
SANGUR, PUNJAB
|FRI, JAN 22, 2021
कोविड-19 के प्रभाव पर पारी की कवरेज
कोविड-19 के कारण 25 मार्च से शुरू हुए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन ने लाखों आम भारतीयों — प्रवासी मज़दूरों, किसानों, गन्ने की कटाई करने वालों, आदिवासियों, दलितों, सफ़ाई कर्मियों, निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मज़दूरों, शहर के फुटपाथों पर रहने वाले कैंसर रोगियों, ईंट भट्ठा पर काम करने वाले मज़दूरों, ख़ानाबदोश चरवाहों और अन्य को संकट में डाल दिया है। एक ओर जहां बहुत से लोगों के पास कोई काम, आय या भोजन नहीं बचा है, वहीं कई लोग बेहद ख़तरनाक परिस्थितियों में भी काम करना जारी रखे हुए हैं। उनके बारे में देशभर से पारी की इन रिपोर्टों को पढ़ें
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129. अभाव के शोर में खोने लगी है कोम्बू की आवाज़
तमिलनाडु के कोम्बू कलाकार, कोविड -19 लॉकडाउन के दौरान मंदिर के त्योहारों और सार्वजनिक कार्यक्रमों पर पाबंदी लगने की वजह से बिना किसी कमाई के संघर्ष कर रहे हैं. इसके बावजूद, उनकी चिंता के केंद्र में कला की गिरावट ज़्यादा है
128. बीड: स्वास्थ्य कर्मचारियों और सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे अस्पताल
कोरोना वायरस की दूसरी लहर के चरम पर पहुंचने के बाद से ही, महाराष्ट्र के बीड जिले के सरकारी अस्पतालों में मरीज़ बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं
127. मराठवाड़ा: 'अस्पताल का बिल भरने में लुट गई सारी कमाई"
मराठवाड़ा में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के ख़राब हालात, महंगे निजी अस्पताल, और राज्य की बीमा योजना तक सीमित पहुंच ने कोरोना मरीजों और उनके परिवारों को कर्ज़ के दलदल में डुबो दिया है, जिससे वे लंबे समय तक जूझते रहेंगे.
126. हमें सरकारी अस्पतालों पर भरोसा नहीं
झारखंड के असर्हिया गांव के कपड़ा विक्रेता अजय कुमार साव ने एक निजी क्लीनिक में कोविड-19 के इलाज में 1.5 लाख रुपए ख़र्च किए और अब क़र्ज़ में डूबे हैं. एक वीडियो एडिटर के साथ मिलकर लिखी गई स्टोरी जो उसी गांव में रहते हैं.
125. समाज मुझे शादी के लायक नहीं समझता है!
बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले के चतुर्भुज स्थान की सेक्स वर्कर्स (यौनकर्मी), अक्सर अपने 'परमानेंट' ग्राहकों को ख़ुश करने चक्कर में कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं; कोविड-19 की वजह से लगे लॉकडाउन के कारण उनके हालात बेहद ख़राब हैं.
124. बीड: कोरोना के डर और वैक्सीन के इंतज़ार में उलझी ज़िंदगी
महाराष्ट्र के बीड जिले में वैक्सीन की कमी और उसके असमान वितरण की वजह से, बहुत से लोग कोविड -19 की तीसरी लहर आने से पहले टीका नहीं लगवा पा रहे.
123. "हर नफ़्स को मौत का मज़ा चखना है"
दिल्ली के सबसे बड़े क़ब्रिस्तानों में से एक, 'जदीद अहल-ए-इस्लाम' में क़ब्र के पत्थरों पर ख़ूबसूरत लिखावट में आख़िरी शब्द उकेरने और तराशने वालों का दिल इस बात से टूट जाता है कि यह व्यवसाय बूम कर रहा है इन दिनों
122. लाश पर सर रख के रोना भी अब नसीब नहीं
महामारी की वजह से हमने इस बीच एक और त्रासदी देखी. इंसान के शरीर से लेकर अन्य सामाजिक पहलुओं तक, अंतिम संस्कार ऐसे-ऐसे तरीक़ों से होते हुए दिखे जिनकी पहले हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी. अंतिम विदाई के वक़्त शोक की जगह अब खानापूर्ति ने ली है और सारा वक़्त संसाधन जुटाने की प्रक्रिया व प्रोटोकॉल का पालन करने में निकल जाता है. महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले से पारी की रिपोर्ट
121. उत्तर प्रदेश: ‘कुछ नहीं हो सकता, ड्यूटी करनी पड़ेगी’
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में अनिवार्य रूप से ड्यूटी के कारण कोविड-19 से मरने वाले शिक्षकों की संख्या तो बढ़ ही रही है, इसने शोषक ‘शिक्षा मित्र’ प्रणाली की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। पारी ने अपनी जान गंवाने वाले ऐसे तीन ‘मित्रों’ का पता लगाया है
120. अवाम की लाश पर तामीर हुआ एक राजमहल
महामारी से जूझते वक़्त में अवाम की नाराज़गी को नज़रअंदाज़ करके, मोदी सरकार का आलीशान सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट बिना किसी रुकावट के जारी है. इस क्रूर दृश्य को देखते हुए, एक कवि एक पुरानी कहानी सुना रहा है
119. तमिलनाडुः कोविड के समय तपेदिक के ख़िलाफ़ अभियान
दशकों से भारत की सबसे घातक संक्रामक बीमारी — तपेदिक से लड़ना कभी आसान नहीं रहा, और अब कोविड महामारी के दौरान यह और भी मुश्किल हो गया है, जैसा कि तमिलनाडु की तीन महिला ‘टीबी योद्धाओं’ की कहानी हमें बताती है
118. यूपी पंचायत चुनाव में शिक्षकों की बलि
उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में मतदान अधिकारियों के रूप में कार्यरत 700 से अधिक स्कूली शिक्षकों की कोविड-19 से मौत हो गई है और कई गंभीर स्थिति में हैं, चुनावों के आसपास केवल 30 दिनों में 8 लाख नए मामले सामने आए हैं
117. बिहारः कोरोना काल में भी नहीं रुका बाल विवाह का सिलसिला
बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में पिछले साल लॉकडाउन के दौरान, गांव लौटे प्रवासी मज़दूर युवकों से बहुत सी किशोरियों की शादी कर दी गई थी. उनमें से कई अब गर्भवती हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं
116. जला वह उनमें जो अजनबी थे
इंसानी जानें हज़ारों चिताओं पर जल रही हैं और उनकी लपटों में पूरा देश घिर गया है. महामारी की इस त्रासदी को दर्ज करती एक कविता
115. फूल उस क़ब्र पे जा कर मैं चढ़ाऊं कैसे
यह वह कविता है जो शूल सी चुभती है, पेंटिंग है ऐसी जो भीतर धंस जाती है - और महामारी की मार झेलती ज़िंदगी की एक कहानी है जिस पर मौत के साए मंडरा रहे हैं
114. ‘मैं गांव में वीडियो एडिटिंग नहीं कर सकता’
हैय्युल रहमान अंसारी ग्रामीण झारखंड से 10 साल पहले वीडियो एडिटर के रूप में काम करने के लिए मुंबई आए थे। लेकिन पिछले साल उन्हें कोविड-19 लॉकडाउन में नौकरी गंवाने के बाद दो बार बोरिया-बिस्तर बांधकर घर लौटना पड़ा
113. मालदा: ‘कोई भी ख़ुशी से परदेश नहीं जाता’
मालदा जिले के भगबानपुर में कोई औद्योगिक गतिविधि न होने और कृषि कार्यों में कम मज़दूरी के कारण, यहां के पुरुष ख़ुद को जीवित रखने और कमाकर पैसे घर भेजने के लिए उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे दूरदराज़ स्थानों पर काम करने निकल जाते हैं
112. मौत के बाद भी वह क़तार में था
वह जीवन भर क़तारों में खड़ा रहा - फिर सबसे आख़िर में भी एक और क़तार मिली. कोविड-19 संकट पर एक कविता
111. उस ट्रेन पर किसी तरह सवार होने की कोशिश
मोहम्मद शमीम, दूसरे लोगों की तरह प्रवासियों की इस दूसरी लहर में — महामारी वर्ष में दूसरी बार नौकरी खोने के कारण, अपने यूपी के गांव लौट रहे हैं। उनके साथ उत्तरी मुंबई की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले बहुत से लोग पहले ही जा चुके हैं
110. ‘कैसे कमाना और क्या खाना?’
