उच्च शिक्षा के लिए, मैंने उदगमंडलम (ऊटी) के आर्ट्स कॉलेज में प्रवेश लिया. अम्मा ने फीस भरने के लिए क़र्ज़ लिया और मेरे लिए किताबें और कपड़े ख़रीदे. इन्हें चुकाने के लिए, वह सब्ज़ी के खेतों में काम करती थीं और गोबर के उपले इकट्ठा करती थीं. शुरुआत में वह मुझे पैसे भेजती थीं, लेकिन मैंने ख़ुद का ख़र्च उठाने और घर पैसे भेजने के लिए कैटरिंग वालों के पास पार्टटाइम नौकरी शुरू कर दी. अम्मा, जिनकी उम्र अब 50 साल से ज़्यादा हो चुकी है, ने कभी किसी से आर्थिक मदद नहीं मांगी. कैसा भी काम हो, वह उसे करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं.
जब मेरी बड़ी बहन के बच्चे थोड़े बड़े हो गए, तो अम्मा उन्हें आंगनवाड़ी में छोड़ देती थीं और जंगल से गाय का सूखा गोबर इकट्ठा करने चली जाती थीं. वह पूरे सप्ताह गोबर के उपले इकट्ठा करती थीं और प्रति टोकरी के हिसाब से 80 रुपए में बेच देती थीं. वह सुबह 9 बजे उपले इकट्ठा करना शुरू करती थीं और शाम 4 बजे तक वापस लौटती थीं. वह दोपहर के भोजन के नाम पर कदलिपडम (कैक्टस का फल) जैसे जंगली फलों पर गुज़ारा करती थीं.
जब मैं पूछता कि इतना कम खाने के बावजूद वह ऊर्जा कहां से लाती हैं, तो वह कहतीं, "बचपन में मैंने बहुत सारा मीट, पत्तेदार सब्ज़ियां, और जंगल व जंगली खेतों से कंद खाया है. उन दिनों जो मैंने खाया उसी से आज भी मेरे अंदर ताक़त बनी हुई है.” अम्मा को जंगली पत्तेदार सब्ज़ियां बहुत पसंद हैं! मैंने अम्मा को चावल के दलिया पर गुज़ारा करते देखा है, जो सिर्फ़ नमक और गर्म पानी में पका होता था.
शायद ही कभी मैंने अम्मा को कहते सुना हो, "मुझे भूख लगी है." लगता है, जैसे हमें, यानी अपने बच्चों को खाते देखकर ही उनका पेट भर जाता था.
हमारे घर में तीन कुत्ते हैं: दिया, डियो और रासाती. हमने बकरियां भी पाली हैं, जिनमें से हर एक का नाम उनके बालों के रंग के हिसाब से रखा गया है. हमारी तरह ही ये जानवर भी हमारे परिवार का हिस्सा हैं. अम्मा उनकी भी उतनी ही परवाह करती हैं जितनी हमारी करती हैं. वे भी उनसे बहुत प्यार करते हैं. हर सुबह अम्मा उन्हें दाना-पानी देती हैं, बकरियों को हरे पत्ते खिलाती हैं और उबले चावल का पानी देती हैं.