उत्पीड़न के ख़िलाफ़ ट्रांस महिलाओं का मतदान
वाराणसी में क़ानून व्यवस्था ट्रांस महिलाओं और उनके अधिकारों की सुरक्षा में लगातार विफल रही है. इसीलिए, इस बार के आम चुनाव में उनका वोट बदलाव के पक्ष में गया



वाराणसी में क़ानून व्यवस्था ट्रांस महिलाओं और उनके अधिकारों की सुरक्षा में लगातार विफल रही है. इसीलिए, इस बार के आम चुनाव में उनका वोट बदलाव के पक्ष में गया
चार जून को आम चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और झारखंड में नई सुबह का सूरज दस्तक दे रहा है. लेकिन डाल्टनगंज के लेबर मार्केट के मज़दूरों का कहना है कि पहले की तरह ही काम मिलने में बहुत मुश्किलें आ रही हैं
एक सदी से पहले, हरियाणा की यह तहसील भारत की आज़ादी की लड़ाई के एक अभूतपूर्व क्षण का गवाह बनी थी. आज इस क्षेत्र के मज़दूर और श्रमिक इस बात को साझा कर रहे हैं कि 2024 के आम चुनावों का उनके लिए क्या महत्व है
देश के सभी मतदाता ऐसे दमदार सांसद चुनना चाहते हैं जो उनकी समस्याओं को दिल्ली तक ले जाए. भारत-पाकिस्तान की सबसे ज़्यादा संवेदनशील सीमा वाघा बॉर्डर के आस-पास रहने वाले बेरोज़गार कुली 2024 के आम चुनाव में अपने वोट से ऐसा ही प्रतिनिधि चुनना चाहते हैं
पंजाब के मानसा ज़िले में किशनगढ़ सेधा सिंह वाला की बुजुर्ग महिलाओं के लिए 2020-21 का ऐतिहासिक किसान आंदोलन एक युगांतकारी घटना थी. इस विरोध-प्रदर्शन से उन्होंने जीवन में बहुत कुछ नया सीखा. यहां तक कि इस आंदोलन ने 2024 के आम चुनावों में यह फ़ैसला करने में मदद की कि किसे मतदान करें
पश्चिम बंगाल की एक रिपोर्टर और एक कवि, अपने राज्य से लोकसभा चुनाव 2024 के पहले बीते पांच साल का आंखों-देखा हाल सुनाते हैं
इस निर्वाचन क्षेत्र की जनता ने नरेंद्र मोदी को दो बार चुना, लेकिन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत राज्य वित्तपोषित कार्यों की कमी के कारण लोगों को सिर्फ़ निराशा हाथ लगी है
सरकार की योजनाओं और रोज़गार के अवसरों से झारखंड में दुमका के आदिवासी-गांव आज भी लगभग वंचित हैं. 2024 के आम चुनावों के अंतिम चरण के ठीक पहले आदिवासियों के इस असंतोष को साफ़ महसूस किया जा सकता है
पंजाब के मोगा ज़िले में हेरोइन व अन्य नशीली दवाएं जवान व उम्रदराज़ पुरुषों को अपनी गिरफ़्त में ले रही हैं. ऐसे में औरतें जो भी थोड़ी बहुत नौकरियां या काम हैं उनको हासिल करने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं. साल 2024 के आम चुनाव में यही यहां का अहम चुनावी मुद्दा है
ख़्वाजा मोईनुद्दीन (92) भारत के पहले आम चुनाव में किए मतदान को याद करते हैं. उन्होंने 2024 के आम चुनावों में भी वोट दिया है. महाराष्ट्र के बीड में रहने वाले मोईनुद्दीन हमारे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में बात करते हैं
पश्चिम बंगाल के 24 परगना ज़िले के सन्देशखली और मिनाखान प्रखंडों के जो प्रवासी मज़दूर राज्य के दूसरे हिस्सों की रैमिंग मास इकाइयों में काम करने गए थे, उन्हें कुछ सालों के भीतर ही सिलिकोसिस के रोग से ग्रस्त होकर वापस जाना पड़ा. निराशा में डूबे हुए वह कहते हैं कि 2024 के आम चुनावों के बाद भी उनके लिए कुछ नहीं बदलेगा
भारतीय लोकतंत्र का महापर्व कहे जाने वाले लोकसभा चुनावों पर एक कवि का बयान हमें बताता है कि कैसे चुनावों में आम अवाम के अधिकारों को छोड़कर बाक़ी सारी बातें की जाती हैं
