हर सुबह, वह उर्वशी को लेकर मैदान में आते हैं और दूसरे बच्चों के आने से पहले ही उसे ट्रेनिंग देना शुरू कर देते हैं. वह बताते हैं कि उसे हर रोज़ इसी तरह नियमित अभ्यास से करना होता है.
ट्रैक सूट पहनी हुई युवा उर्वशी मैदान में कुछ अलग ही नज़र आती है, और प्रशिक्षण के लिए बहुत ही उत्साही और उत्सुक दिखती है और अपने गुरु व मामा की देखरेख में कड़ी मेहनत के लिए तैयार रहती है. उर्वशी को अभी बड़ी लंबी दूरी तय करनी है: उसने स्कूल एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया है, जिसके बाद तांडेकर उसे ज़िला प्रतियोगिताओं में उतारेंगे, ताकि वह आगे चलकर राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सके.
तांडेकर का मानना है कि ग्रामीण बच्चों को दौड़ में शामिल होना चाहिए, चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े. वह उन्हें भारत के कुछ धावकों की कहानियां सुनाते हैं, ताकि उन्हें पी.टी. उषा और उनके जैसे अन्य लोगों के उदाहरणों से प्रेरणा मिले, जिन्होंने तमाम बाधाओं के बावजूद बड़ी सफलता हासिल की थी. उनके शिष्यों का मानना है कि अगर वे कड़ी मेहनत करें और बड़े सपने देखें, तो वे भी बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं.
अपने अनुभवों से सीखते हुए तांडेकर उर्वशी के खान-पान और पोषण का पूरा ध्यान रखते हैं. यहां तक कि दूध और अंडे जैसे बुनियादी पोषक आहारों का भी, जो उन्हें ख़ुद कभी नियमित तौर पर नहीं मिला. वह इस बात का ख़ास ध्यान रखते हैं कि उर्वशी के आहार में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा संतुलित मात्रा में शामिल हो. भंडारा में ही रहने वाली उनकी बहन सीज़न के हिसाब से उपलब्ध मछलियां लेकर आती हैं. उर्वशी की मां भी अक्सर अपनी बेटी को देखने वहां आती-जाती रहती हैं और उसके स्कूल और दूसरे नियमित कामों में उसकी मदद करती हैं.
कोच ने इस बात का ख़याल रखा है कि उनकी शिष्य के पास अच्छे जूते हों, जो उन्हें अपने बचपन में कभी नहीं मिले. वह बताते हैं कि उनके पिता भूमिहीन मज़दूर थे, जो कभी इतना नहीं कमा पाते थे कि उससे घर का ख़र्च बिना किसी मुश्किल के चल सके. और वह इतना ज़्यादा शराब पीते थे कि अपनी सारी कमाई हर रोज़ शराब की बोतल ख़रीदने में ख़र्च कर देते हैं. वह बताते हैं कि ऐसे भी दिन आते थे, जब उन्हें और उनके भाई-बहनों को भूखे पेट रहना पड़ता था.
वह तिरछी मुस्कान के साथ कहते हैं, “मैंने ट्रैक पर दौड़ने का सपना देखा था. लेकिन मुझे मौक़ा नहीं मिला.” उनकी इस छोटी सी मुस्कान के पीछे गहरी निराशा छिपी हुई थी.