कऊनो माईलोगन ला मिले नियाव अईसने कइसे खतम हो सकथे?
– बिलकिस बानो


Gandhinagar, Gujarat
|THU, AUG 25, 2022
बिलकिस बानो: चूल्हा मं गीस नियांव, दोसी अजाद
नियाव सेती एक अकेल्ला माईलोगन के पीरा ले भरे लड़ई, अऊ हालेच मं 2002 के गुजरात दंगा बखत ओकर संग करे अतियाचार के 11 झिन दोसी मन ला दे गेय मुआफी, ये कविता मं येकर व्याकुलता केन्द्रित हवय
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मार्च 2002 मं, गुजरात के दाहोद जिला मं 19 बछर के बिलकिस याकूब रसूल ले भीड़ ह बेरहमी ले बलात्कार करे गीस, ये भीड़ ह ओकर तीन बछर के बेटी सालेह संग ओकर घर के 14 लोगन मन ला मार डरिस. वो बखत बिलकिस 5 महिना के गरभ ले रहिस.
लिमखेड़ा तालुका के रंधिकपुर गांव मं तऊन दिन ओकर परिवार ऊपर हमला करेइय्या मन ओकरे गाँव के रहिन. वो ह तऊन सब्बो ला जानत रहिन.
दिसंबर 2003 मं सुप्रीम कोर्ट के आडर ले केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ह ये मामला के जाँच करिस; महिना भर बाद आरोपी मन ला गिरफ्तार करे गीस. अगस्त 2004 मं, सुप्रीम कोर्ट ह मुकदमा ला मुंबई भेज दीस, जिहां जनवरी 2008 मं सीबीआई के विशेष अदालत ह 20 झिन ले 13 आरोपी मन ला दोसी पाइस. ये मन के 11 झिन ला उमरकैद के सजा सुनाय गेय रहिस.
मई 2017 मं, बॉम्बे हाई कोर्ट ह सजा काटत सब्बो 11 लोगन मन के उमरकैद के सजा ला बरकरार रखिस अऊ बरी करे 7 आरोपी मन के रिहाई ला ख़ारिज कर दीस.
अऊ पांच बछर बाद, 15 अगस्त, 2022 मं, गुजरात सरकार डहर ले बनायगे जेल सलाहकार समिति के सिफारिश ले सजा काटत 11 उमरकैद के दोषी मन ला रिहा कर देय गीस.
कानून के कतको विशेषज्ञ मन ये दोसी मन के रिहाई के वैधता ऊपर सवाल करे हवंय. इहाँ कवि ह अपन पीरा ला उजागर करत बिलकिस ले बात करत हवय.
मोर घलो नांव बिलकिस आय
तोर नांव मं अइसने का धरे हे बिलकिस?
के मोर कविता मं घाव जइसने बरत जाथे,
भैंरा के कान ले घला बोहावत हे लहू.
तोर नांव मं अइसने का धरे हे बिलकिस?
ओकर लपलपावत जीभ ला लोकवा मार जाथे,
बयान बखत मुंह मं दही जम जाथे.
तोर आंखी मं बसे पीरा के उबलत सुरुज
मोर आंखी मं बसे हरेक छबि ला धुंधला कर देथे
जेकर ले मंय तोर पीरा के अंदाजा लगाथों,
तीरथ के झुलसत-चिलचिलावत अंतहीन रेगिस्तान
अऊ सुरता के उमड़त समुंदर,
हिरदे ला भेदत तऊन आंखी मं समा जाथे,
हरेक मापदंड ला सूखा देथे जऊन ला मंय धरे हवंव,
अऊ टोर देथे ये जोगड़ा सभ्यता के नींव ला
जऊन ह तास के महल आय, बछरों बछर ले बेंचे गेय झूठ आय.
तोर नांव मं अइसने का धरे हे बिलकिस?
जऊन ह सियाही के छींटा अइसने बगराथे
के नियाव के चेहरा दागदार दिखे ला लगथे?
तोर लहू ले सनाय ये धरती
सालेहा के कोंवर, टूटे माथा जइसने
सरम ले फाट जाही एक दिन,
देह मं बांचे-खुचे कपड़ा पहिरे
जऊन डोंगरी ला तंय चढ़े रहय
वो सायद अब बेपर्दा होकेच रहि
जऊन मं जुग-जुग ले कांदी के एक तिनका घलो नई जामही
अऊ हवा के झोंका जऊन ह ये जमीन ले गुजर के जाही
बगरा दिही नपुंसकता के सराप.
तोर नांव मं अइसने का धरे हे बिलकिस?
के मोर मर्दाना कलम
ब्रम्हांड के अतक लम्बा रद्दा ला तय करत
मंझा मं आके अटक जाथे
अऊ मर्यादा ले भरे नीप ला टोर देथे?
हो सकत हवय के ये कविता घलो
बेकार बन जाही
- मुर्दा माफीनामा जइसने, संदेहा कानूनी मामला जइसने-
अऊ हां, गर तंय येला छूके अपन हिम्मत के परान
डाल देबे, त बात कुछु अऊ होही.
ये कविता ला अपन नांव दे दे, बिलकिस
सिरिफ नांव नई ये मं भाव भर दे,
कंदियाय इरादा मं परान दे दे बिलकिस.
मोर जरी ले अलग होय नांव ला ताकत दे,
मोर ठान चुके कोसिस मन ला बरसे ला सिखा दे,
जइसने के फुर्तीला सवाल जइसे, बिलकिस.
अभाव ले जूझत मोर भाखा मं आखर भर दे,
अपन कोंवर सुरुइला बोली ले कुछु अइसने
के बन जाय हिम्मत के दूसर नांव
अजादी के बलाय नांव हो, बिलकिस.
इंसाफ के पुकार हो,
बदला लेय के विरोधी हो, बिलकिस.
अऊ वो ला अपन नजर ले बचा ले, बिलकिस.
अपन रतिहा ला अइसनेच बोहे ला देय
के नियाव के आंखी के काजर बन जाय, बिलकिस.
बिलकिस तंय तुक अस, बिलकिस तंय लय अस,
बिलकिस त दिल मं बसे मयारू गीत,
जऊन टोर दे कागज-कलम के नानकन दायरा
अऊ ओकर उड़ान दूर खुल्ला अकास के होवय;
जेकर ले मानवता के उज्जर परेवा
ये लहू ले सनाय धरती ऊपर छा जांय
येकर छाँव मं सुस्तावव,
अऊ कहत जावव वो सब्बो
जऊन ह तोर नांव मं लुकाय हवय, बिलकिस.
मनौती के! एक पईंत, मोर नांव घलो हो जाय, बिलकिस.
अनुवाद: निर्मल कुमार साहू
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