घर वापसी के लिये अर्जी
मेरे घर वापस पहुँचने का इंतजाम कर दें
हे मौलिक राष्ट्रवादी!
जिसे भी घर या मूल कहते हों आप
मूल धर्म, मूल राष्ट्र,
मूल संस्कृति, मूल योनि...
अपनी जड़ों तक पहुँचने का हक़ है हमारा
और आपका फर्ज़ कि लोग जड़ों तक पहुँचें l
हे विष्णु ! हे ब्रह्मा !!
अस्तित्व के इस जगमगाते ज्योर्तिलिंग का
आप मूल खोजें
आप खोजें अन्त,
मुझे भी मेरा घर दिखा दें
हे जड़राष्ट्रवादी !
वैसे ही जैसे
'वसुधैव कुटुम्बकम्' की हाँक लगाते
रोहिंग्याओं को म्यानमार तक छोड़कर आएँगे आप
जैसे बांग्लादेशी जायेंगे बांग्लादेश
जैसे सारे मुसलमान जायेंगे पाकिस्तान
सारे अल्जीरियाई जैसे छोड़ेंगे फ्रांस
सारे रोमां जर्मनी से वापस अपने घर भेजे जायेंगे
जैसे सारे गोरे अमरीका छोड़ कर जायेंगे यूरोप
जैसे सारे हिन्दु मॉरीशस और सूरीनाम से लौटेंगे
पुण्य भू पर
जैसे आदिमाता की तलाश में हम सब जाएँगे अफ्रीका
जैसे वापस लौटेंगे 'भइया' बम्बई और अहमदाबाद से
जैसे गुजराती दिल्ली छोड़कर जाएँगे
जैसे आदिवासी जायेंगे जंगल (माफ कीजिये जंगल की जरूरत तो सरकार को है! )
मुझे मेरा घर वापस दिला दें ।
और मैं ही क्यों, आप भी चलें – हम सब चलें
वापस पीछे.. बहुत पीछे.. अपने घर की तलाश में
हाथों को जमीन पर टेक दें
पेड़ों पर चढ़ जायें, मिट्टी में धंस जायें,
पानियों में उतर जायें
केचुओं की तरह आत्मसंभोग करें
मछलियों की तरह गलफड़ों से सांस लें।
मौलिकता के महासमुद्र में चेतना के आदि स्तर पर
एक कोशकीय कीड़े बनकर चरें बिचरें…
ईश्वर के सीधे सानिध्य में
शरीर के पर्दे को हटाकर – एकाकार हों।
अधिभौतिक डी.एन.ए. की खोज में
मूल की ओर लौटता ये महाजुलूस, आदि घर, आदि उत्स की ओर
यह आध्यात्मिक महाप्रयोग,
यह फहराती धर्मध्वजाएँ, यह बाजार की दुंदुभी
यह शोर, यह महाशोर
चलें उस ब्लैक होल में चलें;
महानाद के साथ अन्त हो मानवता का
आदि के साथ पुनर्मिलन।
एक सामूहिक मौलिक आत्मघात की ओर चलें
हे अधिराष्ट्रवादी!