महाराष्ट्र के जलगांव में लोकसभा चुनाव 2024 के प्रचार अभियान के दौरान, स्थानीय व्यंजन बनाने वाली 14 महिलाओं की टीम केंद्र में थी
सिर्फ़ तीन गर्मियों पहले की बात है, जब पूरे देश ने देखा था कि कैसे प्रदर्शनकारी किसानों पर बेरहमी से बल प्रयोग करके उन्हें दिल्ली में घुसने से रोका गया था. पंजाब के चुनाव अभियानों में किसान उस हिसाब को अहिंसक ढंग से चुकता कर रहे हैं
पंजाब में लोग कह रहे हैं कि किसानों और मज़दूरों के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का जो बर्ताव रहा है उसके बाद उनका आम चुनाव 2024 में वोट मांगने का कोई हक़ नहीं बनता. यह संदेश था इस सप्ताह लुधियाना में हुई किसान मज़दूर महापंचायत का
सरकारी नियमों में शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे लोगों के लिए वोट देने का प्रावधान है, पर बबलू कोईबर्तो जैसे कुछ लोग 2024 के आम चुनाव की प्रक्रियाओं में भाग लेने को लेकर तय नहीं हैं
यवतमाल में, दरअसल पूरे ग्रामीण महाराष्ट्र में, विवाह का संकट है: पुरुषों को साथी नहीं मिल रहीं और युवा महिलाएं ग़रीब किसानों के बजाय सरकारी नौकरी वालों को प्राथमिकता दे रही हैं. यह कुछ और नहीं, घटती कृषि आय का सीधा नतीजा है. साल 2024 के आम चुनाव से पहले, आय में गिरावट और विवाह की कम होती संभावनाएं लोगों की चिंताओं में सबसे ऊपर हैं
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले में प्याज़ के खेतों में काम करने वाली माल पहाड़िया आदिवासी महिलाएं लोकसभा चुनाव से पहले 'पारी' को अपनी प्राथमिकताएं बताती हैं, जिसमें काम, खाने की चिंता पहले है, मतदान का नंबर उसके बाद आता है
साहस और विनम्रता से भरी भवानी महतो, भारत की आज़ादी के लिए हुए ऐतिहासिक संघर्ष में दशकों तक क्रांतिकारियों का पेट भरती रहीं, साथ ही खेती-किसानी करके अपने परिवार को भी पोसती रहीं. अब वह 106 साल की हो चुकी हैं, लेकिन उनकी लड़ाई जारी है…लोकसभा चुनाव 2024 में उन्होंने मतदान कर दिया है
उत्तर मुंबई के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र में दामू नगर की झुग्गियों में रहने वाले लोगों के लिए 2024 के आम चुनावों का मतदान समाज के वंचितों के अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है
जब क्वियर समुदाय के सदस्य 2024 के आम चुनावों में प्रचार के लिए निकले, तो सत्ताधारी पक्ष के समर्थकों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और उनके साथ-साथ उन पत्रकारों को भी धमकाया जो वहां घटना को कवर करने आए थे
असम में संदिग्ध-मतदाताओं (डी-वोटर्स) की एक अनूठी श्रेणी है, जिसमें कई बांग्लाभाषी हिंदू-मुसलमान अक्सर मतदान के अधिकार से वंचित कर दिए जाते हैं. ज़िंदगी भर असम में रहने वाली मरजीना ख़ातून एक बार फिर आम चुनाव 2024 में अपना वोट नहीं डाल पाईं
भगवान और उनके भव्य मंदिर के उद्घाटन की धूमधाम थोड़ी मद्धम पड़ चुकी है, और ऐसे में एक कवि की तेज़धार व्यंग्य रचना हमें राष्ट्र के बदलते स्वरूप पर नज़र डालने को मजबूर करती है
सतपुड़ा की पथरीली ढलानों के बीच बसता है आंबापानी. एक ऐसा गांव जहां लोकतंत्र का लाभ नहीं पहुंच पाया है- यहां के लोग आम चुनाव 2024 में अपना वोट तो देंगे, पर उनके पास न सड़कें हैं, न बिजली या स्वास्थ्य सुविधाएं
झारखंड के पलामू ज़िले के चेचरिया गांव में मनरेगा और मुफ़्त एलपीजी सिलेंडर, सड़क और हैंडपंप जैसी सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में दलित ग्रामीणों के प्रति उदासीनतापूर्ण व्यवहार हुआ है. अपनी समस्याओं से तंग आ चुके इन क्षुब्ध लोगों का यह मानना है कि 2024 का आम चुनाव इस हिसाब-किताब को बराबर करने के लिए सही अवसर है
