कांताबेन की 30 वर्षीय बहू, कनकबेन भारवाड़ कहती हैं, “आशा [मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता] कार्यकर्ता हमें सरकारी अस्पताल ले जाती हैं. लेकिन हम सभी डरे हुए हैं.” उन्होंने सुना था कि “ऑपरेशन के दौरान एक महिला की मौक़े पर ही मौत हो गई थी. डॉक्टर ने ग़लती से कोई और नली काट दी और ऑपरेशन टेबल पर ही उसकी मौत हो गई. इस घटना को अभी एक साल भी नहीं हुआ है.”
लेकिन ढोलका में गर्भधारण भी जोख़िम भरा है. सरकार द्वारा संचालित सामूहिक आरोग्य केंद्र (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, सीएचसी) के एक परामर्शदाता चिकित्सक का कहना है कि अशिक्षा और ग़रीबी के कारण महिलाएं लगातार गर्भधारण करती रहती हैं और दो बच्चों के बीच में उचित अंतराल भी नहीं होता. वह बताते हैं, “कोई भी महिला नियमित रूप से चेक-अप के लिए नहीं आती है. केंद्र का दौरा करने वाली अधिकांश महिलाएं पोषण संबंधी कमियों और अनीमिया से पीड़ित होती हैं." उनका अनुमान है कि “यहां आने वाली लगभग 90% महिलाओं में हीमोग्लोबिन 8 प्रतिशत से कम पाया गया है.”
ख़राब बुनियादी ढांचा और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में कुशल कर्मचारियों की कमी स्थिति को और भी बदतर बनाती है. कोई सोनोग्राफ़ी मशीन नहीं है, और लंबे समय के लिए कोई पूर्णकालिक स्त्री रोग विशेषज्ञ या संबद्ध एनेस्थेटिस्ट कॉल पर उपलब्ध नहीं होता है. एक ही एनेस्थेटिस्ट सभी छह पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र), एक सीएचसी, और ढोलका के कई निजी अस्पतालों या क्लीनिकों में काम करता है और मरीज़ों को उसके लिए अलग से भुगतान करना पड़ता है.
उधर, खानपार गांव के उस कमरे में, महिलाओं के अपने ही शरीर पर नियंत्रण की कमी से नाराज़, एक तेज़ आवाज़ इस बातचीत के दौरान गूंजती है. एक साल के बच्चे को गोद में लिए एक युवा मां क्रोधित होकर पूछती है: “तुम्हारा क्या मतलब है कि कौन फ़ैसला करेगा? मैं फ़ैसला करूंगी. यह मेरा शरीर है; कोई और फ़ैसला क्यों करेगा? मुझे पता है कि मुझे दूसरा बच्चा नहीं चाहिए. और मैं गोलियां नहीं लेना चाहती. तो अगर मैं गर्भवती हो गई, तो क्या हुआ; सरकार के पास हमारे लिए दवाइयां हैं, हैं कि नहीं? मैं दवा [इंजेक्टेबल गर्भनिरोधक] ले लूंगी. केवल मैं ही फ़ैज़सला करूंगी.”
हालांकि, यह एक दुर्लभ आवाज़ है. फिर भी, जैसा कि रमिला भारवाड़ ने बातचीत की शुरुआत में कहा था: “अब चीज़ें थोड़ी बदल चुकी हैं.” ख़ैर, शायद ऐसा हुआ हो; थोड़ा बहुत.
इस स्टोरी में शामिल सभी महिलाओं के नाम, उनकी गोपनीयता बनाए रखने के लिए बदल दिए गए हैं.
संवेदना ट्रस्ट की जानकी वसंत को उनकी मदद के लिए विशेष धन्यवाद.
पारी और काउंटरमीडिया ट्रस्ट की ओर से ग्रामीण भारत की किशोरियों तथा युवा औरतों को केंद्र में रखकर की जाने वाली रिपोर्टिंग का यह राष्ट्रव्यापी प्रोजेक्ट, 'पापुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया' द्वारा समर्थित पहल का हिस्सा है, ताकि आम लोगों की बातों और उनके जीवन के अनुभवों के ज़रिए इन महत्वपूर्ण, लेकिन हाशिए पर पड़े समुदायों की स्थिति का पता लगाया जा सके.
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अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़