मेरठ मं एक ठन कैरम बोर्ड कारखाना मं पांच कारीगर मन, 40 ठन कैरम बोर्ड बनाय बर, सरलग पांच दिन तक ले आठ घंटा बूता करिन. ये कारखाना मं हेरक कारीगर ला बारीकी ले पता हवय के ये ह स्ट्राइकर अऊ सिक्का ला कैरम बोर्ड मं तेजी ले मारे बर रहिथे. ये अइसने खेल आय जेन ह जियादा ले जियादा चार झिन खेले सकथें –फेर हरेक बोर्ड बनाय बर पांच झिन कारीगर लगथे. वो मन के मिहनत सेती कैरम के खेल खेल जा सकथे, फेर वो मन कभू घलो येला नइ खेलंय.
मंय साल 1981 ले कैरम बोर्ड बनावत हवंव, फेर मंय कभू घलो एक ठन बोर्ड नइ बिसोंय धन खेलंय. टइम कहां मिलथे? 62 बछर के मदन पाल कहिथे. इहाँ तक के जब हमन गोठियावत हवन, त वो अऊ ओकर संगवारी मन भारी चेत धरे 2,400 डंडा ला जोरिन अऊ बमरी के लकरी के टुकड़ा मन ला काट दीन. हरेक ह 32 धन 36 इंच लाम हवय अऊ मजूर मं वोला कारखाना के बहिर भिथि मं गली (जगा) मं राख देथें.
मदन पाल कहिथे, “मंय बिहनिया 8.45 बजे इहाँ हवर जाथों अऊ हमन 9 बजे ले बूता सुरु कर देथन. जब मंय घर मं आथों त संझा के 7.30 बज जाथे.” इहाँ 'टाइनी कैरम बोर्ड कारखाना धन मेरुत सिटी, उत्तर प्रदेश के सूरज कुंड स्पोर्ट्स कॉलोनी मं कारखाना हवय.
मदन, मेरठ जिला के पूठ गांव मं अपन घर ले हफ्ता मं 6 दिन बिहनिया 7 बजे निकरथे, अऊ अपन काम के जगा करीबन 5 कोस दूरिहा वो ह सइकिल ले जाथे.
एक ठन छोटा हाथी ( टेम्पो ट्रक) मं दू झिन दो ट्रांसपोर्टर्स मन मेरुत सिटी के तारापुरी अऊ इस्लामाबाद इलाका के आरा मिल ले लकरी ला के देय हवंय.
मदन बताथे,” लकरी के ये टुकड़ा मन ले कैरम के फ्रेम बनाय जाही, फेर बनाय के पहिली वोला चार ले छै महिना तक ले खुल्ला मं सूखे सेती बहिर रखे जाथे. हवा अऊ घाम ले टुकड़ा ह सूखा जाथे, वोला सीध मं रखे जाथे अऊ वो मं सीलन नइ परय.”
32 बछर के करन (वो ह इही नांव ले जाने जाथे) इहाँ 10 बछर ले बूता करत हवय, “हरेक डंडा ला जाँच करथे अऊ वो मन ला अलग करथे जऊन ह खराब होगे हवय अऊ वोला वापिस करे जाही.” वो ह कहिथे “येला सूखाय के बाद वोला आरा मसीन वाले करा भेजे जाही, हरेक डंडा ला बरोबर काटे सेती धन येला सीध करे सेती.”
करन बताथे, “प्लाइबोर्ड खेले के सतह बनाय के काम ओकर बाद होथे जऊन ह फ्रेम ले करीबन दू सेंटीमीटर तरी मं होथे जिहां खिलाड़ी अपन कलई अऊ हाथ ला रखथे. ये ह तऊंन जगा ला बनाय के आय जिहां कैरम गोटी ला खेले जाथे. वो ह कहिथे,” बोर्ड बनाय मुस्किल नो हे फेर गोटी ला खेले के सतह ला फिसले ला बनाय असान नो हे.”
ये कारखाना के 67 बछर के सुनील शर्मा कहिथे, “खेल के सतह के मानक आकार 29 गुना 29 इंच आय, अऊ फ्रेम के संग बोर्ड करीबन 32 गुना 32 इंच होथे.” वो ह बताथे, “येकर ले आधिकारिक प्रतियोगिता खेले जाथे. फेर हमन ऑर्डर अऊ अकार के हिसाब ले बनाथन जऊन ह 20 गुना 20 इंच के, अधिकतर लइका मन खेलथें अऊ 48 गुना 48 इंच तक के. एक ठन कैरम बोर्ड ला बनाय सेती चार ठन माई जिनिस के जरूरत होथे. बमरी लकरी के फ्रेम. सतह बर प्लाई बोर्ड, सागोन धन नीलगिरी के लकरी[चकदी] जेन ह प्लाईबोर्ड के आधार आय अऊ गोटी के पाकिट. येकर हरेक जिनिस इहींचे लेगे जाथे. कुछु सप्लायर मन बहिर आन राज ले लाथें.
