

Latur, Maharashtra
|THU, APR 24, 2025
लातूर: 43 डिग्री वाला गरमी में ओला बरखा के मार
महराष्ट्र के लातूर जिला के गांव के लोग दसियन साल से गरमी में भारी आ तेज ओला बरखा पड़ला से बेहाल बा. कुछ खेतिहर लोग त अब आपन बगइचा के बिचारे छोड़े के सोचता
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गुणवंत के घर के छत्त उनका ऊपर त ना गीरल, बाकिर इ उनकरा के उनका खेत लगे जरूर धउड़ा देलक. उनका आजो उ सब मन परेला कि कइसे “हमरा खेत के अरिया परल टिन के उ छत फाट गईल आ उड़त हमरा ओर आईल. हम भूसा के ढेर के नीचे लुका गईनी आ केहू तरे अपना के घाही होखे से बचा लहनी.”
अइसन हर बेरा ना होला कि एगो छत रउआ के पीठियावे लागे. अम्बुल्गा गांव में गुणवंत हुलसुलकर जवना छत से भागत रहलन, उ एही साले अप्रील में ओला बरखा आ भारी बयार चलते टूटल गइल रहे.
भूसा के ढेरी से बहरा निकलत गुणवंत, निलंगा तालुका के अपना खेत के बड़ी मस्किल से चिन्हलन. उ गाछ प पड़ल ओलावृष्टि के निसान देखावत कहलन, “इ 18-20 मिनट से बेसी ना रहल होई. बाकिर गाछ गिर गईल रहे, मुअल चिरई कुल एन्ने-ओन्ने छींटाईल रहे, आ हमनी के मवेशी बड़ी घाही हो गईल रहें कुल.”
उनकर 60 बरीस के माई, धोंडाबाई, अंबुल्गा के आपन कंक्रीट से बनल घर के बहरा सीढ़ी प बईठल कहली, “हर 16-18 महीना में बिना बेरा के बरखा चाहे ओला बरखा जरूर होला.” 2021 में, उनकर परिवार 11 एकड़ खेत में दलहन के खेती छोड़ के आम आ रुन्नी (अमरूद) के बगईचा लगावे के सुरु कयील लोग. “हमनी गाछन के देख भाल करे के परेला, बाकिर मौसम के बहुत बेसी खराब भईला से तनियक्के देर के घटना हमनी के कुल पूंजी के नास क देला.”
ए साल भईल इ कौनो पहिलका घटना ना रहे. एकसुरे बरखा आ ओलावृष्टि सहिते खराब मौसम के अइसन घटना कुल पछिला दस साल से देखे में आवता. अंबुल्गे में उद्धव बिरादर के एक एकड़ में लागल आम के बगइचो, 2014 के ओला बरखा में नास हो गईल रहे. उ कहलन, “हमरा लगे 10-15 गो गाछ रहे. उ सब उ तूफ़ान ख़तम हो गईल. हम ओकरा के फेर से जियावे के कौनो परयास ना कईनी.”
37 बरीस के बिरादर कहलन, “ओला बरखा लागल बा. 2014 के तूफ़ान के बाद गाछन के देखल तकलीफ वाला रहे. रउआ ओकरा के रोपनी, ओकर देख भाल कईनी, आ फेर उ मिनट भर में उजर गईल. हमरा नईखे बुझात कि इ सब हम फेन क सकेनी.”

