करती हैं, वहीं बाक़ी हार मान लेती हैं
20. ‘हम यहीं काम करते हैं और फिर हमें यहीं सोना भी पड़ता है’
बिहार के दरभंगा ज़िले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जगह की कमी और सुविधाओं के अभाव के कारण वहां के स्वास्थ्य कर्मियों को ऑफ़िस में, वार्ड के बिस्तर पर, और कभी-कभी फ़र्श पर भी सोने के लिए मजबूर होना पड़ता है
19. वैशाली: बिना किसी जांच के बच्ची को किया गर्भ में मृत घोषित
बिहार के वैशाली ज़िले का एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जहां की अल्ट्रासाउंड मशीन मकड़ियों का घर बन चुकी है और जहां के कर्मचारी पैसे मांगते हैं; एक परिवार को बताया गया कि उनका अजन्मा बच्चा मर चुका है - जिसके चलते उन्हें ज़्यादा पैसे ख़र्च करके निजी अस्पताल की ओर भागना पड़ा
18. झोलाछाप डॉक्टर लगा रहे इंजेक्शन, जर्जर हाल में पड़ा स्वास्थ्य केंद्र
कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जहां जंगली जानवर घूमते हों, अस्पताल जाने में डर लगता हो, फ़ोन की कनेक्टिविटी ख़राब हो - इन सभी चीज़ों के चलते बिहार के बड़गांव खुर्द गांव की गर्भवती महिलाएं घर पर ही डिलीवरी कराने को मजबूर हैं
17. अल्मोड़ा: जहां गर्भवती औरतों और अस्पतालों के बीच है पहाड़ जितनी दूरी
पिछले साल, उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की रानो सिंह ने पहाड़ी रास्ते से अस्पताल जाते हुए, सड़क पर ही बच्चे को जन्म दिया. यह एक ऐसा इलाक़ा है जहां पहाड़ी रास्तों और भारी ख़र्चों के कारण पहाड़ी बस्तियों में रहने वाली बहुत-सी औरतें घर पर ही बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर हैं
16. जबरन नलबंदी से हुई मौत ने खोली सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली की कलई
राजस्थान के बांसी गांव की भावना सुथार की पिछले साल एक ‘शिविर’ में नलबंदी प्रक्रिया के बाद मृत्यु हो गई, जहां नियमों का उल्लंघन करते हुए उन्हें विकल्पों पर विचार करने का समय नहीं दिया गया था. उनके पति दिनेश को अब भी न्याय की तलाश है
15. नौ महीने की गर्भावस्था में भी ग्राहक से मिलने को मजबूर
चार बार के गर्भपात, शराबी पति, और कारखाने की नौकरी छूट जाने के बाद, दिल्ली की रहवासी हनी ने पांचवीं बार गर्भवती होने पर यौनकर्मी बनने का फ़ैसला किया और तब से उन्हें एसटीडी है. अब, लॉकडाउन में वह आजीविका के लिए संघर्ष कर रही हैं
14. क्या महिलाओं को बच्चेदानी निकलवाने के लिए मजबूर किया जा रहा?
नलबंदी के बाद संक्रमण हो जाने के कारण, राजस्थान के दौसा ज़िले की 27 वर्षीय सुशीला देवी को तीन वर्षों तक दर्द झेलना पड़ा, अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े. उनका क़र्ज़ बढ़ता गया और अंत में उन्हें अपना गर्भाशय निकलवाना पड़ा
13. ‘किसान परिवार की औरतें कभी आराम नहीं कर सकतीं’
सारा जीवन बीमारी और कई सर्जरी से जूझने के बाद, पुणे ज़िले के हडशी गांव की बिबाबाई लोयरे का शरीर झुककर सिकुड़ गया है. इसके बावजूद, वह खेती से जुड़े काम करती हैं और अपने लक़वाग्रस्त पति की देखभाल भी करती हैं
12. गर्भाशय की मुश्किलों से जूझती औरतें कर रहीं अंतहीन दर्द का सामना
महाराष्ट्र के नंदुरबार ज़िले में गर्भाशय के प्रोलैप्स की समस्या से जूझ रही भील महिलाओं की पहुंच चिकित्सा सुविधाओं तक नहीं है. सड़क या मोबाइल कनेक्टिविटी तक न होने के कारण इन संघर्षरत महिलाओं को डिलीवरी से जुड़ी मुश्किलों और अंतहीन दर्द का सामना करना पड़ता है
11. शारीरिक-मानसिक अक्षमता की शिकार महिलाओं को बोझ समझता है समाज
मानसिक रूप से अक्षम महिलाओं के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन, अक्सर उन्हें अपना गर्भाशय निकलवाने के लिए मजबूर करके किया जाता है. लेकिन महाराष्ट्र के वाडी गांव में, मालन मोरे भाग्यशाली हैं कि उन्हें अपनी मां का साथ मिला
10. ‘लगभग 12 बच्चों के बाद यह अपने आप रुक जाता है’
हरियाणा के बीवां गांव में, गर्भनिरोधक तक मेव मुसलमानों की पहुंच सांस्कृतिक कारकों, दुर्गम स्वास्थ्य सेवाओं और उदासीन प्रदाताओं के कारण मुश्किल है – परिणामस्वरूप वहां की महिलाएं बच्चे पैदा करने के चक्र में फंस जाती हैं