मराठवाड़ा में, अजूबी लदाफ और जाहेदाबी सैयद की तरह अपने दम पर जीवन व्यतीत करने वाली महिलाएं आय अर्जित करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। सामाजिक बहिष्कार के साथ-साथ, महामारी और भेदभाव उनके लिए और कठिनाइयां पैदा कर रहे हैं
109. नंदुरबार की पहाड़ी बस्तियों में: टीका पहुंच से दूर
महाराष्ट्र के धड़गांव इलाक़े की दूरदराज़ बस्तियों में आदिवासियों के लिए कोविड टीकाकरण केंद्र सड़कों की ख़राब कनेक्टिविटी और महंगे किराया के कारण दुर्गम हैं, यहां तक कि गंभीर बीमारियों वाले बुज़ुर्ग टीके का अभी भी इंतज़ार कर रहे हैं
108. ‘हमारे लिए लॉकडाउन — और काम हमेशा रहता है’
महामारी के दौरान नर्सों को बदनामी, कम वेतन, भेदभाव, घंटों तक जीवन बचाने वाले कार्य करने जैसे जोखिम का सामना करना पड़ा। पारी ने चेन्नई में पहली पंक्ति की इन असली योद्धाओं में से कुछ के साथ बात की
107. लॉकडाउन के झटकों के बीच जारी है लय को बरक़रार रखने का संघर्ष
कोविड-19 लॉकडाउन में बिक्री नहीं होने और अपने तबलों के लिए कच्चा चमड़ा ख़रीदने में कठिनाई के कारण, केरल के पेरुवेम्बा गांव के कड़ची कोल्लन वाद्ययंत्र निर्माताओं को स्थिर आय नहीं मिल पा रही है
106. ‘मैं केवल जीवित रह सकता हूं, अपनी ज़िंदगी नहीं जी सकता’
मुंबई में रहने वाले बिहार के एक 27 वर्षीय प्रवासी श्रमिक बता रहे हैं कि लॉकडाउन के दौरान घर तक की यात्रा करना कितना कठिन था, और उनके वर्तमान और भविष्य पर इस शहर की पकड़ कितनी मज़बूत है
105. बीदर के खेतों में काम कर रहे डिग्री होल्डर
मेहनत की कमाई और ऋण के पैसे से बीटेक, बीएड, एमबीए, एलएलबी आदि डिग्रियां प्राप्त करने वाले, जिन्होंने लॉकडाउन से पहले की अपनी नौकरियां खो दीं, अब पूर्वोत्तर कर्नाटक के बीदर जिले में मनरेगा का काम कर रहे हैं
104. स्कूल 2020: लॉकडाउन में भविष्य की माप
ओडिशा और झारखंड के कुछ हिस्सों में, महामारी के दौरान शिक्षा हर एक के लिए आश्चर्यजनक पाठ है
103. ‘जिनके पांव में बंधी है दुख की पायल’
सोनी को घर लौटने पर पता चला कि उसकी पांच साल की बच्ची का यौन शोषण किया गया था, हालांकि मुंबई के कमाठीपुरा में सोनी और अन्य सेक्स वर्कर्स ने लॉकडाउन के दौरान, आर्थिक नुक़्सान झेलने के बावजूद भी अपने बच्चों को सुरक्षित रखने की पूरी कोशिश की थी
102. कश्मीर: धान की कटाई करने वाले प्रवासी मज़दूरों का टोटा
मध्य कश्मीर में धान की कटाई का यह सीज़न मुश्किल दौर से गुज़र रहा है. कुशल प्रवासी मज़दूर, जो स्थानीय मज़दूरों की तुलना में कम पैसे लेते हैं, लॉकडाउन के कारण यहां से चले गए थे, और अब स्थानीय किसान किसी भी उपज की उम्मीद छोड़ने लगे हैं
101. महामारी की मार न रोक सकी दुर्गा पूजा में ढाकियों को ढोल बजाने से
ग्रामीण बंगाल के पारंपरिक ढोलकियों को इस सीज़न में कोलकाता में तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, पर वे डटे हुए हैं
100. प्रवासी मज़दूर बनकर मार्च करती मां दुर्गा
कोलकाता के बेहाला में स्थित दुर्गा पूजा के एक पंडाल में देवी का अनोखा अवतार देखने को मिला
99. ढेरों पूर्वाग्रह के बीच 1,100 शवों को दफ़नाना
कोविड-19 से मरने वालों की अंत्येष्टि को लेकर पूर्वाग्रह और शत्रुता के बीच, तमिलनाडु के एक स्वैच्छिक समूह ने धर्म या जाति की परवाह किए बिना अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने में सैकड़ों परिवारों की मदद की है
98. एक राष्ट्र, कोई राशन कार्ड नहीं
दिल्ली में घरेलू सेविका के रूप में काम करने वाली रुख़साना ख़ातून ने, बिहार में अपने पति के गांव से राशन कार्ड बनवाने की कई वर्षों तक कोशिश की — और अब उन्हें इसकी काफी ज़रूरत महसूस हो रही है क्योंकि लॉकडाउन के कारण उनके परिवार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है
97. वक़्त के मलबे से घिरा कालू दास का कबाड़ का काम
कालू दास, रीसाइक्लिंग के लिए सामान इकट्ठा करने अपने गांव से कोलकाता जाते हैं. उन्होंने कुछ हफ़्ते पहले फिर से चक्कर लगाना शुरू किया. लेकिन, यह काम संकट में है, कमाई बेहद कम है, उनकी पत्नी की नौकरी चली गई है, और उनका परिवार संघर्ष कर रहा है
96. डल झील (श्रीनगर): लॉकडाउन के चलते अब सड़ने लगी हैं हाउसबोटों की दीवारें
डल झील की अर्थव्यवस्था के लिए, पर्यटन सीज़न के दौरान कोविड-19 के कारण लागू हुआ लॉकडाउन पिछले साल अनुच्छेद 370 हटाए जाने से पहले हुई तालाबंदी के ठीक बाद आया. इस वजह से शिकारावालों, हाउसबोट मालिकों, और दुकानदारों का भारी नुक़्सान हुआ है और उनका रोज़गार ठप हो गया है
95. बेंगलुरु के दर्ज़ियों के लिए समय पर कोई सिलाई नहीं