वो ह सुरता करत कहिथे,” साल 1987 मं दू झिन माहिर कैरम बनेइय्या - गंगा वीर अऊ सरदार जितेंद्र सिंह – ह मोला ये कला के बारीक़ गुर सिखाईन. येकर पहिली हमन बैडमिंटन रैकेट अऊ क्रिकेट बेट बनावत रहेन.
शर्मा अपन आफिस ले कारखाना के मुहटा तक ले रेंगत जाथे जिहां कारीगर मन डंडा ला रखत हवंय, एक के ऊपर एक जमा के. वो ह कहिथे, “हमन 30-40 यूनिट मं बनेच अकन कैरम बनाथन, जऊन ला बनाय मं करीबन 4-5 दिन लगथे. ये बखत हमर करा दिल्ली के एक झिन बेपारी के 240 नग भेजे के आर्डर मिले हवय. हमन अब तक ले 160 नग ला तियार करके, पैक करे हवन.”
साल 2022 ले, भारतीय कैरम बोर्ड ला दुनिया भर के 75 देश मं भेजे गे हवय. केंद्रीय वाणिज्य अऊ उद्योग मंत्रालय के निर्यात आयात डेटा बैंक के मुताबिक, अप्रैल 2022 अऊ जनवरी 2024 के बीच मं करीबन 39 करोड़ रूपिया के दाम के कैरम निर्यात करे गीस. सबले जियादा यूएसए, सऊदी अरब, यूएई, यूके, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यमन, नेपाल, बेल्जियम, नीदरलैंड अऊ कतर (क्रम मं) रहिस.
ये निर्यात आमदनी 10 लाख कैरम बोर्ड ले रहिस जेन ला विदेस मं बिसोय गे रहिस. ये देश मन मं कोमोरोस अऊ मेयट, प्रशांत महासागर मं फिजी द्वीप समूह अऊ कैरिबियन मं जमैका अऊ सेंट विंसेंट जइसने हिंद महासागर के द्वीपसमूह मन घलो शामिल रहिन.
यूएई ह सबले जियादा कैरम बोर्ड मंगाय रहिस, येकर बाद नेपाल, मलेशिया, सऊदी अरब अऊ यमन.
घरेलू बिक्री के कऊनो रिकॉर्ड नइ ये. गर रतिस त यह गजब काम होतीस.
सुनील शर्मा कहिथे, “कोविड-19 बखत हमर करा भरपूर आर्डर रहिस काबर के सब्बो घर मं बंधाय रहिन. वो मन ला बोरियत ला खतम करे के जरूरत रहिस. वो कहिथे, “एक ठन अऊ बात जऊन ला मंय देखेंय, रमजान के ठीक महिना भर पहिली खाड़ी के देश मन ले मांग बढ़ जाथे.”
शर्मा कहिथे, “मंय खुदेच बनेच अकन कैरम खेले हवं. बखत काटे बर ये खेल ह लोगन मन के सबले जियादा मनपसंद के आय.” वो ह कहिथे, “वइसे औपचारिक घरेलू अऊ अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट घलो हवंय, फेर दीगर खेल जइसने लाइव टेलीकास्ट नइ होवय.”
सुनील शर्मा कहिथे, 'हमन 30-40 यूनिट मं बनेच अकन कैरम बनाथन, जऊन ला बनाय मं करीबन 4-5 दिन लगथे. ये बखत हमर करा दिल्ली के एक झिन बेपारी के 240 नग भेजे के आर्डर मिले हवय. हमन अब तक ले 160 नग ला तियार करके, पैक करे हवन'
भारत मं कैरम ले जुरे खेल के नियम अऊ चलाय बर आल इंडिया कैरम फेडेरेशन (एआईसीएफ) नांव के संस्था हवय, जेन ह अपन काम ला ओकर ले जुरे राज अऊ ज़िला स्तर के संघो के जरिया ले करथे. साल 1956 मं स्थापित एआईसीएफ के मुख्यालय चेन्नई मं हवय अऊ ये ह इंटरनेशनल कैरम फेडरेशन अऊ एशियन कैरम कन्फेडरेशन ले जुरे हवय. एआईसीएफ सब्बो टूर्नामेंट के लिए भारतीय टीम बनाथे अऊ खिलाड़ी तियार करथे.