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले के जंगलों में लौह अयस्क खदानों ने आदिवासी आबादी के आवासीय इलाक़ों और संस्कृतियों को नष्ट कर दिया है. वर्षों से, इस क्षेत्र में सुरक्षा बलों और सीपीआई (माओवादी) के बीच संघर्ष भी जारी है. इस साल, आदिवासी इलाक़े की 1,450 ग्रामसभाओं ने 2024 के आम चुनावों में अपनी कुछ ख़ास मांगों के साथ कांग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन दिया. इस निर्णय के पीछे के कारणों को कुछ इस तरह समझा जा सकता है…
छत्तीसगढ़ में कार्यरत मध्य प्रदेश के मज़दूरों को इस बात का भी पता नहीं कि उनके घरेलू निर्वाचन क्षेत्रों में आम चुनाव 2024 के लिए मतदान की तारीख़ क्या है. इस बात की संभावना कम ही है कि वे मतदान करने जा पाएंगे
हिंदू भीड़ उन धर्मस्थलों पर हमला कर रही है जहां सदियों से कई धर्मों के लोग पूजा करते रहे हैं. अपने निश्चय पर अटल मालगांव ने दिखाया है कि जीवन जीने के सर्वधर्मी तरीक़ों को अभी भी ज़िंदा रखा जा सकता है
महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले में स्थित खडीमल गांव में कभी पानी या बिजली की सुविधा नहीं रही. ग्रामीणों का कहना है कि नेता पांच साल में एक बार आते हैं और खोखले वादे करके ग़ायब हो जाते हैं. इसीलिए उन्होंने सामूहिक रूप से फ़ैसला किया है कि साल 2024 के लोकसभा चुनावों का बहिष्कार करेंगे
गर्मी के इन दिनों में महाराष्ट्र के एक आदिवासी गांव पलसगांव के रहने वाले ग्रामीण एक अप्रत्याशित ख़तरे के चलते अपनी वन-आधारित आजीविका छोड़कर घरों में बंद हो गए हैं. साल 2024 के आम चुनावों के बनिस्बत उन्हें अपनी जान की चिंता ज़्यादा सता रही है
महाराष्ट्र के भंडारा ज़िले के युवा पलायन करने को मजबूर हैं, क्योंकि गांवों में उनके लिए कोई काम नहीं बचा है. आम चुनाव 2024 उनके लिए दूर की कौड़ी की तरह हैं
भारत के सबसे ग़रीब परिवारों का भरोसा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी (मनरेगा) योजना के साथ-साथ महुआ और तेंदू पत्ते जैसी लघु वन उपज पर है. आम चुनाव (2024) में 19 अप्रैल को मतदान के लिए तैयार अरततोंडी गांव के आदिवासी ग्रामीणों का कहना है कि पिछले 10 साल में उनका जीवन और भी मुश्किल हो गया है
लगातार सूखे की चपेट में रहने के कारण झारखंड के इस ज़िले के छोटे और सीमांत किसान क़र्ज़ के बोझ में पिस रहे हैं. उनका कहना है कि जो सिंचाई की समुचित सुविधाएं मुहैया कराएगा उनका वोट उसी को ही मिलेगा
भारत के आम चुनाव 2024 के पहले चरण में भंडारा-गोंदिया संसदीय क्षेत्र में 19 अप्रैल को मतदान होगा. यहां शिवाजी स्टेडियम में बेरोज़गारी और चिंता साफ़ छलक रही है, जहां ग्रामीण युवा सरकारी नौकरियों के लिए प्रशिक्षण में जुटे हैं. यह उनके लिए प्राथमिकता है, चुनावी वायदे दूसरे नंबर पर आते हैं. आज की इस कहानी से हमारी श्रृंखला की शुरुआत हो रही है, जिसका नाम है- ग्रामीण मतपत्र 2024
बहुसंख्यक होने का फ़ायदा उठाते हुए महाराष्ट्र में हिंदुत्ववादी भीड़ सांप्रदायिकता को हवा दे रही है. फ़ोटोशॉप की गई तस्वीरें, छेड़छाड़ किए गए वीडियो और अफ़वाहें उन्हें उकसाने करने के लिए काफ़ी हैं, नतीजन मुस्लिमों की जान और संपत्ति का नुक़सान हो रहा है
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