जब हमर गोठ-बात चलत रहिस, पाल कंइच्चा माटी ले भगवान कार्तिक के रूप ला गढ़त रहिस अऊ अपन माहिर हाथ ले वो मं बारीकी ले काम करत रहिस. वो ह पेंट ब्रश अऊ बांस ले बने हाथ ले पालिस करे गे मूर्ति बनेइय्या चियरी काम मं लावत रहिस.
लकठा मं बने एक ठन दीगर वर्कशाप मं गोपाल पाल ह माटी के रूप मं एक ठन फरिया ला लटकाय बर लटलटहा लट्ठा बनाय हवय, जेकर ले येकर चमड़ी वाले परत ला चिकनाय जा सकय. गोपाल कोलकाता ले करीबन 39 कोस दूरिहा भंडार दिग मं नादिया जिला के कृष्णनगर के आय. इहाँ बूता करेइय्या बनेच अकन मजूर (सब्बो मरद लोगन मन) एकेच जिला के हवंय; वो मन ले जियादातर मं मालिक के देय एकेच खोली मं रहिथें. मजूर मन के बढ़ती सीजन के महिना ले काम मं रखे जाथे. ये आठ घंटा के पारी मं बूता करथें, फेर शरद महिना के तिहार (नवरात) के ठीक पहिली ये कारीगर मन रात भर बूता करथें अऊ वो मन ला जियादा बखत बूता करे सेती उपराहा पइसा मिलथे.
कुमारटुलि के पहिला कुम्हार मन करीबन 300 बछर पहिली कृष्णनगर ले पलायन करके आय रहिन. वो मन कुछेक महिना बर बागबाजार घाट के तीर, वो बखत नवा बने कुमारटुलि मं रहिन, जेकर ले नदिया ले माटी सुभीता ले लाय सकंय. वो मन जमींदार मन के घर मन मं बूता करत रहिन, दुर्गा पूजा तिहार के पहिली हफ्तों तक ले ठाकुरदालान (ज़मींदार मन के घर के भीतरी पूजा-पाठ के तिहार मनाय सेती बने जगा) मं मूर्ति बनावत रहिन.
1905 मं बंगाल के बंटवारा के पहिली अऊ वो बखत, बांग्लादेश के ढाका, बिरकमपुर, फरीदपुर ले बड़े माहिर कारीगर मन कुमारटुलि आइन. भारत के आजादी के बाद जमींदारी प्रथा खतम होय के संग, सर्बोजोनिन धन सार्वजनिक पूजा के चलन होगे. ये तब ले होइस जब दाई दुर्गा ठाकुरदालान ले निकरके सड़क मं बने बड़े पंडाल मन मं चले गे, जिहां देवी अऊ दीगर मूर्ति मन बर लंबा-चउड़ा अऊ अलग-अलग जगा रहिस.