संभल शहर के पास बसा सराय तरीन, जो हड्डी और सींग से बनी वस्तुओं, मसलन बटन, बीयर के गिलास, सजावटी सामान और रसोई के सामान के लिए मशहूर है, वहां मोहम्मद इस्लाम की एक छोटी सी किराए की दुकान पर ग्राहक आते रहते हैं - बच्चे टॉफ़ियां लेने, तो वयस्क राशन ख़रीदने. वहीं, कुछ बुज़ुर्ग ‘सींग की कंघी’ लेने, जैसा कि दुकान के ऊपर हाथ से लिखा हुआ एक बोर्ड बताता है.
इस्लाम (60) सराय तरीन के उन गिने-चुने कारीगरों में हैं जो आज भी सींग की कंघियां बनाते हैं. उनके पुराने साथी, लगभग 78 साल के मक़सूद ख़ान, अब भी इस कंघी के चंद बचे हुए सप्लायरों में से हैं.
“जिन दस्तकारों ने दुनिया छोड़ी वे ये कला भी अपने साथ ले गए. इसे दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश नहीं की जा रही,” इस्लाम हुक्के का कश लेते हुए कहते हैं. “आप पूरा सराय तरीन घूम लीजिए, लेकिन अगर सींग की कंघी का कारीगर ढूंढेंगे, तो सब आपको मेरे ही पास भेजेंगे.
साल 2022 में इस हस्तशिल्प को भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग मिला था, जो बौद्धिक संपदा संरक्षण प्रदान करता है और उत्पाद को उसके क्षेत्रीय मूल के आधार पर विशिष्ट पहचान देता है. उत्तर प्रदेश सरकार की ‘एक ज़िला, एक उत्पाद’ (ओडीओपी) योजना के तहत भी संभल के हड्डी व सींग से जुड़े उत्पादों को प्रोत्साहित किया जाता है.
“जिसके सर पर बाल, उसकी कंघी,” इस्लाम मुस्कुराते हुए एक कहावत दोहराते हैं. “एक समय था जब हर गली, हर नुक्कड़ पर कंघी मिलती थी.”
वे जिस दुकान पर बैठते हैं, वही उनका वर्कशॉप भी है जिसका किराया 2,000 रुपया प्रति माह है. वे दुकानदार और कारीगर की दोहरी भूमिका निभाते हैं. उनके सामने उनके औज़ार फैले हैं: तरह-तरह की आरी, रेत, छिल्ली (खुरचनी), रेगमाल पेपर और लकड़ी का एक अड्डा (तख्ती) जिसपर कंघी बनाई जाती है.




























