शेनोली में रेलवे लाइन के इस ऐतिहासिक स्थान पर, हमने कुछ स्वतंत्रता सेनानियों के साथ इस ऐतिहासिक घटना के सम्मान में एक छोटे से समारोह का आयोजन किया। गर्मी की दोपहर 3 बजे भी वहां 250 लोग जमा हो गए। 80 और 90 वर्ष की उम्र के कई लोग रेलवे लाइन के आसपास इस तरह तेज़ी से चल रहे थे, जैसे छोटे बच्चे पार्क में उछलते-कूदते रहते हैं। उनके लिए यह एक संगम था, स्वतंत्रता संग्राम की विभिन्न धाराओं के मिलने का स्थान। और यहां पुराने सशस्त्र युद्ध के क्रांतिकारी थे, जो गोपालकृष्ण गांधी के साथ गर्मजोशी से गले मिल रहे थे और 'महात्मा गांधी की जय' के नारे लगा रहे थे। ख़ासकर 95 साल के कैप्टन भाऊ; गर्व के आंसू के साथ उनकी आंखें भीगी हुईं थी, वे बीमार थे, लेकिन इस समारोह में भाग लेने के लिए प्रतिबद्ध थे। 94 साल के माधव राय माणे, रेलवे लाइन के पास एक तेज़-तर्रार बच्चे की तरह भागे जा रहे थे, और मैं उनके पीछे दौड़ रहा था, इस डर से कि कहीं वह गिर न पड़ें। लेकिन वह गिरे नहीं। न ही उनकी हंसी कभी समाप्त हुई।
आख़िरकार हम उस ऐतिहासिक स्थान पर जा पहुंचे, जिसके कोने में सैनिकों ने 74 साल पहले ट्रेन को रोका था और उस पर सवार हो गए थे। यहां एक छोटा सा स्मारक है। क्रांतिकारियों के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश भारतीय रेलवे ने इसे हमले का मातम मनाने के लिए स्थापित किया था। शायद यही समय है कि अब इसके साथ ही एक और स्मारक यहां बनाया जाए, उस दिन के असली मायने की निशानी के रूप में।
बाद में हम लोग एक बड़े कार्यक्रम के लिए कुंडल गए, जो 1943 में प्रति सरकार की सीट थी; शेनोली से यहां तक पहुंचने में 20 मिनट लगते हैं। इस कार्यक्रम का आयोजन स्थानीय निवासियों और असली सेनानियों के परिजनों ने किया था। जीडी बापू लाड, नाग नाथ नायकवाड़ी, नाना पाटिल (प्रति सरकार के मुखिया) के परिवारों के माध्यम से। 1943 के चार महान सेनानियों में से केवल एक इस समय जीवित हैं, और इसीलिए वह इस समारोह में शरीक हो सके, और वह हैं कैप्टन भाऊ। इसके अलावा, यहां पर जीवित और सुस्पष्ट, नाना पाटिल की बेटी भी थीं। हौंसा ताई पाटिल, ख़ुद इस क्रांतिकारी भूमिगत गुट की एक सदस्य थीं। कैप्टन भाऊ, वह महान बुज़ुर्ग हैं जो ठीक दो दिन पहले सड़कों पर थे। हां, महाराष्ट्र के नाराज़ किसानों के समर्थन में। याद कीजिए: बहुत से स्वतंत्रता सेनानी ख़ुद किसान या कृषि मज़दूर थे। उनमें से कुछ के परिजन आज भी इसी काम से जुड़े हैं।