वइसे वैश्विक रैंकिंग दीगर खेल मन के जइसने बेवस्थित अऊ साफ नइ ये, फेर भारत सबले बड़े कैरम खेलेइय्या देश मन ले एक आय. भारत के के रश्मि कुमारी ला माईलोगन मन के कैरम मं विश्व चैंपियन होय सेती जगजाहिर नांव आय. येकर छोड़ चेन्नई के 68 बछर के ए. मारिया इरुदायम, दू बेर के पुरुष विश्व कैरोम चैंपियन अऊ 9 बेर के राष्ट्रीय चैंपियन आय. इरुदायाम भारत के अकेल्ला खिलाड़ी आय जऊन ला कैरम सेती अर्जुन पुरस्कार हासिल करे हवय. ये ह एक चौथाई सदी से घलो जियादा -1996 के बात आय. भारत के दूसर सबले बड़े खेल सम्मान अर्जुन पुरस्कार, हरेक बछर देय जाथे.
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कारखाना के भूंइय्या कुल्हा के भार बइठे, करन के ठीक बगल मं चार ठन डंडा परे हवय, जऊन ला वो ह पारी-पारी ले अपन गोड़ मं फंसाके ओकर तिरछा मुड़ी मं खिला ठोंके के बाद ओकर चों फ्रेम बनावत हवंय. चरों कोना ला जोड़े सेती वो ह आठ मोड़ वाले खिला ठोंकथें जऊन ला इहाँ कंघी कहे जाथे, “खिला ले बढ़िया जोड़ धरथे कंघी,” करन कहिथे.
जब फ्रेम बन जाथे, त 50 बछर के अमरजीत सिंह, एक ठन रेती ले किनारा के धार ला घीस के गोल करथे. वो ह कहिथे, “मोर डेयरी के कारोबार रहिस, फायदा नइ होवत रहिस, येकरे सेती मंय तीन बछर ले इहाँ कैरम बोर्ड बनाय सुरु कर देय रहेंव.”
लकरी के फ्रेम उपर छोटे धारी बने हवय काबर के ये ह आरा मिल ले कट के आय रहिस. अमरजीत तब मरम्मत करथे, चाक मिट्टी जइसने पाऊडर अऊ लकरी चिपकेइय्या मोवीकोल ला लोहा के पट्टी ले फ्रेम ऊपर लगाथे.
वो ह बताथे, “ये ह लकरी के खंचवा ला भर देथे अऊ लकरी के रेसा ला घलो सम कर देथे.” वो ह कहिथे, “ये पेस्ट ला बरूदे की मरम्मत कहे जाथे. जब पेस्ट सूखा जाही, ओकर बाद प्लायबोर्ड के सतह ला बइठाय जाही, वो मं करिया मरम्मत के एक परत लगायजाही.”
ओकर बाद जल्दी सूखेइय्या, पानी झेले वाले, करिया डुको पेंट के परत बोर्ड के भीतरी मं लगाय जाथे अऊ परत के सूखाय के बाद येला रेगमल ले चिक्कन करे जाथे. “फ्रेम मं फिट होय के बाद प्लाईबोर्ड बढ़िया ढंग ले बइथ जाथे. येकरे सेती येला पहिली बना लेय जाथे,” अमरजीत कहिथे.
55 बछर के धरम पाल कहिथे, हमन इहाँ पांह झिन कारीगर हवन अऊ हमन सब्बो, सब्बो काम मं माहिर हवन. वो ह ये कारखाना मं बीते 35 बछर ले काम करत हवय.
धरम कहिथे, “जब घलो हमन ला कतको ऑर्डर मिलथे, त सबले पहिली हमन प्लाईबोर्ड खेले के सतह ला तियार करथन,” मदन अऊ करण तियार प्लाईबोर्ड लाथें जेन ला फ्रेम मं लगाय जाही. वो ह बताथे, “हमन प्लाईबोर्ड के नान नान छेदा ला भरे बर पूरा सतह मं सीलर लगाथन जऊन ह येला वाटरप्रूफ घलो बनाथे. येकर बाद हमन येला रेतमल कागज ले चिकना करथन.”
“प्लाईबोर्ड भारी खुरदराहोथे अऊ कैरम बोर्ड के देखे के बड़े चीज ये आय के खेले के सतह कतक चिकना हवय. कैरम के गोटी ला इहाँ ले उहाँ तेजी ले जाय ला चाही,” शर्मा ह अपन तर्जनी अऊ अंगूठा ले गोटी ला मारे के नकल करत कहिथे. वो ह कहिथे, “हमन मैंगो फेस धन मकाई ट्री फेस प्लाईबोर्ड बउरथन जऊन ला इहाँ के बेपारी कोलकाता ले बिसोथें.”