लॉकडाउन में कोई आय नहीं होने के कारण, अब्दुल सत्तार और बेंगलुरु में कढ़ाई का काम करने वाले अन्य लोग पश्चिम बंगाल के अपने गांव लौटने के लिए बेताब थे। अब, चूंकि गांव में भी कोई काम नहीं है, इसलिए सत्तार शहर वापस आने के लिए बेताब हैं
94. ‘अगर उनका इलाज समय पर हो जाता, तो आज वह ज़िंदा होते’
कोविड-19 लक्षणों के बावजूद, मुंबई के एक सफ़ाईकर्मी अशोक तारे को किसी सुरक्षात्मक उपकरण के बिना ही काम करने पर मजबूर किया गया और छुट्टी देने से मना कर दिया गया. उनका परिवार मदद के लिए इधर-उधर भागता रहा, और 30 मई को उनकी मृत्यु होने के महीनों बाद भी मुआवजे का इंतज़ार कर रहा है
93. ‘घड़ी की मरम्मत करना समय को दुरुस्त करने जैसा है’
विशाखापट्टनम के जगदंबा जंक्शन के घड़ीसाज़ों ने डिजिटल घड़ियों और उपयोग के बाद फेंक दिए जाने वाले पुर्ज़ों के चलते काम में कमी आते देखा है. और अब, लॉकडाउन की पाबंदियों के बाद, वे अपने नुक़सान की भरपाई करने की कोशिश कर रहे हैं
92. उत्तर प्रदेश: कोविड से जीते, समाज से हारे
यूपी में, कोविड-19 महामारी के दौरान अपने गांव लौटने वाले प्रवासी मज़दूर और आम अवाम महंगे इलाज, गंदे क्वारंटीन केंद्रों, सामाजिक एवं धार्मिक भेदभाव जैसी मुश्किलों से जूझ रही है. इसके चलते, बहुत से लोग एक बार फिर परदेस लौटने की बाट जोहने लगे हैं
91. ‘घर पर रहने के लिए हमारे पास घर ही नहीं है’
महाराष्ट्र के ख़ानाबदोश पशुपालक धनगर परिवारों के इस समूह के लिए, लॉकडाउन कई समस्याएं लेकर आया. भेड़ की बिक्री कम हो गई, गांव के मैदानों में जाने पर पाबंदी लगने लगी, और राशन ख़त्म होने लगा, लेकिन वे भरसक कोशिश कर रहे हैं कि आगे बढ़ते रहें
90. विशाखापट्टनम: क़र्ज़ में डूबे कुम्हार परिवारों के अरमानों का विसर्जन
आंध्र प्रदेश के कारीगर इस सप्ताह गणेश चतुर्थी से शुरू हो रहे त्योहारों के मौसम में आम तौर पर सबसे अधिक कमाते हैं. लेकिन उन्हें इस साल अब तक गणेश की मूर्तियों और अन्य उत्पादों के लिए एक भी थोक ऑर्डर नहीं मिला है
89. ‘हमारे मास्क बह गए’: मुंबई के बेघर
फुटपाथ पर रहने वाली मीना और उनका परिवार, शहर के कई बेघर लोगों में से हैं, जिनकी कोई आमदनी नहीं है और स्वास्थ्य सेवा या राज्य की योजनाओं तक उनकी पहुंच बहुत कम है – और अब वे मानसून तथा महामारी से जूझ रहे हैं
88. कोलकाता के बच्चों के अस्पताल पर लॉकडाउन की मार
लॉकडाउन में अशक्तता, सामाजिक कलंक से स्वास्थ्यकर्मियों के प्रभावित होने के कारण केवल 40 प्रतिशत स्टाफ़ की उपस्थिति, और वित्तीय समस्याओं के बावजूद, इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ के सिपाही अपना काम जारी रखे हुए हैं
87. लॉकडाउन के बीच नुक़सान से घिरे कुम्हार
इस सप्ताह शुरू होने वाला गणपति उत्सव, फिर दुर्गा पूजा और दिवाली, दिल्ली के उत्तम नगर के कुम्हारों के लिए सबसे ज़्यादा कमाई वाले सीज़न हुआ करते थे. लेकिन अब, वे कच्छ और पश्चिम बंगाल के कुम्हारों की तरह ही बिक्री का सबसे ख़राब समय देख रहे हैं
86. लॉकडाउन के बीच आशा कार्यकर्ताओं की निस्वार्थ मेहनत
महाराष्ट्र के उस्मानाबाद ज़िले की आशा कार्यकर्ता, अग्रिम पंक्ति की स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के रूप में अपने पहले के काम के बोझ के साथ-साथ, और ख़राब सुरक्षा उपकरण और देर से मिलने वाले मानदेय के बावजूद, कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए दिन-रात काम कर रही हैं
85. यूपी में: ‘आधा कर्नाटक और आधा आंध्र’
आंध्र प्रदेश में पानी-पुरी की दुकान चलाने वाले बीरेंद्र सिंह और रामदेकली लॉकडाउन के दौरान उत्तर प्रदेश लौट आए। वे अब क़र्ज़ में डूबे हुए हैं, अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित हैं, और उन्हें समझ में नहीं आ रहा है आगे कैसे गुज़ारा होगा
84. 'नॉर्मल' की ओर लौटने को बेचैन ग़रीबों का ख़ून चूसने वाले जोंक
कोविड के हालिया संकट में ज़्यादा चिंता की बात यह नहीं है कि हम कितनी जल्दी पहले जैसी सामान्य स्थितियों की तरफ़ लौटेंगे. जिसे 'सामान्य' स्थिति बताया जाता है, दरअसल वह करोड़ों ग़रीब भारतीयों के लिए समस्याओं की जड़ रहा है. 'न्यू नॉर्मल' भी पुराना 'नॉर्मल' ही है
83. घातक – और सामाजिक – वायरस से निपटना
विभिन्न समुदायों से संबंध रखने वाले कोविड-19 के रोगियों के लिए घर-अस्पताल-क्वारंटाइन-घर की यात्रा हमेशा समान नहीं होती है। पारी ने महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में ऐसे दो परिवारों का पता लगाया
82. ‘अगर हम काम नहीं करेंगे, तो फ़सल कौन उगाएगा?’