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ओलाबृष्टि? ऊहो मराठवाड़ा के लातूर में? इ एगो अइसन जगह ह, जहां बरीस के आधा से बेसी दिन, परा 32 डिग्री सेल्सियस चाहे ओकरो से ऊपर रहेला. एह साल अप्रील के पहिलका हफ्ता में टटके ओला बरखा भईल, जब तापमान 41 से 43 डिग्री के बीच रहे.
बाकिर इंहां के सब खेतिहर लोग रउआ के खूब नीमन से बताई कि उ लोग अब तापमान, हवामान (मौसम), आ वातावरण के बेवहार के बारे में नईखे बता सकत.
हं, उ लोग इतना जरुर बूझेला कि बरखा वाला दिनन के गिनती कम आ गरम दिन के गिनती बेसी भईल बा. 1960 में, जब धोंडाबाई के जन्म भईल रहे, तब लातूर में सलाना कम से कम 147 दिन अइसन होखे जब तापमान 32 डिग्री से ऊपर चल जात रहे. जइसन न्यूयार्क टेम्स अपना एगो एप से जलवायु परिवर्तन आ ग्लोबल वार्मिंग के बारे में पोस्ट कईल आंकड़ा देखावेला. एह साल, इ गिनती 188 दिन के होई. धोंडाबाई जब 80 बरीस के होईहें, तब इ सबसे गरम दिन के गिनती 211 हो जाई.
जब हम पछिला महीना अंबुलगा में सुभास शिंदे के 15 एकड़ खेत के दौरा कईले रहनी, तब उ कहले रहलन, “बिस्वास कईल मस्किल बा कि हमनी जुलाई के अंत ओरी जतनी.” खेत बंजर लउकता, माटी भुअर बा, आ कही कवनो हरिहरी के निसानो नईखे. 63 बरीस के शिंदे अपना उज्जर कुरता में से एगो दस्ती निकालतारन आ अपना कपार के पसीना पोंछतारन. “हम ए तरे त जून में के बीच में सोयाबीन बोयेनी. बाकिर ए बारी, हम खरीफ के बेर से सायद दूरे रहेम.”
तेलांगना के हैदराबाद से दक्खिनी लातूर के जोरे वाला इ 150 किलोमीटर के जगह में शिंदे जइसन खेतिहर लोग बेसीई सोयाबीन के खेती करेला. शिंदे बतावेलन कि लमसम 1998 ले, जवार, उरीद, आ मूंग इंहा के पहिलका फसल रहे. “उ सब के बेसी बरखा के जरूरत होखेला. हमनी एगो नीमन फसल ला, बेर प मानसून के जरूरत होखे.”
शिंदे आ उनकर जइसन दूसर औरी खेतिहर लोग साल 2000 के लमसम इंहां सोयाबीन के खेती सुरु कईल लोग, काहे से कि उ कहेलन, “सोयाबीन एगो लचीला फसल ह. जदी मौसम के मिजाज तनियक गड़बड़ो भईल होला त एकरा ऊपर ओकर बहुत असर ना होला. इ बिस्व बाजार में खूब लोभावन रहत रहे. मौसम के आखिर में हमनी पईसा बचाइए लेट रहनी. एकरा अलावे, सोयाबीन के कटनी के बाद एकर बांचल चीज कुल मवेसियन के चारा हो जाए. बाकिर पछिला 10-15 बरीस से, सोयाबीनो अनिस्चित मानसून से नईखे निपट पावत.”

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लातूर जिला के कलक्टर, जी. श्रीकांत कहेलन कि “जेही फसल रोपले बा, उ अब पछताता, काहे से कि सुरुआतिये बरखा के बाद सुखाड़ परे लागल.” जिला भर में खाली 64 परतिसत बोआई (सब फसल के) भयील बा. निलंगा तालुका में 66 फीसद. जिला के कुल फसली क्षेत्र के 50 फीसद से बेसी हिस्सा राखे वाला लोग के सबसे बेसी नोकसान भईल बा.
लातूर, मराठवाड़ा के खेतिहर क्षेत्र में आवेला आ इंहा प सलाना बरखा 700 मिमी होला. ए साल ईंहा 25 जून के मानसून आईल रहे तब से इ अनिस्चित बनल बा. जुलाई के अंत में, श्रीकांत हमरा के बतवलन कि एह बेरा में इ बरखा सामान्य से 47 परतिसत कम रहे.
सुभास शिंदे बतावेलन कि 2000 के सुरुआत में, एक एकड़ में 4,000 रोपया के लागत से कईल गईल सोयाबीन के खेती से लमसम 10-12 कुंटल उपज मिले. बीस बरीस बॉस, सोयाबीन के दाम 1,500 रोपया से दुगुना बढ़ के 3,000 रोपया कुंटल हो जाई. बाकिर, उ कहेलन कि लागत तीन गुना हो जाई आ प्रति एकड़ उपज आधा हो जाई.
राज्य कृषि विपणन बोर्ड के आंकड़ा शिंदे के बात के सांच कहेला. बोर्ड के वेबसाईट के कहनाम बा कि 2010 -11 में सोयाबीन के रकबा 1.94 लाख हेक्टेयर रहे आ उत्पादन 4.31 लाख टन. साल 2016 में सोयाबीन के खेती 3.67 लाख हेक्टेयर में कईल गयील. बाकिर उत्पादन खाली 3,08 लाख टन रहे. प्रति एकड़ 89 परतिसत के बढ़ोतरी भईल, बाकिर उत्पादन में 28.5 परतिसत के गिरावट आयील.
धोंडाबाई के मरद, 63 बरीस के मधुकर हुल्सुकर अभी के दस साल के एगो औरी बात के ओर इसारा कईलन. उ कहलन, “2012 के बाद से हमनी ओर कीरा मार दवाई के उपयोग बहुत हो गईल. खाली एही साले हमनी के 5-7 बेर दवाई छिरके के परल ह.”
धोंडाबाई इ सब बात प आपनो बात जोरली, “पहिले हमनी चील, गिद्ध, आ गौरईया इ सब एकदम नियम से देखत रहनी. बाकिर अब पछिला दस साल से उ दुलमो से दुलम होत जाता.”

