सकाळच्या पहरी कोण गोसावी गं दारी आला
काई सांगु बाई तुला वाढवी कशा गं भिकशा तू गं त्याला
असा सकाळच्या पारी धर्म चांगुणानी केला
धर्म चांगुणानी केला, अंगी देव तो गं राबवीला
असा धर्माचा डावू जिला येतो ना गं तिनी केला
नको म्हणू नासविला, देव उभा तो गं राहिला
हाच धर्माचा डावू कोण घालीतं गं पंगयती
काय म्हणं नासविला, पांडुरंग तो गं रंगतो संगयती
जिच्या कुळीला धर्म चा धर्म, तिच्या लेकीनी चालू केला
गेली लांब वनामधी देव तिथं, तिला साह्य झाला
पाची बोटाचा गं धर्म करी जिवाची सोडवणं
अशी वार्याच्या झगरीनी, कशी उडाली कवळी पानं
असा धर्माचा डावू देते केळीच्या पानावरी
काई यातं मिळाईला भुकेल्याची जाणं करी
आला माझ्या दारामधी देते प्यायला नितं पाणी
येम गेला फिरवूनी भुकेल्याची जाणं करी
असा धर्माचा डावू माझा मला तो गं मिळईला
गेली व्हती देऊळाला सारासारा तो गं कळईला
आस दुबळं-माझं-पण मला कुणी ते गं हिणविलं
देवाला ना जोडी हात, कसं शर्थीनी चालविलं
दुबळं-ना-माझं-पणं मारी वस्ताराला गाठी
किती नाव संभाळीला, सभा घेतल्याना माझ्या गोठी
असा दुबळ्यापणाला नको भाऊ तू रे डगमगू
असा निघूनी जाईल चंद्रावरीला रे काळा ढगू
आस दुबळ्यापणाला नको होऊस रे आयाहुया
आस निघूनी जाईल चंद्रावरली रे काळी साया
अशी दुबळ्यापणाईची कसा करतो हेळयणा
दुपारची सावली आला काखत रे झोळयणा
अशी दुबळ्यापणाईची कोण करीतो टिंगईल
तुझ्या मरणाच्या वेळी सारं काही तो सांगईल
दुबळ्यापणाईला काही बोलावरं तोडून
जाई मोगर्याची कळा गेली वार्यानी रे पडूनी
पूर्वी जलमाच्या किर्ती गेल्या जगात पांगून
नको मज लाडवू देते तुम्हांला रे सांगून
भोरे-भोरे ई कवन गोस्वामी अइलन हमनी दुआरी?
का बताईं सखि? उनका कुछ भिक्षा दे द!
अइसहीं एक बेर भोरे-भोरे संत चगुना (चगुना शिव के भक्त रहस) दान कइली
संत चगुना दान कइली, जइसे भगवान के दरसन कर लेली
जे सांच धरम आ दया-ममता जानेला, उहे ओकरा सहज निभावेला
कवनो नीमन काम व्यर्थ ना जाए सखि, भगवान साक्षी बाड़न
भुखासल के रोटी द, धरम त इहे कहेला
फेर तू काहे कहेलू, धरम बिगड़ गइल. पांडुरंग त एहि सेवा से प्रसन्न होखेलन
भुखासल के रोटी द, धरम त इहे कहेला
फेर काहे बोलताडू, हम धरम भ्रष्ट कर देनी हम, पांडुरंग त एहि सेवा से खुस होखेलन
सच्चा धरम उहे बा जे आपन हाथे कइल जाव, दान-सेवा
लोग तुरंत दोष निकाले लागेला, जइसे हवा के झोंका में सूखल पतवा उड़ियाए लागेला
प्रेम भाव से परसल भोजन भी धरमे के एगो सुंदर रूप बा.
एह धरती पर आइल बाड़, त भुखासल-पियासल के भुल मत जइह
उनका दुआरी जे आवेला, ऊ ओकरा स्नेह से पानी पियावेली
यमराजो भुखल आदमी के पीड़ा देखके लउट गइल रहस
हमरा उहे मिलल जे भाग में रहे
मंदिर गइनी, त धरम-करम के असली मतलब समझ में आइल
हमरा उहे मिलल जे भाग में रहे
मंदिर गइनी, त धरम-करम के असली मतलब समझ में आइल
गरीब जान के लोग हमार अनादर करेला
हम भगवान के सामने हाथ पसारिला, आपन जिनगी के मुस्किल खाली हमही जानिला
गरीब बानी, फाटल चीथरा गांठ लगाके आपन लाज बचाइला
तबो सभा में हमरे चरचा बा
कंगालियो में हम जिए के सीख लेनी, भाई तू घबरइह मत
जइसे एक दिन चनरमा पर लागल दाग हट जाला, वइसहीं दुखो बीत जाला
कंगाली से डेरइह मत
चांद पर छाइल करियर बदरी एक दिन छंटिए जाला
समाज कमजोर के मजाक काहे उड़ावेला
जबकि दुपहरिया के छांवो बदलत रहेला
हमार गरीबी के मजाक के उड़ावता
अंतिम बखत आई, त भगवान न्याय करिहन
उनकर कंगाली के मजाक उडइल, सब स्नेहिल बंधन तुड़ देल
जइसे चमेली आ मोगरा के कली हवा चलला पर झड़ जाला
पिछला जनम में जे भइल से भइल
हमरा एतना लाड़ मत देखाव, कह देतानी
*गोसावी: सांसारिक करम, भोग-विलास त्याग देवे, गेरुआ रंग के वस्त्र धारण करे वाला के कहल गइल बा. ई लोग पूरा जिनगी धरम-करम, पूजा-पाठ में बितावेला.