ख़रीफ़ का मौसम है और धान की रोपाई शुरू हो चुकी है, इसलिए छत्तीसगढ़ में धमतरी के खेतों पर मज़दूर लौट आए हैं. वे कोविड-19 से बचाव की ज़रूरतों को समझते हैं, लेकिन कहते हैं कि बिना काम किए उनका गुज़ारा नहीं चल सकता
81. पलायन और दुख से भरा मज़दूरों का जीवन
तो वह प्रवासी कौन है, जिसे मीडिया ने 25 मार्च को खोजा था? मुंबई में बिताए गए बचपन और जीवन के अनुभव के माध्यम से इस सवाल पर एक पीड़ादायक नज़र
80. ‘मेरा परिवार क्या करे?’
बोरांडा गांव के आदिवासी मोहल्ले में, वनिता भोईर और उनका परिवार, जो महाराष्ट्र के ईंट भट्टों पर काम करने के लिए पलायन करते हैं, लॉकडाउन के कारण उनका काम, भोजन और पैसा सब कुछ ख़त्म हो चुका है – और अब वे उम्मीद भी खोते जा रहे हैं
79. पालघर में: ‘भरने के लिए दो पेट कम’
लॉकडाउन के दौरान महाराष्ट्र के पालघर जिले में विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह, कातकरियों को काम मिलना बंद हो गया। शायद इसी वजह से मंगल वाघ ने ख़ुद की और अपनी बेटी की हत्या कर दी हो
78. महामारी में ‘स्पर्श के माध्यम से दुनिया’ को देखना
विमल और नरेश ठाकरे, दोनों दृष्टिहीन, मुंबई की लोकल ट्रेन में रूमाल बेचते थे। लॉकडाउन ने उनकी, और कई अन्य की आय छीन ली। उन्हें सरकार से मामूली सहायता मिल रही है और भविष्य अनिश्चितताओं से भरा हुआ है
77. प्रवासी मज़दूरों के नाम रैप गीत
कालाहांडी ज़िले के दुलेश्वर तांडी - ‘रैपर दुले रॉकर’ - जो ट्यूशन पढ़ाते हैं, निर्माण-स्थलों पर काम करते हैं और सामयिक प्रवासी मज़दूर हैं, इस गीत के माध्यम से लॉकडाउन की मार झेलते प्रवासी मज़दूरों की पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं
76. लॉकडाउन से परेशान आंध्रा के किसान
इस साल रबी के मौसम में केले की फ़सल अच्छी होने के बाद अनंतपुर जिले के किसानों को बेहतर क़ीमत मिलने की उम्मीद थी। लेकिन, कुछ ख़राब मौसम और फिर लॉकडाउन के कारण उन्हें भारी नुक़सान उठाना पड़ा और वे क़र्ज़ में डूबे हुए हैं
75. स्कूली बच्चे: डिजिटल असमानता से डिजिटल विभाजन तक
‘ऑनलाइन शिक्षा’ की होड़ ज़मीनी स्तर पर महाराष्ट्र के पालघर जिले के तलासरी जैसे ग़रीब आदिवासी क्षेत्र में कैसी दिखती है? पारी ने पड़ताल की कि यह पहले से ही गंभीर असमानताओं को कैसे आगे बढ़ा रही है
73. तमिलनाडु में चेचक, प्लेग और महामारी की यादें
तमिल लेखक चो धर्मन, गांवों के द्वारा सदियों से विभिन्न प्रकार के वायरस, प्लेग और महामारियों से जूझने का अमूल्य मौखिक इतिहास, और वर्तमान कोविड-19 महामारी तथा लॉकडाउन के तहत आज के जीवन से उसका क्या संबंध है, इस बारे में बता रहे हैं
72. लॉकडाउन में सबसे अधिक पीड़ित यूपी की महिलाएं
देश में घरेलू हिंसा वैसे तो एक आम बात है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान इसमें कुछ ज़्यादा ही वृद्धि देखने को मिली है। उत्तर प्रदेश के महोबा, लखनऊ और चित्रकूट जिले की महिलाओं ने पारी को अपनी दुख भरी कहानी सुनाई
71. कोरोना लॉकडाउन: ताड़ पर चढ़ने को मजबूर हुए ईश्वर
लॉकडाउन के कारण, गर्मियों के लोकप्रिय फल ताड़गोला की बिक्री केवल 10-15 दिनों तक हो सकी और फिर ग्राहकों में लगातार कमी आई है, जिसके चलते विशाखापट्टनम के विक्रेताओं को काफ़ी नुक़सान हुआ है
70. कर्नाटक: महामारी के चलते क़ीमतों में गिरावट, संकट में कोकून के किसान
कर्नाटक का रामनगर, एशिया में कोकून का सबसे बड़े बाज़ार है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान क़ीमतों में भारी गिरावट और मांग आधारित आपूर्ति शृंखला के टूटने के कारण बुनाई व कताई करने वाले और विशेष रूप से रेशम के कीड़े पालने वाले किसान बुरी तरह प्रभावित हुए हैं
69. चक्रवात और कोरोना के समय हाथ ख़ाली
लॉकडाउन के कारण आय ख़त्म होने और कोविड के डर से सबिता सरदार ने, अंफ़न चक्रवात के बावजूद, पुलिस और आश्रय गृह की ख़राब हालत से बचना पसंद किया, और कोलकाता के गरियाहाट फ्लाईओवर के नीचे अपने स्थान पर लौट आईं
68. देश के बिगड़े सुरों को साधने की कोशिश करते हारमोनियम कारीगर
हारमोनियम की मरम्मत करने वाले, मध्य प्रदेश के जबलपर के बहुत से कारीगर लॉकडाउन के कारण दो महीने से महाराष्ट्र के रेनापुर में फंसे हुए थे. उन्होंने पारी को अपनी परेशानियों के बारे में बताया
67. कोरोना लॉकडाउन: छत्तीसगढ़ के कुम्हारों का हाल हुआ बेहाल
धमतरी शहर में, कुम्हारों ने गर्मियों में सबसे ज़्यादा बिक्री वाले अपने सीज़न को खो दिया, क्योंकि लॉकडाउन के कारण बर्तन बनाना और बेचना मुश्किल हो गया था. हालांकि, छत्तीसगढ़ में बाज़ार अब खुलने लगे हैं, लेकिन अनिश्चितता बनी हुई है
66. मज़दूर हूं मैं, मजबूर नहीं
25 मार्च के लॉकडाउन के बाद लाखों प्रवासी मज़दूरों का सामूहिक पलायन कवियों और चित्रकारों की कल्पना को साकार करता है। यह कविता श्रमिकों से निपटने में हमारे कई पाखंडों का खंडन करती है
65. लॉकडाउन के कारण आंध्र में फंसे नेपाली प्रवासी
लॉकडाउन के दौरान कोई आमदनी न होने के कारण आंध्र प्रदेश के भीमावरम में फंसे सिक्योरिटी गार्ड, सुरेश बहादुर खाद्य आपूर्ति की कमी, बीमारी और सीमा पार नेपाल में स्थित अपने घर लौटने की अनिश्चितता से जूझते रहे
64. लॉकडाउन की चौहद्दी में क़ैद ईंट भट्टे की महिला मज़दूर
तेलंगाना के संगारेड्डी ज़िले के ईंट भट्टे पर काम करने वाली कुनी तमालिया और अन्य मज़दूरों का काम लॉकडाउन के दौरान जारी रहा. लेकिन, बच्चों की देखभाल की चिंता और कोविड के डर के कारण, वे श्रमिक स्पेशल ट्रेन पकड़ कर ओडिशा जाने को बेचैन थे
63. प्रवासी, और अभिजात वर्ग की नैतिक अर्थव्यवस्था
लॉकडाउन ने भारत में पुराने ज़माने से होती आ रही प्रवासी मज़दूरों के अधिकारों की क्रूर अवहेलना को उजागर किया है – इन लाखों लोगों को हमारी दिखावटी चिंता की नहीं, बल्कि संपूर्ण न्याय की ज़रूरत है, यही बता रहा है इंडिया टुडे में प्रकाशित हो चुका यह लेख
62. ‘यहीं रुकें और कुछ न करें या वहां जाकर ख़ाली बैठें?’