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लातूर के पर्यावरण जानकार अतुल देउलगांवकर कहेलन, “भारत में कीरामार दवाई के उपयोग अभिनो एक किलो प्रति हेक्टेयर से कम बा. अमेरिका, जापान, आ औरी उद्द्योग धंधा से आगे बढ़ल देस 8 से 10 गुना बेसी उपयोग करेला. बाकिर उ लोग आपन कीरामार दवाई के फेरत, नचावत रहेला. हमनी इ ना करेनी. हमनी के कीरामार दवाई में कैंसरकारी चीज होला, जवन खेत के लगे के चिरइन प असर करेला. ओकनी के जन हत देला.
शिंदे उत्पादन में गिरावट के कारन जलवायु परिवर्तन के मनेलन. उ कहेलन, “मानसून के चार महीना के बेर (जून-सितम्बर) में हमनी लगे 70-75 गो बरखा के दिन होत रहे. बुन्ना-बुन्नी एकसुरे आ धीरे -धीरे होत रहत रहे. पछिला 15 बरीस में, बरखा के दिन एकदम आधा हो गईल बा. जब बरखा होला, त हद से बेसी होला. आ ओकरा बाद 20 दिन ले सुखाड़ रहेला. अइसन मौसम में खेती कयील एकदम असंभव बा.”
भारतीय मौसम बिज्ञान बिभाग लातूर के इ आंकड़ा के दावा के सांच कहता. साल 2014 में, मानसून के चार महिना में बरखा 430 मिमी रहे. आगे साल इ 317 मिमी रहे. आ 2016 में इ जिला में उ चार महीना में 1,010 मिमी बरखा भईल रहे. 2017 में, इ 760 मिमी रहे. पर साल मानसून में लातूर में 530 मिमी बरखा भईल रहे, जुना में से 252 मिमी अकेले जून में रहे. इंहां ले कि ओ बरीस में जिला में ‘सामान्य’ बरखा होला, एकर पसराव आसमान रहे.
भूजल सर्वेक्षण आ बिकास एजेंसी के भूगर्भ बिज्ञानी चंद्रकांत भोयर बतावेलन, “कम समय में एकसुरे बरखा से माटी गले लागेला. बाकिर जब लगातार बरखा होला, तब इ भू जल के फेर से भरे में सहायक होला.”
शिंदे अब खाली भूजल के भरोसे नईखन रह सकत. काहे से कि चार गो बोरवेल सूख गईल बा. “हमनी के 50 फीट गहिरा में पानी भेंटा जात रहे, बाकिर अब 500 फीट गहिरो में बोरवेल सूख गईल बा.”
एकरा से दूसर मस्किल होत जाता. शिंदे कहलन, “जे हमनी ठीक-ठाक मातरा में बोआई ना करें त, मवेसियन ला चारा ना होई. पानी आ चारा बिना, खेतिहर लोग आपन पशुधन जोगा ना पाई. हमरा लगे 2009 ले 20 गो मवेशी रहे. आज, खाली नवे गो बा.”

Nishant Bhadreshwar

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शिंदे के माई कावेरी बाई जे 95 बरीस के उमिर में तेज आ फरहर बाड़ी, कहेली, “लातूर ओ बेरा कपास के एगो केंद्र रहे, जब लोकमान्य तिलक एकरा के इंहा सुरु कईले रहलन.” उ पलस्तर प आपन गोड़ मोड़ के बइठल बाड़ी आ उनकर उठे खातिर केहू के सहारा के जरूरत नईखे. “एकर खेती करे ला हमनी इंहां नीमन बरखा होखे. आज, एकर जगह सोयाबीन ले लेले बा.”
शिंदे खुस बाड़न कि उनकर माई बीस साल पहिलही खेती कयील छोड़ दहली- ओलाबृष्टि सुरु होखे के पहिले. “उ तनियक्के देर में खेत के तबाह क देला. सबसे बेसी कस्ट में ऊ लोग बा जेकरा लगे बगइचा बा.”
एकरा से तनियक नीमन दक्खिनी भाग में, बगइचा लगावे वाला बिसेस रूप से परभावित भईल बा लोग. मधुकर हुलसुलकर कहेलन, “आखिरी ओलाबरखा एही साल अप्रील में भईल रहे.” हमरा के उ अपना बगइचा ले गईलन जहंवां गाछ के डाढ़ी प पीयर रंग के दागी लउकत रहे. “हम 1.5 लाख रोपया के फल भुलुवा दहनी. हमनी साल 2000 में 90 गो गाछ से सुरुआत कईले रहनी, बाकिर आज हमरा लगे खाली 50 गो गाछ बांचल बा.” अब उ बगईचा छोड़े प बिचार करतारन. कहे से कि “ओलाबरखा कब्बो हो जाला.”
लातूर में सइयन बरीस पहिले से, फसल के खांचा में कई गो फेर बदल भईल बा. कौनो बेरा में जवार आ बजरा के दूसर किसिम के बोलबाला वाला इ जगह, जहां मकई के खेती दूसरा नंबर प होखे, उंहा 1905 से भारी गिनती में कपास के खेती होखे लागल.
फेर 1970 में ऊंख आईल, तनी दिन ला सूरजमुखियो आईल. आ फेर खूब भारी हो सोयाबीन के खेती होखे लागल. ऊंख आ सोयाबीन के पसराव खूब सानदार रहल. साल 2018-19 में, 67,000 हेक्टेयर (वसंत दादा शूगर संस्था, पुणे के आंकड़ा कहेला) जमीन प ऊंख के खेती कयील गईल. औरी 1982 में जहां चीनी के एगो कारखाना रहे, उंहें लातूर में अब 11 गो बा. नगदी फसलन के चलते ढेर बोरवेल खोदल गईल. इ बात के कौनो गिन्तिये नईखे कि केतना खोदल गईल- आ भूजल के दोहन होखे लागल. ऐतिहासिक रूप से बजरा ला जौन माटी ठीक रहे, ओमे 100 से बेसी बरीस से नगदी फसलन के खेती होखे से पानी, माटी, नमी, आ बनस्पति प ना मेटावे वाला असर भईल बा.
राज्य सरकार के वेबसाईट के कहनाम से, लातूर में अब खाली 0.54 परतिसत इलाका में बन बांचल बा. इ पूरा मराठवाड़ा क्षेत्र के 0.9 परतिसत के औसत से कम्मे बा.

