अपनी मौत से पहले-पहल 22 वर्षीय गुरप्रीत सिंह अपने गांव के किसानों को तीन नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ लामबंद करते रहे थे. उनके पिता, जगतार सिंह कटारिया ख़ुद एक किसान हैं. उनके पास पंजाब के उत्तर-पश्चिम इलाक़े में स्थित उनके गांव में पांच एकड़ ज़मीन है. वह गुरप्रीत का आख़िरी भाषण याद करते हुए ख़ामोश हो जाते हैं. थोड़ी देर बाद, याद करते हुए बताते हैं कि लगभग 15 किसानों का एक समूह उन्हें बेहद ध्यान से सुन रहा था. वह कह रहे थे कि दिल्ली की सरहदों पर एक सुनहरा इतिहास लिखा जा रहा है - जिसमें उन सबको जाकर अपना योगदान देना चाहिए. पिछले साल के आख़िरी महीने की उस सुबह गुरप्रीत का वह उत्साहित भाषण सुनने के बाद किसानों के उस समूह ने कमर कसा, और राजधानी की ओर कूच कर गए.
यह समूह गत वर्ष 14 दिसंबर को शहीद भगत सिंह नगर ज़िले के बलाचौर तहसील के मकोवाल गांव से निकला था. दिल्ली की ओर आते हुए यह क़रीब 300 किलोमीटर का सफ़र तय कर चुका था. मगर हरियाणा के अंबाला ज़िले में मोहरा के पास एक भारी वाहन ने उनके ट्रैक्टर-ट्रॉली को टक्कर मार दी. "यह एक बड़ी टक्कर थी. गुरप्रीत की मृत्यु हो गई,” जगतार सिंह अपने बेटे - जो पटियाला के मोदी कॉलेज में बीए की पढ़ाई कर रहे थे - की मौत के बारे में बताते हुए फिर ख़ामोश हो जाते हैं. इस ख़ामोशी को चीरते हुए कुछ शब्द उनके हलक़ से अदा होते हैं. वह इतना ही कह पाते हैं - “आंदोलन में यही उसका योगदान था - उसकी ज़िंदगी."
गुरप्रीत, सितंबर 2020 में भारत सरकार द्वारा पारित किए गए तीन कृषि क़ानूनों के विरुद्ध आंदोलन में भाग लेने वाले उन 700 से अधिक लोगों में एक हैं जिन्होंने अपनी जान गंवा दी. देश भर के किसान उन क़ानूनों के ख़िलाफ़ विरोध दर्ज कर रहे थे. वे कह रहे थे कि ये क़ानून न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की प्रक्रिया नष्ट करते हुए, निजी व्यापारियों और बड़ी कंपनियों को फ़सलों की क़ीमतों को निर्धारित और नियंत्रित करने की खुली छूट दे देंगे, जिससे वे और मालामाल होते जाएंगे. विरोध प्रदर्शनों में मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश से आए किसान शामिल थे, और 26 नवंबर, 2020 से दिल्ली की दहलीज़ पर जमा हुए थे. उन्होंने दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर स्थित सिंघु और टिकरी व दिल्ली-उत्तर प्रदेश बॉर्डर पर स्थित ग़ाज़ीपुर में सड़कों पर अपने-अपने कैंप स्थापित किए.
इन विरोध प्रदर्शनों के शुरू हुए एक साल से अधिक बीत चुके थे. तब प्रधानमंत्री ने 19 नवंबर, 2021 को इन क़ानूनों को रद्द करने की घोषणा की. इन क़ानूनों की वापसी (कृषि क़ानून निरसन अधिनियम, 2021) को 29 नवंबर को संसद में पारित किया गया. हालांकि, जब सरकार ने लिखित रूप से किसानों की यूनियन (संयुक्त किसान मोर्चा) की अन्य ज़्यादातर मांगों को मान लिया, तब मोर्चे ने इस महीने की 11 तारीख़ को आंदोलन शिविर ख़ाली कर, घर लौट जाने की घोषणा की.
मैंने इन 700 परिवारों - जिन्होंने साल भर चले आंदोलन के दौरान अपने किसी प्रियजन को खो दिया था - में से कुछ से व्यक्तिगत रूप से और कुछ से फ़ोन पर बात की. घरवाले इन शहीदों - जिन्होंने आंदोलन में अपनी आहुति पेश कर दी - को याद करते हुए फफ़क पड़ते हैं. उनमें से कई गहरी सांस लेते हुए दोबारा उस घटना को याद करने में हिचकते हैं, और कोई ग़ुस्से का इज़हार करता है. तबाही और दुख का मंज़र उनके सीने में कहीं घर कर गया है.
जगतार सिंह कटारिया ने कहते हैं, “हम किसानों की जीत का जश्न मनाते हैं, लेकिन क़ानूनों को वापस लेने की प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा से हमें ख़ुशी नहीं हुई. सरकार ने किसानों के लिए कुछ अच्छा नहीं किया है. बल्कि इसने किसानों और शहीदों का अपमान ही किया है.”

