निर्माण स्थलों पर काम करने वाले प्रवासी मज़दूर, अमोदा और राजेश जैसे ही बेंगलुरु में अपने नए कार्यस्थल पर पहुंचे लॉकडाउन शुरू हो गया, जिसकी वजह से न तो उन्हें कोई काम मिल सका और न ही रहने के लिए कोई जगह। हाई स्कूल के छात्रों द्वारा पारी की एक रिपोर्ट
61. नक़दी फ़सलें, कोविड और न बिकने वाली कपास की क़ीमत
देश भर में नक़दी फ़सलें बिक नहीं रही हैं, जिससे वे भारी मात्रा में बेकार पड़ी हुई हैं – जैसे कि महाराष्ट्र में कपास। भुखमरी का संकट मंडरा रहा है, फिर भी विदर्भ के किसान ख़रीफ़ के इस मौसम में खाद्य फ़सलों की बजाय एक बार फिर कपास की बुवाई करने की योजना बना रहे हैं
60. पटाख़े से नहीं, शराब से बढ़ता वायरस
तमिलनाडु के विरुधुनगर में कई अरुंथथियार महिलाओं की तरह, देवी कनकराज शिवकाशी की पटाख़ा फ़ैक्ट्री में काम करती हैं। लॉकडाउन के कारण उनकी आय छिन गई, राशन घटने लगा, क़र्ज़ बढ़ रहा है और घर में केवल शराबी पति है
59. जब पानी ने पागल सांड की तरह लोगों का पीछा किया
अंफ़न चक्रवात, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान आया। पारी ने उस इलाक़े का दौरा किया और पाया कि वृक्षों, घरों और अन्य सामग्रियों का काफ़ी नुक़सान हुआ है – जिसमें लोगों की पहले से ही प्रभावित आजीविका भी शामिल है
58. कितनी जान होती है एक प्रवासी मज़दूर के भीतर
महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास 8 मई, 2020 के दिन, एक ट्रेन के नीचे कुचलकर मार दिए गए 16 प्रवासी मज़दूरों की त्रासदी आज भी परेशान करती है. यह मार्मिक कविता और विचलित करने वाली पेंटिंग हमें उस भयानक घटना की याद दिलाती हैं
57. उड़ती धूल, त्वचा में खुजली, पसीने से भीगा मास्क
सामाजिक दूरी के नियम का पालन आप कैसे कर सकते हैं यदि आप किसी अनाज ख़रीद केंद्र पर मज़दूरी कर रहे हैं – जैसे कि तेलंगाना के नलगोंडा जिले के ये पुरुष – जिन्हें एक मिनट में 213 किलोग्राम धान संभालने के लिए टीम के साथ काम करने की ज़रूरत पड़ती है?
56. ‘ये महिलाएं किसी को भी भूखा नहीं जाने देंगी’
केरल के 400 से भी अधिक ‘कुडुंबश्री होटल’ लॉकडाउन के समय कम आय वाले लोगों – विद्यार्थियों, चिकित्सा परिचरों, सुरक्षा गार्डों, एंबुलेंस चालकों इत्यादि – को सस्ता लेकिन पौष्टिक भोजन प्रदान कर रहे हैं
55. मध्य भारत से गुज़रते हुए घर के लिए प्रस्थान
लॉकडाउन के दौरान हाइवे पर निकले लाखों लोग उत्तरी और पूर्वी राज्यों में स्थित हज़ारों गावों में वापस जा रहे हैं। उनमें से बहुत से लोग भारत के मध्य में स्थित नागपुर शहर से गुज़र रहे हैं
54. अब अमीरों की पालकियां कौन उठाएगा?
कई राज्य सरकारों ने श्रम क़ानूनों को निलंबित कर दिया है और काम के घंटे बढ़ा दिए हैं, और प्रवासी मज़दूरों की स्थिति और भी ख़राब हो गई है। पारी के संस्थापक संपादक पी. साईनाथ के साथ एक साक्षात्कार, फ़र्स्टपोस्ट के सौजन्य से
53. ‘हम पहले ही तंगी में थे, अब कुछ भी नहीं बचा’
छत्तीसगढ़ से आए चंद्रा परिवार की तरह ही जम्मू में रहने वाले अन्य प्रवासी मज़दूरों के पास भी लॉकडाउन में कोई काम नहीं बचा था। वे लोग आसपास की इमारतों से आ रहे राशन की मदद से अपना घर चला रहे थे, और अब उन्हें धीरे-धीरे फिर से काम मिलने लगा है
52. संघर्षरत कोलकाता में लॉकडाउन के समय अंफन
20 मई को पश्चिम बंगाल में आए विनाशकारी चक्रवाती तूफ़ान के कारण कोलकाता दोबारा सामान्य स्थिति में आने के लिए संघर्ष कर रहा है – क्योंकि जिन मज़दूरों को यह काम करना था वे लॉकडाउन की वजह से बहुत पहले ही शहर छोड़कर अपने गांव जा चुके थे
51. कैंसर, कोविड-19 से पीड़ित और आश्रय के बिना
गीता और सतेंद्र सिंह महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले से गीता के कैंसर का इलाज कराने मुंबई आए थे। टाटा मेमोरियल अस्पताल के पास फुटपाथ पर रहते हुए पता चला कि दोनों कोविड-19 पॉज़िटिव हैं
50. फ़ोटोग्राफ़र लिखता है – अच्छाई के लिए या कविता के लिए
इस फ़ोटोग्राफ़र का कहना है कि जब लॉकडाउन मनुष्यों की पीड़ा को बढ़ा रहा है, जिसे दशकों से जानते हुए और उसकी परवाह करते हुए आप बड़े हुए हैं, तो यह आपको लेंस से परे जाकर, ख़ुद को कविता के रूप में व्यक्त करने पर मजबूर करता है
49. पनवेल से मध्य प्रदेश: लॉकडाउन के बीच चार दिन व चार रातों का सफ़र
कुछ साल पहले एक दुर्घटना में अपना एक पैर गंवा चुके बिमलेश जायसवाल ने लॉकडाउन के दौरान अपनी पत्नी और तीन साल की बेटी के साथ, महाराष्ट्र के पनवेल से मध्य प्रदेश के रीवा तक, 1,200 किलोमीटर की यात्रा बिना गियर वाले स्कूटर से पूरी की
48. लॉकडाउन के कारण तेहट्टा में अस्थायी बाज़ार
‘हॉटस्पॉट’ में रहने वाले लोग जिन बाज़ारों पर निर्भर रहा करते थे, अब लॉकडाउन के कारण उन बाज़ारों को बंद किए जाने की उन्हें आदत पड़ गई है। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में, विक्रेताओं ने सब्ज़ियां और अन्य ताज़ी उपज बेचने के लिए एक अस्थायी बाज़ार बना लिया है
47. ‘अब हम कोरोना वायरस या गर्मी से नहीं डरते’
उनकी मज़दूरी जब बंद हो गई और फिर खाना ख़त्म हो गया, तो वाराणसी के रेस्तरां में काम करने वाले गया, बिहार के श्रमिकों ने धीरे-धीरे अपने घरों की ओर चलना शुरू किया – जबकि ज़िले के अन्य लोग दूर, तमिलनाडु में फंसे हुए हैं
46. ‘इस राशन कार्ड का क्या फ़ायदा है?’
