कनिका सराफ के कहनाम बा, “2030 तक बाल बियाह जइसन कुरीति के खत्म करे के लक्ष्य बहुते चुनौती से भरल बा. एकरा समझे खातिर रउआ के खाली देश के कवनो गांव-देहात पर नजर डाले के जरूरत बा.” कनिका आंगन ट्रस्ट, बिहार के चाइल्ड सेफ्टी सिस्टम के मुखिया हई. ई ट्रस्ट पूरा तरह से बाल-सुरक्षा पर नजर राखेला. ऊ कहतारी, ”बाकिर महामारी एह समस्या के आउर बढ़ा देले बा. एह दौरान हमनी पटना में खाली 200 बाल बियाह रुकवावे में सफल रहनी. अब रउआ लोग बाकी जिला आउर उहंवा के गांव के अंदाजा खुदे लगाईं.”
नीति आयोग के मानल जाव त 2013-14 के बीच बिहार में लिंगानुपात देखल जाव, त हर 1,000 पुरुष पर 916 गो महिला बाड़ी. एकरा 2005-07 के तुलना में सुधार के रूप में देखल गइल. ओह घरिया ई गिनती 909 रहे. अइसे त, एकरा से कवनो उम्मीद ना बंधेला. काहेकि 5 बरिस पूरा करे से पहिलहीं लइका के तुलना में जादे लइकी के मौत हो जाला. एही से लिंगानुपात आगे आउर खराब हो जाला. पटना में 5 बरिस से कम उमिर के लइकन के मृत्यु दर (हर 1000 जन्म पर 5 बरिस से पहिले ही मौत के संभावना) 39 लइकन पर 43 लइकियन के बा. संयुक्त राष्ट्र के एजेंसी सभ के अनुमान पर भरोसा कइल जाव त 2019 में एह बारे में राष्ट्रीय आंकड़ा 34 लइकी पर 35 लइकी के रहे.
गंगा मानेली कि जे खुशी उकरा आपन बेटा के पैदा होखे पर ना भइल, ऊ खुशी पोता ही दे सकता. ऊ कहतारी, “प्रकाश कवनो काम के नइखन. पंचमा के बाद स्कूल जाए के नाम ना लेलन. एहि से हमरा एगो पोता के आस बा. उहे परिवार आउर आपन माई के ख्याल रखी. रानी के ओतना नीमन खाना ना मिलल, जेतना एगो गरभ वाली मेहरारू के मिले के चाहीं. पछिला कुछ दिन से ऊ कमजोरी के मारे बोल नइखी सकत. एहि से हम खुद उनकरा साथे अस्पताल रुकनी आउर बेटा के घरे भेज देनी ह.”
गंगा आपन बेटा के चाल-ढाल से बहुते परेसान बाड़ी, “जब ऊ नशा में घरे लउटेला, आउर हमर पतोह ओकरा टोकेली, त ऊ ओकरा मारे लागेला. घर के सामान तोड़े-फोड़े लागेला.” पर इहंवा सोचे के ई बात बा कि का बिहार में झुट्ठो के शराबबंदी बा? एनएफएचएस-4 के हिसाब से शराबबंदी भइला के बादो, बिहार के 29 प्रतिशत मरद लोग शराब पिएला. गांव-देहात में त ई आंकड़ा 30 प्रतिशत तक बा.
रानी के गरभ ठहरला पर, गंगा काम खोजे लगली. ऊ गांव के बहिरा मेड के काम खातिर भटकली, बाकिर काम ना बनल. रानी बतावत बाड़ी, “हमार बीमारी आउर हालत देख के हमार सास परेशान हो गइली. हमरा दूध आउर फल देवल जरूरी रहे. एहि से ऊ कवनो रिस्तेदार से पांच हजार रुपइया करजा मांग लइली.”
रानी के आपन जिनगी आउर देह पर कवनो इख्तियार नइखे रह गइल. देह त उनकर बा, बाकिर हुकूम एकरा पर उनकर मरद के चलेला. ऊ उदास टोन में कहली, “हम एहि तरह बच्चा पैदा करे के मशीन बनल रहम, त पता ना हमरा साथे का होई. बाकिर जदी हम जिंदा बच गइनी, त हम कोशिश करम कि आपन लइकी लोग के जेतना तक मन करे, ओतना पढ़ाईं.”
“हम नइखी चाहत हमार लइकी लोग के दशा हमरा जइसन होखे.”
एह स्टोरी में कुछ लोग आउर जगह के नाम, पहचान जाहिर ना होखे, एह से बदल देहल गइल बा.
पारी आ काउंटरमीडिया ट्रस्ट भारत के कोना-कोना में बसल गांव-देहात के किशोरी आउर जवान माईलोगन के धियान में रखके रिपोर्टिंग करेला. देश भर में चले वाला ई प्रोजेक्ट 'पापुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया' से जुड़ल एगो पहल के हिस्सा बा. इहंवा आम जनन के आवाज आ ओह लोग के जिनगी के अनुभव जाने के मिली. एकर मदद से महत्वपूर्ण, बाकिर हाशिया पर पड़ल समुदायन के हालत के पड़ताल कइल हमनी के मकसद बा.
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जिज्ञासा मिश्रा ठाकुर फैमिली फाउंडेशन के स्वतंत्र पत्रकारिता अनुदान के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य आउर नागरिक स्वतंत्रता पर लिखेनी. एह रिपोर्ताज के सामग्री पर ठाकुर फैमिली फाउंडेशन के कवनो संपादकीय नियंत्रण ना हवे.
अनुवाद: स्वर्ण कांता