कुछ समय पहले हमारी सत्ताधारी पार्टी के एक सांसद ने भरी संसद में एक विपक्षी सांसद के लिए "कटुए" शब्द का इस्तेमाल किया. यह शब्द मुसलमानों के लिए एक गाली के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, जोकि ख़तने की एक धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है. संसद से लेकर सड़क तक एक शोर उठा और शांत हो गया. यह संसद में बहुसंख्यकवादी पतन का एक नमूना था. संसद की कार्यवाही से तो यह प्रसंग निकाल दिया गया, लेकिन एक स्मृतिजीवी कवि के लिए उसे अपनी बयाज़ से निकालना मुमकिन नहीं था.
कटुए से "काटना" शब्द के अनेक बिंब हमारे पुराने तमाम मिथकों से निकलकर ज़ेहन के मंच पर अवतरित होने लगे. परशुराम द्वारा पिता के आदेश पर मां का सर काटना, राम द्वारा तपस्यारत शंबूक का सर धड़ से अलग करना ,लक्ष्मण का शूर्पणखा की नाक काटना या द्रोण द्वारा धनुर्धर एकलव्य का अंगूठा कटवा लेना - हमारे मिथक इन क्षत-विक्षत रक्तरंजित कहानियों से पटे पड़े हैं. फिर उतरता है हमारा अपना दौर - कटे हुए सरों, कटी हुई बाहों और कटे हुए अंगूठे के ढेर बढ़ते जा रहे हैं. फिर उभरती है लहू से लथपथ एक उम्मीद - "हम सब कटुए हैं और बहुमत में हैं!"