पुणे की गयाबाई चव्हाण और अन्य के लिए अप्रैल का महीना सबसे कठिन गुज़रा, जब कोविड-19 लॉकडाउन के कारण उनकी मामूली आय बंद हो गई, और पीडीएस की दुकानों पर उनके बीपीएल राशन कार्ड को भी ख़ारिज कर दिया गया
45. आप इस हंसमुख मां को तालाबंद नहीं कर सकते
महाराष्ट्र में मुंबई-नाशिक राजमार्ग पर दृढ़तापूर्वक चल रहे प्रवासी मज़दूरों की उस लंबी क़तार में, इस असाधारण मां की तस्वीर ने कलाकार की कल्पना को जगा दिया
44. लॉकडाउन में प्रवासियों का लंबा मार्च
हैदराबाद के संगीतकार, लेखक और गायक आदेश रवि का यह गीत, निश्चित रूप से लॉकडाउन के कारण पूरे भारत में होने वाले पलायन पर लिखे जाने वाले सबसे ताक़तवर गीतों में से एक है
43. वाडा में लॉकडाउन ने छीनी इस्त्री करने वालों की आय
पालघर जिले के वाडा शहर में जो परिवार कपड़े की इस्त्री करके अपना जीवनयापन करते हैं, कोविड-19 लॉकडाउन ने उनकी दैनिक आय को कम कर दिया है। कई लोग राशन ख़रीदने और अन्य काम की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं
42. लॉकडाउन सड़क पर जमलो की अंतिम यात्रा
तेलंगाना के मिर्ची के खेतों में काम करने वाली छत्तीसगढ़ की एक 12 वर्षीय आदिवासी लड़की की 18 अप्रैल को, अन्य मज़दूरों के साथ घर लौटने की कोशिश के दौरान तीन दिनों तक पैदल चलने के बाद मृत्यु हो गई। पारी ने उसके गांव का दौरा किया
41. तेलंगाना के टोकरी बनाने वाले – लॉकडाउन में बंद
कोविड-19 लॉकडाउन ने तेलंगाना के कांगल गांव में टोकरी के व्यापार को बंद कर दिया है। टोकरी बनाने वाले येरुकुला एसटी समुदाय के लोग, फिलहाल कृषि कार्यों, और पीडीएस से मिलने वाले चावल तथा राहत पैकेजों पर निर्भर हैं
40. उत्तर प्रदेश: मुफ़्त सैनिटरी पैड न मिलने से उपेक्षा का शिकार है छात्राओं का स्वास्थ्य
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले में स्कूल बंद पड़े होने के कारण, ग़रीब परिवारों की लड़कियों को मुफ़्त सैनिटरी नैपकिन नहीं मिल पा रहा है, इसलिए अब वे जोख़िम भरे विकल्प अपनाने को मजबूर हैं. सिर्फ़ यूपी में ही ऐसी लड़कियों की संख्या लाखों में है
39. लॉकडाउन हाईवे पर बूढ़ी महिला और उसका भतीजा
कार्यस्थलों से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित अपने घरों तक पहुंचने के लिए पैदल चल रहे प्रवासी मजदूरों के दृश्य हमें आज भी परेशान कर रहे हैं। एक तस्वीर में, हालांकि, इस कलाकार को आशा और मानवता की भावना ज़रूर दिखाई दी
38. लॉकडाउन में ख़ून से लथपथ रेल पटरियां
महाराष्ट्र में औरंगाबाद जिले के पास 8 मई को जिन 16 मज़दूरों – उनमें से 8 गोंड आदिवासी थे – को मालगाड़ी द्वारा कुचल दिया गया था उन सभी की उम्र 20 या 30 साल की थी, और वे मध्य प्रदेश के उमरिया और शहडोल जिले के रहने वाले थे
37. रचेनहल्ली में कोरोना लॉकडाउन: भूखे बच्चे और सांप्रदायिक राजनीति
उत्तरी बेंगलुरु की एक झुग्गी बस्ती में रहने वाले प्रवासी दिहाड़ी मज़दूरों का काम बंद है, बचत के पैसे ख़त्म हो चुके हैं, भोजन की कमी है. उन्हें मकान का किराया चुकाना बाक़ी है, बच्चों को खाना खिलाना है, और भुखमरी के हालात से लड़ना है
36. चंदेरी: महामारी की मार और आर्थिक मुश्किलों से जूझते बुनकर
कोविड-19 लॉकडाउन ने मध्य प्रदेश के चंदेरी शहर के सदियों पुराने कपड़ा उद्योग को ठप कर दिया है. सुरेश कोली जैसे बहुत से बुनकर मांग न होने, पिछले बकाया का भुगतान न मिलने, और घटते संसाधनों के कारण परेशान हैं
35. लॉकडाउन में मार्च करतीं लाल चींटियां
जिस इंसान के घर पर रात के खाने में चाइनीज़-थाई व्यंजन बनाने की तैयारी चल रही हो वह कब तक अपने गांवों की ओर लौट रहे भूखे प्रवासी मज़दूरों को आधे रास्ते में फंसा देख सकती है? समाज में घर कर गई उदासीनता और असमानता के मुद्दे पर दिल को छूने वाली एक कविता
34. एमएफआई ऋण: लॉकडाउन के समय भय और अपमान
कोविड-19 और लॉकडाउन के कारण ग़रीबों ने कमाई में तेज़ी से गिरावट देखी है। लेकिन संकट चाहे जितना भी बड़ा हो, मराठवाड़ा में छोटे वित्तीय संस्थान ऋण की किस्तों के लिए अपने असहाय ग्राहकों को परेशान करना जारी रखे हुए हैं
33. लॉकडाउन के बीच बुज़ुर्ग कामगारों की आजीविका का कोई ठिकाना नहीं
कर्नाटक के बेलगावी और महाराष्ट्र के कोल्हापुर में मशीनों की मरम्मत करने वाले एक मुस्लिम कामगार, एक आदिवासी बुनकर, और रस्सी बनाने वाले एक दलित श्रमिक - तीनों बुज़ुर्ग और अत्यधिक कुशल कारीगरों के पास लॉकडाउन में कोई काम नहीं है
32. मज़दूर दिवस पर घरों में बंदः काम नहीं, तो वेतन नहीं
एक नई डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म, जिसमें बेंगलुरु की मेट्रो रेल परियोजना पर काम करने वाले अधिकांश प्रवासी मज़दूर कोविड-19 लॉकडाउन के समय में पैदा होने वाली अपनी स्थिति के बारे में बता रहे हैं
31. डोला राम की घर जाने वाली लंबी और तालाबंद सड़क
निर्माण स्थलों पर काम करने वाले डोला राम जैसे ही राजस्थान में अपने गांव पहुंचे, उसके कुछ दिनों बाद ही उनके बेटे की मृत्यु हो गई – क्योंकि लॉकडाउन की इस अवधि में उसका ठीक से इलाज नहीं हो पाया था। अब, अन्य प्रवासी मजदूरों की तरह, वह भी क़र्ज़ और अनिश्चितता से जूझ रहे हैं
30. कच्छ के ऊंट चरवाहेः लॉकडाउन में आख़िरी सहारा?
