“इतिहास, चाहे वो ह कऊनो देस धन भाखा धन धरम के होय, राजा, सरदार अऊ नेता मन के करनी ले भरे हवय. आम लोगन बर ये मं जियादा जगा नई ये, वइसे ये बात अलग आय के वो मन के बगैर इतिहास सायदेच लिखे जाय सकही. कऊनो देस उहां के लोगन मन ले बनथे, भाखा ओकर मन के जरिया ले साँस लेगथे अऊ धरम ह बगरत रइथे. फेर बखत बीते के संग ताकतवर बड़े लोगन मन काबिज हो गीन,” मेराजुद्दीन कहिथें, जऊन ह ये बखत कुनो नेशनल पार्क के तीर मं रहिथें. पार्क अऊ ओकर तीर-तखार के समाज के संग मिलके काम करत, वो ह बनवासी मन के अपन हक ले बेदखल होय के गवाह रहे हवंय. वो ह आम लोगन मन के ये पीरा ला मसूस करत वोला अपन कविता मं बताय हवंय.


Sheopur, Madhya Pradesh
|SUN, FEB 11, 2024
सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव
कवि अऊ शिक्षक, जऊन ह अपन जिनगी दलित अऊ आदिवासी समाज के विस्थापित लइका मन बर समर्पित कर दे हवय, वो मन के पीरा ला बतावत हवय
Poem and Text
Illustration
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सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव
मंदिर मस्जिद के मुखिया मन,
भाखा अऊ देस के अघुवा मन,
सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव.
ए मकुट पिंधे बैपारी मन
तुं नियाव के इज्जत भूला गेव
कागज के पर्ची मां लिखके
मइनखे के कीमत भूला गेव
लिख लौ जी अभी मंय जीयत हंव.
सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव.
तबीयत हा भले कुन बिगड़े हे
अऊ भूख देहें ला जकड़े हे.
नस नस में पानी घलौ नहीं,
फेर साँस अभी नइ उखड़े हे.
संभलौ जी अभी मैं जीयत हंव.
सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव.
हे राज कवि हे कलम गुरु
तूं जादा ज्ञान बघारौ झन,
पइसा बर तूमन रोवत हो
सोज्झे में दु:ख ला मनावौ झन.
छोड़ौ जी अभी मंय जीयत हंव,
सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव।
रोटी के नियम ला कोन लिखिस,
शासन के धरम ला कोन लिखिस,
अउ जेन मां तु्ंहर हुकुम चलै
कानून के दम ला कोन लिखिस.
लिख लौ जी अभी मंय जीयत हंव.
सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव.
हे ज्ञान देवइया ज्ञानी मन
मंदिर अउ काबा मोरेच ए,
भगवान मोर... पैगम्बर मोर
गुरुद्वारा गिरजा मोरेच ए
निकलौ जी अभी मंय जीयत हंव
सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव.
अब कहि दौ जी राजा मन ला
धनवाले भवन सिंहासन ला
जाति धरम के झगरा मां
माते निलज नेता मन ला
कहि दौ जी अभी मंय जीयत हंव,
सुन लौ जी अभी मंय जीयत हंव.
(original) سن لو کہ ابھی میں زندہ ہوں
اے دیر و حرم کے مختارو
اے ملک و زباں کے سردارو
سن لو کہ ابھی میں زندہ ہوں
اے تاج بسر میزان بکف
تم عدل و حمایت بھول گئے
کاغذ کی رسیدوں میں لکھ کر
انسان کی قیمت بھول گئے
لکھو کہ ابھی میں زندہ ہوں
سن لو کہ ابھی میں زندہ ہوں
مانا کہ طبیعت بھاری ہے
اور بھوک بدن پر طاری ہے
پانی بھی نہیں شریانوں میں
پر سانس ابھی تک جاری ہے
سنبھلو کہ ابھی میں زندہ ہوں
سن لو کہ ابھی میں زندہ ہوں
اے شاہ سخن فرزانہ قلم
یہ شورش دانم بند کرو
روتے بھی ہو تم پیسوں کے لیے
رہنے دو یہ ماتم بند کرو
بخشو کہ ابھی میں زندہ ہوں
سن لو کہ ابھی میں زندہ ہوں
آئین معیشت کس نے لکھے
آداب سیاست کس نے لکھے
ہے جن میں تمہاری آغائی
وہ باب شریعت کس نے لکھے
لکھو کہ ابھی میں زندہ ہوں
سن لو کہ ابھی میں زندہ ہوں
اے پند گران دین و دھرم
پیغمبر و کعبہ میرے ہیں
مندر بھی مرے بھگوان مرے
گرودوارے کلیسا میرے ہیں
نکلو کہ ابھی میں زندہ ہوں
سن لو کہ ابھی میں زندہ ہوں
کہہ دو جا کر سلطانوں سے
زرداروں سے ایوانوں سے
پیکار تمدّن کے حامی
بے ننگ سیاست دانوں سے
کہہ دو کہ ابھی میں زندہ ہوں
سن لو کہ ابھی میں زندہ ہوں
अनुवाद : प्रवीण ‘प्रवाह’
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