9. उत्तर प्रदेश: मुफ़्त सैनिटरी पैड न मिलने से उपेक्षा का शिकार है छात्राओं का स्वास्थ्य
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले में स्कूल बंद पड़े होने के कारण, ग़रीब परिवारों की लड़कियों को मुफ़्त सैनिटरी नैपकिन नहीं मिल पा रहा है, इसलिए अब वे जोख़िम भरे विकल्प अपनाने को मजबूर हैं. सिर्फ़ यूपी में ही ऐसी लड़कियों की संख्या लाखों में है
8. नियमत वेतन नहीं देता, पर आशा वर्कर से गाय-गोरू तक गिनवा लेता है प्रशासन
मामूली वेतन के साथ, कभी न ख़त्म होने वाले सर्वेक्षणों, रिपोर्टों और अन्य कामों के बोझ से लदी सुनीता रानी व हरियाणा के सोनीपत ज़िले की अन्य आशा कार्यकर्ता, ग्रामीण परिवारों की प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही हैं
7. नीलगिरी: विरासत में मिले कुपोषण के चलते अंधकार में घिरा आदिवासी बच्चों का भविष्य
तमिलनाडु के गुडलूर में हीमोग्लोबिन की बेहद कमी से जूझ रही माएं, 7 किलो वज़न वाले दो साल के बच्चे, शराब की लत, गिरती आमदनी, और जंगल से बढ़ती दूरी अब आम बात हो गई है और आदिवासी महिलाओं में बेहद तेज़ी से कुपोषण फैल रहा है
6. ‘एक पोते की चाहत में हमारे चार बच्चे हो गए’
दिल्ली से लगभग 40 किलोमीटर दूर हरियाणा के हरसाना कलां गांव की महिलाएं बता रही हैं कि कैसे समाज में पुरुषों की दबंगई को बर्दाश्त करते हुए उन्हें अपनी ज़िंदगी से जुड़े फ़ैसले ख़ुद लेने और प्रजनन-संबंधी विकल्पों पर अपना वश पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है
5. ‘अब मेरी बकरियां ही मेरी संतानें हैं’
महाराष्ट्र के नंदुरबार ज़िले के धड़गांव इलाक़े की भील महिलाएं लांछन, सामाजिक बहिष्कार, और बांझपन का कारगर इलाज करने में नाकाम ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की वजह से, संघर्ष करते हुए जीवन व्यतीत कर रही हैं
4. ‘पिछले साल सिर्फ़ एक आदमी नसबंदी के लिए राज़ी हुआ’
परिवार नियोजन के मामले में ‘पुरुषों की संलग्नता’ शब्द का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन बिहार के ‘विकास मित्रों’ और ‘आशा कार्यकर्ताओं' को पुरुषों को नसबंदी के लिए तैयार करने के मामले में बेहद कम सफलता मिली है और अनचाहे गर्भ को रोकने की ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधे पर होना आज भी बदस्तूर जारी है
3. झोलाछाप डॉक्टरों का इलाज: ख़तरे में औरतों को ज़िंदगी
सभी तरह की सुविधाओं से लैस छत्तीसगढ़ के नारायणपुर ज़िले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ज़्यादातर आदिवासी महिलाओं की पहुंच से दूर हैं, इसलिए वे गर्भपात और प्रसव के वक़्त जोख़िम उठाते हुए झोलाछाप डॉक्टरों की ओर रुख़ करती हैं
2. नसबंदी कराने का ज़िम्मा भी बस औरतों के माथे
सुप्रीम कोर्ट के 2016 के आदेश के बाद नसबंदी शिविरों की जगह अब ‘नसबंदी दिवस’ ने ले ली है, लेकिन आज भी नसबंदी मुख्य रूप से महिलाओं की ही की जाती है; और यूपी में बहुत सी महिलाएं अन्य किसी आधुनिक गर्भनिरोधक तरीक़े के मौजूद नहीं होने की वजह से यह क़दम उठाती हैं क्योंकि और कोई विकल्प भी उपलब्ध नहीं
1. 'रूढ़ियों के साए में बेबस है कूवलापुरम की औरतों की ज़िंदगी'
मदुरई ज़िले के कूवलापुरम और चार अन्य गांवों में माहवारी के दौरान औरतों को आइसोलेट करते हुए ‘गेस्टहाउस’ में रहने के लिए भेज दिया जाता है. दैवीय प्रकोप की आशंका और इंसानों के आक्रामक व्यवहार से डर की वजह से यहां कोई भी इस भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने का साहस नहीं जुटा पाता
Want to republish this article? Please write to [email protected] with a cc to [email protected]
Donate to PARI
All donors will be entitled to tax exemptions under Section-80G of the Income Tax Act. Please double check your email address before submitting.
PARI - People's Archive of Rural India
ruralindiaonline.org
https://ruralindiaonline.org/articles/महिलाओं-के-स्वास्थ्य-पर-पारी-की-श्रृंखला


















