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अतुल देउलगांवकर कहलन, “इ सब करवाई आ जलवायु परिवर्तन के बीचे कारन के एगो छोट हिसाब किताब बनावल गलत होई. आ सटीक सबूत के साथे बतावल मस्किल हो जाई. एकरे अलावे, इ तरह के बदलाव बड़हां क्षेत्र में होला, ना कि कौनो जिला के आदमी लोग से नापल सीवान के भीतरी होला. मराठवाड़ा में (लातूर जेकर एगो छोट हिस्सा ह) बढ़त कृषि-पारिस्थितिक असंतुलन के चलते बड़का बदलाव हो रहल बा.”
“बाकिर इ बड़का क्षेत्र में कई गो करवाई के बीचे कुछु ना कुछु आपसी संबंध जरुर बा. औरी इ एगो बुझौअल के तरे बा कि फसल में बड़हन पैमाना प बदलाव आ भूमि के इस्तेमाल में बड़का परिवर्तन आ उद्द्योग धंधा के चलते खराब मौसम आ ओलाबरखा देखल जाता. भले आदमी कुल के बेवहार के सिकायत, कारन के रूप में नईखे कईल जा सकत, बाकिर एकरा चलते जलवायु असंतुलन त निस्चित रूप से बढ़ रहल बा.”
ए बीचे, हर साल खराब मौसम के मामला बढ़ला से लोग हैरान बा.
गुणवंत हुलसुलकर कहेलन, “हर कृषि चक्र, खेतिहर के बेसी सोच में डालता. खेतिहर लोग के आपन जान हते के एगो ईहो कारन बा. हमारा लईकन ला सरकारी कार्यालय में क्लर्क के रूप में कार कईल बेसी ठीक रही.” जलवायु के देखत उनकर सोच अब खेती खातिर बदल गयील बा.
सुभास शिंदे कहेलन, “खेती अब समय, मेहनत, आ धन के बर्बादी बेसी बुझाता.” उनकर माई के बेरा में बात दूसर रहे. कावेरीबाई कहेली, “खेती हमनी ला पहिलका पसंद रहे.”
कावेरी बाई के परनाम क के जब हम उनका से बिदा होखे लगनी, त उ हमारा से हाथ मिलौली. उ गरब से हंसत कहली, “पर साल, हमार पोता पइसा जोगा के हमरा के हवाई जहाज से घुमौवलस. जहाज में केहू हमरा के एही तरे परनाम कयील. मौसम बदलता, त हमारा बुझाइल ह कि हमनी के परनाम करे के आदतो में बदलाव होखे के चाहीं.”
कवर फोटो : (लातूर में ओलाबरखा से भारी नोकसान), निशांत भद्रेश्वर
पारी के जलवायु परिवर्तन प केन्द्रित राष्ट्रव्यापी रिपोर्टिंग के प्रोजेक्ट, यूएनडीपी समर्थित ओ पहल के एगो हिस्सा ह जेकरा में साधारण जन आ ओ लोग के जिनगी के अनुभव से पर्यावरण में हो रहल बदलाव के दर्ज कयील जाला
अनुवाद: स्मिता वाजपेयी
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