यदि आप ख़ानाबदोश पशुपालक हैं और जानवरों के विशाल झुंडों के साथ अपने घर से काफ़ी दूर हैं, तभी कोविड-19 लॉकडाउन की घोषणा हो जाती है, तब क्या होगा? गुजरात के कच्छ जिले में रहने वाले फ़क़ीरानी जाट अपनी कहानी बयान कर रहे हैं
29. भट्ठों में बंद, ईंट दर ईंट
ओडिशा के हज़ारों प्रवासी श्रमिक तेलंगाना के ईंट-भट्ठों में फंसे हुए हैं – लॉकडाउन ने शोषक कार्यस्थलों को और भी मुश्किल बना दिया – और उनके राशन ख़त्म हो रहे हैं और वे घर लौटने के लिए बेताब हैं
28. लॉकडाउन के भंवर में फंसे आंध्र प्रदेश के मछुआरे
विशाखापट्टनम के मछुआरे हर साल 15 अप्रैल से 14 जून तक की अवधि, जब प्रजनन के सीज़न के दौरान मछली पकड़ने पर प्रतिबंध होता है, से दो सप्ताह पहले सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा कमाते हैं. इस वर्ष, यह महत्वपूर्ण अवधि लॉकडाउन के दौरान आई है
27. लॉकडाउन के तूफ़ान से घिरे जीवन में वानविल ने भरे इंद्रधनुषी रंग
नागपट्टिनम का एक छोटा सा स्कूल तमिलनाडु के इस ज़िले की आदिवासी बस्तियों के 1,000 से अधिक ग़रीब परिवारों के बच्चों के लिए पोषण का केंद्र बन गया है. और, इसके प्रयास सिर्फ़ छात्रों तक ही सीमित नहीं हैं
26. महामारी की क़ीमत चुकाते विदर्भ के पशुपालक
पूर्वी महाराष्ट्र में नंद गवलियों और डेयरी के कामों से जुड़े अन्य किसानों को पशुओं की स्वास्थ्य समस्याओं और चारे की कमी से जूझने के अलावा, दूध की मांग में कमी और आपूर्ति शृंखलाओं के टूट जाने के कारण नुक़सान झेलना पड़ रहा है
25. ‘नावों को भी अपने खेवैयों की याद आती होगी’
कोविड-19 लॉकडाउन के कारण मध्य प्रदेश के चित्रकूट के निषाद नाविकों की आजीविका भी प्रभावित हुई है. इस समुदाय के बहुत से लोगों के पास राशन कार्ड तक नहीं है. सुषमा देवी, जो एक गर्भवती मां और विधवा औरत हैं, उन्हीं में से एक हैं
24. महामारी से बिना सुरक्षा लड़ने को मजबूर – आशा कार्यकर्ता
हरियाणा के सोनीपत जिले में आशा कार्यकर्ताओं को, आख़िरी मिनट में महामारी को नियंत्रित करने के प्रयास के रूप में, कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई के मोर्चे पर धकेल दिया गया है – बिना किसी सुरक्षात्मक उपकरण और बहुत कम प्रशिक्षण के साथ
23. बिना रुके 104 किलोमीटर पैदल चलना
पालघर और ठाणे में ईंट भट्टे पर काम करने वाले मज़दूर, जिनमें से ज़्यादातर आदिवासी खेतिहर मज़दूर हैं, कोविड-19 लॉकडाउन की वजह से बिना किसी कमाई के मानसून तक अपने-अपने घर लौटने को मजबूर हैं
22. उम्मीदों से भी हाथ धो बैठे हैं सिटिज़न नगर के लोग
अहमदाबाद के सिटिज़न नगर के पहले से ही पीड़ित समुदाय के लिए कोविड-19 लॉकडाउन आख़िरी चोट साबित हो रहा है. इसके चलते, यहां भुखमरी बढ़ रही है और स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है
21. सिर पर थैले, दिलों में डर
कोविड-19 लॉकडाउन संकट के कारण होने वाले पलायन ने कवियों और कलाकारों को समान रूप से प्रभावित किया है। एक ऐसी ही प्रतिक्रिया यहां पेश की जा रही है
20. मुरझाते हुए महुआ, बर्बाद होती टोकरियां और ख़ामोश हाट
कोविड-19 लॉकडाउन ने छत्तीसगढ़ में रहने वाले कामर समूह, विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह, जो टोकरियां बुनकर और महुआ के फूल बेचकर चंद रूपए कमाता है, की नाज़ुक अर्थव्यवस्था को तार-तार कर दिया है
19. लातूर में छोटे कंधों पर लॉकडाउन का भार
माता-पिता को चूंकि कोई काम नहीं मिल रहा है या उनकी मज़दूरी काफ़ी घट गई है, इसलिए मराठवाड़ा के लातूर में ऐसे परिवारों के स्कूली छात्र कोविड-19 लॉकडाउन के ख़तरनाक परिदृश्य के बावजूद गलियों में सब्ज़ियां बेच रहे हैं
18. ‘अब तरबूज़ भी सड़ने वाले हैं’
कोविड-19 के कारण लॉकडाउन ने तमिलनाडु के चेंगलपट्टू जिले में तरबूज़ के किसानों को परेशानी में डाल दिया है। ख़रीदारों तथा ट्रांसपोर्टरों की संख्या में भारी गिरावट के कारण, कई किसान या तो अपने फलों को बहुत ही कम क़ीमतों पर बेचने के लिए मजबूर हैं या फिर उन्हें यूंही सड़ने के लिए छोड़ने पर
17. ‘कुछ लोग तो अब दिन में केवल एक बार ही खा रहे हैं’
कोविड-19 लॉकडाउन ने बेंगलुरु के कई दिहाड़ी मज़दूरों की आय छीन ली है या उन्हें बेकार कर दिया है
16. लॉकडाउन में नाइयों का हाल
मराठवाड़ा के लातूर जिले में, नाइयों को लॉकडाउन ने बुरी तरह प्रभावित किया है – वे पूरी तरह से दैनिक आय पर आश्रित होते हैं, और उनके लिए अपने ग्राहकों से शारीरिक दूरी बनाने का विचार अकल्पनीय है
15. सुंदरबन: मौसुनी में लॉकडाउन से खाने की कोई कमी नहीं
