मया के मयारू धुन
वाह्या ह नागालैंड के कोंयाक आदिवासी समाज के एक ठन बाजा आय, जऊन ला मया जताय बर बउरे जाथे. सलाना अवलेंग बसंत तिहार मं येकर धुन सुनव



वाह्या ह नागालैंड के कोंयाक आदिवासी समाज के एक ठन बाजा आय, जऊन ला मया जताय बर बउरे जाथे. सलाना अवलेंग बसंत तिहार मं येकर धुन सुनव
इरफ़ान शेख अऊ ओकर समाज मुंबई के दहिसर के चहल-पहल वाले गली मन मं रहिथे. वो मन नवा जमाना के चुनोती के बाद घलो ढोलक बनाय के सदियों जुन्ना अपन परंपरा ला आगू लेके जावत हवंय. इरफ़ान अऊ ओकर बखत मुताबिक कला ला बतावत एक ठन फिलिम
ये बजेइय्या ला तारपी (जेला तारपा घलो कहे जाथे) बजावत देखव अऊ सुनव
असम के बोडो समाज के सुबनश्री अऊ बागुरुम्बा नृत्य ला देखव, जऊन मं सिफुंग (लंबी बांसुरी), खाम (ढोल) अऊ सेरजा (वायलिन) बजेइय्या मन घलो हवंय
राजस्थान के नामी बाजा खरताल बनेइय्या बचे-खुचे बढ़ई मन ले एक आंय अनोपाराम सुतार. दीगर लोगन मन फर्नीचर बनाय बर शहर चले गे हवंय काबर के वो मन के कहना आय के उहाँ जियादा कमई होथे
मोहनलाल लोहार 50 बछर ले घलो जियादा बखत ले मोरचंग ब गढ़त हवय. राजस्थान के रेत के टीला मन मं ये बाजा के धुन ला सुने जा सकत हे
बछर भर तक ले चलत रहेइय्या असमी तिहार मन मं थाप बाजा के भरो महत्ता हवय. ये महत्तम ढोल, खोल अऊ दीगर बाजा मन ला बनाय अऊ मरम्मत करेइय्या माहिर कारीगर मन के कहना आय के नवा मवेसी मारे के विरोधी कानून सेती कीमत ह बढ़े हवय अऊ अतियाचार होय हवय
महाराष्ट्र के मिराज शहर के कतको परिवार सितार अऊ तानपुरा जइसने तार वाले बाजा बनाथें. जवान पीढ़ी येला बनाय के हुनर ला छोड़ के अब येला बजाय ला सीखत हवय
भारत के कतको जुन्ना अऊ महत्तम बाजा मन ला बनाय मं कटहर के लकरी बऊरे जाथे, जेन ह जम्मो तमिलनाडु मं जामथे. पनरुती अऊ तंजावुर के भारी माहिर कारीगर मन वो लकरी ले राग अऊ सुर निकार लेथें
भिकल्या लाडक्या धिंडा वारली आदिवासी आंय. 89 बछर के ये संगीतकार वालवांडे मं रहिथे अऊ तरपा बजाथे, जेन ह बांस अऊ सूखाय लौकी ले बने एक ठन पारंपरिक बाजा आय. सुनव ओकर संगीत अऊ आस्था के कहिनी ओकरेच जुबानी
कर्नाटक के मनकापुर गांव मं पारंपरिक, हाथ ले बने शहनाई के लेवाली तेजी ले घटत हवय, 65 बछर के एक झिन कारीगर अपन कला ला बचाय सेती नवा उदिम के सहारा लेथे
किशन जोगी मुंबई के लोकल ट्रेन मन मं सारंगी बजाके अपन ददा के विरासत ला बचाके रखे हवंय. वइसे, राजस्थान ले आय इहाँ आय ये कलाकार ला अपन गुजर-बसर करे सेती भारी जूझे ला परत हवय
जलकल्ला के महिना मं तीज-तिहार बखत छत्तीसगढ़ के गोंड समाज के मोटियारा–मोटियारीन मन हुलकी, मांडरी अऊ कोलांग नाचे बर एक गाँव ले दुसर गाँव जाथें अउ रेला गीत गाथें
छत्तीसगढ़ के नरायनपुर जिला के गोंड आदिवासी अऊ पेशा ले बांसुरी बनैय्या, मनीराम मंडावी ओ बखत ला सुरता करथे, जेन समे जंगल ह अब्बड़ अकन जानवर, रुख-रई अऊ ऊ बांस ले भरे रहय जेकर ले वो खास किसिम के ‘घुमा के बजाने वाला बांसुरी’ बनाथे
छत्तीसगढ़ के बालोद जिला के यादव समाज के पंचराम, बाबूलाल अऊ सहदेव यादव अबो तक ले बांस बाजा-गीत बजाथें अऊ गाथें, फेर ये मन के ये पुरखौती बाजा अउ और गीत के अब पूछनहार,सुनइय्या कमती होगे हें
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