ये ह सीत के जुड़हा मंझनिया रहिस, पूस के सुरुज देंवता पहुना कस परछी मं पसरे रहिस, तब क़मर ह करीबन हजार किमी दूरिहा मं रहेइय्या अपन दाई ला फोन करिस. 75 बछर के शमीमा खातून ले गोठियावत वो ह वोला सुरता करावत बिहार के सीतामढ़ी जिला के वर्री फुलवरिया गाँव मं अपन बचपना के घर मं ले गीस.
गर तुमन वो मंझनिया फोन मं दूनों डहर के गोठ-बात ला सुने रहितव, त मानके कहिथों तुमन ला अलग कुछु सुने ला मिले रतिस. साफ उर्दू मं वो ह पूछथे, “अम्मी ज़रा ये बताइयेगा, बचपन में जो मेरे सर पे ज़ख्म होता था ना उसका इलाज कैसे करते थे?” (दाई, बता न बचपना मं मोर मुड़ मं जेन दाना निकरे रहिस, वोला तंय कइसने बने करे?)
“सीर में जो हो जाहै - तोरोहू होला रहा- बतखोरा काहा है ओको इधर, रे, चिकनी मिट्टी लगाके ढोलिया रहा, मगर लगहि बहुत. ता छूट गेलयि” [जेन तोर मुड़ मं दिखथे –जेन तोला होर रहिस- वोला इहाँ बतखोरा कहे जाथे. मंय रेह खारी (माटी राख) अऊ चिक्कन माटी ले तोर मुड़ ला धोवंय, फेर भारी पिराथे. आखिर मं तोला येकर ले निजात मिलगे,]” वो ह अपन घर के इलाज ला बतावत हाँसथे, ओकर भाखा क़मर ले बिल्कुले अलग आय.
वो मन के गोठ-बात मं कुछु घलो अलग नई रहिस. क़मर अऊ ओकर दाई हमेसा एक-दूसर ले अलग-अलग भाखा मं गोठियाथें.
“मंय ओकर बोली ला समझ लेथों, फेर मंय बोले नईं सकंव. मंय कहिथों के उर्दू मोरा ‘महतारी भाखा’ आय, फेर मोर दाई अलग भाखा मं बात करथे,” वो ह दूसर दिन पारीभाषा बइठका मं कहिथे, जिहां हमन अंतर्राष्ट्रीय महतारी भाखा ऊपर अपन कहिनी के बिसय ला लेके चर्चा करत रहेन. वो ह कहिथे, “कऊनो ला घलो ओकर भाखा के नांव के बारे मं मालूम नई ये, न अम्मी ला, न मोर परिवार के कऊनो ला, इहाँ तक ले जेन मन येला बोलथें घलो.” काम बूता खोजे बहिर जवेइय्या मरद मन, जेन मं वो , ओकर ददा अऊ ओकर भाई घलो हवंय, कभू घलो ये भाखा नई बोलंय. क़मर के लइका मन अऊ घलो अलग होगे हवंय: वो मन अपन दादी के भाखा ला नईं समझे सकंय.



