पश्चिम बंगाल के सुंदरबन का एक छोटा, सुदूर द्वीप, जिसने कई आपदाओं का सामना किया है, अब कोविड-19 के संकट और लॉकडाउन का सामना अपने स्वयं के संसाधनों से कर रहा है
14. तमिलनाडु: लॅाकडाउन के बीच जागरूकता की तान छेड़ते पराई कलाकार
पराई कलाकार मणिमारन और मगिलिनी इस लॅाकडाउन के दौरान सोशल मीडिया के संसाधनों का उपयोग करते हुए परफ़ॉर्म करना जारी रखे हुए हैं और बातचीत तथा रिकॉर्ड किए गए वीडियो के माध्यम से कोविड-19 के बारे में जागरूकता फैला रहे हैं
13. कोविड के बीच ईरान में फंसी लद्दाखी अवाम हो रही उपेक्षा की शिकार
लद्दाख़ के 254 तीर्थयात्री, जिनमें से अधिकांश बुज़ुर्ग हैं, एक महीने से ज़्यादा समय से ईरान के क़ुम शहर में फंसे हैं, और यहां उनके घरों में तनाव पैदा होने लगा है
12. अभी मीलों चलना है, इससे पहले कि सोने या खाने को मिले
कोविड-19 लॉकडाउन के कारण महाराष्ट्र के पालघर जिले में ईंट भट्ठे पर काम करने वाले प्रवासी आदिवासियों के पास बहुत कम पैसा और खाना बचा है – और लौटने को लेकर गांव से अल्टीमेटम भी मिल रहा है, ऐसे में उनके सामने केवल अनिश्चितता बची है
11. लॉकडाउन में भीख से वंचित पारधी
ग्रामीण महाराष्ट्र के कुछ फांसे पारधी आदिवासियों – विशेष रूप से जिनकी आयु लगभग 80 साल है – को अपना पेट भरने के लिए भीख मांगनी पड़ती है। अब क्या होगा, जब वे उन गांवों में प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं जो उनका भरण-पोषण करते थे?
10. जहां कोई रास्ता आपके घर तक नहीं जाता
कोविड-19 के चलते लागू हुए लॉकडाउन के कारण, महीनों से सड़कों पर चल रहे चेनाकोंडा बालासामी और तेलंगाना के अन्य पशुपालकों के लिए भोजन हासिल करना और नए चरागाहों तक पहुंचना - या अपने गांव वापस लौटना भी मुश्किल हो रहा है
9. कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बीच गन्ने की कटाई
पश्चिमी महाराष्ट्र के चीनी कारख़ानों में काम पर रखे गए लाखों मज़दूरों के लिए आपस में दूरी का पालन कर पाना संभव नहीं है. कोविड-19 के डर के बावजूद सांगली ज़िले के कई लोग अस्वस्थता की स्थिति में भी गन्नों की कटाई कर रहे हैं
8. लॉकडाउन में मुंबई के फ़ुटपाथ पर फंसे कैंसर पीड़ित
ख़त्म होते पैसे और थोड़े से खाने और पानी के साथ, टाटा मेमोरीयल अस्पताल के पास फ़ुटपाथ पर रह रहे कैंसर से पीड़ित मरीज़ लॉकडाउन में फंसे हुए हैं, घर जाने का कोई रास्ता नहीं है
7. कोरोना के चलते अपने ही देश में बने शरणार्थी
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाक़ों के कुछ पत्रकार, कोरोना संकट के कारण पलायन कर रहे लोगों को कवर करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं
6. छत्तीसगढ़ में: सामाजिक दूरी बनाने के लिए मोर्चाबंदी
बस्तर क्षेत्र के कई हिस्सों में, ‘बाहरवालों’ को अंदर प्रवेश करने से रोकने के लिए लोग मोर्चाबंदी कर रहे हैं – और उन प्रवासियों को भी अंदर आने से रोक रहे हैं जो अपने ही गांव वापस लौट कर आए हैं
5. सफ़ाई कर्मचारी: अमानवीय परिस्थितियों में काम के बदले बस नाम का मेहनताना
लॉकडाउन के दौरान काम पर जाने के लिए, चेन्नई के सफ़ाई कर्मचारी पैदल ही लंबी दूरी तय कर रहे हैं या कचरा ढोने वाली लारियों में सफ़र कर रहे हैं. इस दौरान, एक दिन की भी छुट्टी लेने पर जुर्माना देना पड़ सकता है, बर्ख़ास्त भी किया जा सकता है
4. ‘अगर हम भूख से पहले ही मर जाएंगे, तो साबुन से हाथ धोना काम न आएगा’
पालघर ज़िले के कवटेपाड़ा में रहने वाले अधिकांश आदिवासी परिवार निर्माण स्थलों पर दैनिक मज़दूरी करके जीवनयापन करते हैं. कोविड-19 लॉकडाउन के कारण काम बंद पड़ा है, और अब उनके पैसे और राशन तेज़ी से ख़त्म होने लगे हैं
3. कोविड-19 के बारे में हमें क्या करना चाहिए
संकट की इस घड़ी में सरकार द्वारा ‘पैकेज’ की घोषणा निर्दयता और अनभिज्ञता का मिश्रण है
2. वायरल मोड में जाती तुलजापुर के मंदिर से जुड़ी अर्थव्यवस्था
मराठवाड़ा के तुलजापुर में दुकानदार, विक्रेता और अन्य लोग जिनकी आजीविका शहर के प्रसिद्ध मंदिर पर निर्भर है, कोविड-19 को फैलने से रोकने के लिए 17 मार्च से लागू लॉकडाउन के कारण कोई बिक्री न होने से संघर्ष कर रहे हैं
1. ‘वायरस से हमारी मौत भी हो जाए, तो किसी को क्या फ़र्क पड़ता है?'
यह मुंबई के सफ़ाई कर्मचारियों की कहानी है, जो कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई में सबसे आगे खड़े रहे हैं. मज़दूरी मिलने में होने वाली देरी, और सुरक्षा उपकरणों की कमी के बावजूद, वे माहुल क्षेत्र की ज़हरीली हवा में भी कचरा साफ़ कर रहे हैं
हिंदी अनुवाद: मोहम्मद क़मर तबरेज़
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