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North Tripura, Tripura

May 05, 2024

‘करघा मुझे भले छोड़ दे, मैं इसे कभी नहीं छोडूंगा’

युवा उम्र में रूपचंद देबनाथ साड़ियां बुनते थे, पर आज वह त्रिपुरा में अपने करघे पर गमछा बुनते हैं. आय में हो रही गिरावट के बीच कोई सरकारी सहायता न मिलने के कारण इस पेशे के सहारे गुज़ारा कर पाना नामुमकिन होता गया है, इसलिए यहां के अन्य बुनकर इससे दूर जाने लगे हैं. लेकिन रूपचंद ने अपने करघे को नहीं छोड़ा है

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Author

Rajdeep Bhowmik

राजदीप भौमिक, पुणे के आईआईएसईआर से पीएचडी कर रहे हैं. वह साल 2023 के पारी-एमएमएफ़ फ़ेलो हैं.

Author

Deep Roy

दीप रॉय, नई दिल्ली के वीएमसीसी व सफ़दरजंग अस्पताल में परास्नातक रेज़िडेंट डॉक्टर हैं. वह साल 2023 के पारी-एमएमएफ़ फ़ेलो हैं.

Photographs

Rajdeep Bhowmik

राजदीप भौमिक, पुणे के आईआईएसईआर से पीएचडी कर रहे हैं. वह साल 2023 के पारी-एमएमएफ़ फ़ेलो हैं.

Editor

Sarbajaya Bhattacharya

सर्वजया भट्टाचार्य, पारी के लिए बतौर सीनियर असिस्टेंट एडिटर काम करती हैं. वह एक अनुभवी बांग्ला अनुवादक हैं. कोलकाता की रहने वाली सर्वजया शहर के इतिहास और यात्रा साहित्य में दिलचस्पी रखती हैं.

Editor

Priti David

प्रीति डेविड, पारी की कार्यकारी संपादक हैं. वह मुख्यतः जंगलों, आदिवासियों और आजीविकाओं पर लिखती हैं. वह पारी के एजुकेशन सेक्शन का नेतृत्व भी करती हैं. वह स्कूलों और कॉलेजों के साथ जुड़कर, ग्रामीण इलाक़ों के मुद्दों को कक्षाओं और पाठ्यक्रम में जगह दिलाने की दिशा में काम करती हैं.

Translator

Prabhat Milind

प्रभात मिलिंद, शिक्षा: दिल्ली विश्विद्यालय से एम.ए. (इतिहास) की अधूरी पढाई, स्वतंत्र लेखक, अनुवादक और स्तंभकार, विभिन्न विधाओं पर अनुवाद की आठ पुस्तकें प्रकाशित और एक कविता संग्रह प्रकाशनाधीन.