सुनील सुरता करत कहिथे, “जब हमन 1987 मं सुरु करे रहेन, त खेल के सतह ऊपर चिन्हा हाथ ले करत रहेन. काम जटिल अऊ बखत लेवेइय्या रहिस. हरेक कारीगर टीम के महत्तम सदस्य रहिस.” वो ह कहिथे, “फेर आज हमन जल्दी ले जल्दी खेल के सतह ला प्रिंट कर सकथन.” कारखाना के ऊंच भिथि लं लटके चकोन स्क्रीन डहर आरो करथे. येकर मतलब ये घलो आय के कारीगर गायब होगे, जइसने के बीते तीन ले चार दसक मं खेल समान बनाय के अधिकतर कारखाना मन मं हवय.
स्क्रीन प्रिंटिंग स्टैंसिलिंग तकनीक आय जऊन ह पेंट ला कुछेक जगा मं नइ जाय देय, फेर जरूरी ह लग जाथे. “हमन हरेक सतह मं दू अलग-अलग स्क्रीन काम मं लाथन. लाल चिन्हा बर पहला, अऊ करिया बर दूसर,” धरम पाल कहिथे. ये बखत 240 कैरम बोर्ड के ऑर्डर सेती, सब्बो प्लाईबोर्ड ऊपर चिन्हा पहिलीच ले बनाय जा चुके हवय.
एक बजत हवय, अऊ कारीगर मं मंझनिया खाय मं लाग जाथें. घंटा भर सुस्ताय सेती हवय, फेर वो मन आधा घंटा मं 1.30 बजे लहूंट के बूता करे लगथें. जेकर ले वो मन संझा 5.30 बजे के आधा घंटा पहिली जाय सकंय, मालिक सुनील शर्मा कहिथे.
मजूर मन खाय के लेके आय हवंय अऊ कारखाना के अहाता के पाछू मं सूखाय लकरी के मंझा मं लऊहा-लऊहा खावत हवंय, इहाँ खुल्ला, बोहावत नाली हवय. 50 बछर के राजेंद्र कुमार अऊ अमरजीत ह कारखाना के फर्श के कुछु जगा ला साफ करिन अऊ पातर कंबल ला बिछा दीन. जिहां वो मन मंझनिया खाय के बखत 12-15 मिनट सुस्ताइन. येकर पहिली के वो मन ला नींद आ जावय, जागे के बखत होगे हवय.
अमरजीत कहिथे, “बस पीठ सीधी करनी थी [बस थोकन कनिहा ला सोझ करे ला रहिस].” वो मन लऊहा-लऊहा स्टील के गिलास मं तीर के चाहा ठेला ले लाय चाहा ला पीयत हवंय. ओकर बाद काम मं लाग जाहीं.
अगला काम, पहिली ले तियार हरेक प्लाईबोर्ड उपर चाकड़ी पेस्ट करना आय. “चाकड़ी ह प्लाईबोर्ड के तरी के अधार आय,” राजेन्द्र बताथे जऊन ह इहाँ 20 बछर ले बूता करत हवय. “ये ह आढ़ा-खड़ा ढंग ले सागोन धन नीलगिरी लकरी के पातर पट्टी ला चिपका के बनाय जाथे.
इस काम के पहले मंय दीवार की पुताई करता था [ येकर पहिली मंय पुताई के काम करत रहेंव],” वो ह कहिथे.
“हमन केसरगंज के मेहताब सिनेमा इलाका मं मुस्लिम कारीगर मन ले चाकड़ी बिसोथन. मेरठ मं लकरी के काम करेइय्या हवंय जेन मन सिरिफ चाकड़ी बनाय मं माहिर हवंय,” सुनील शर्मा कहिथें.
राजेंद्र मदन के उलट उहिच जगा मं बइठथे जिहां वो ह थोर बेर पहिली सुते रहिस. ओकर करा 40 चाकड़ी के ढेरी लगे हवय, जऊन मं वो ह एक ठन मोठ पेंट ब्रश के एक एक करके फेविकोल लगावत हवय. करण, जियादा फुर्तीला हवय काबर के वो ह सबले कम उमर के कारीगर आय, चाकड़ी बनाय के बाद चाकड़ी ला लेय अऊ ओकर ऊपर छपे प्लाईबोर्ड चिपकाय के काम ला देखथे.
करन बताथे, “हमन अक्सर दिन-भर के बूता के आखिर मं चाकड़ी चिपकाय सुरू करथन. मंय एक-दूसर उपर प्लाईबोर्ड डारत हवं अऊ ओकर बाद हमन सबले उपर मं वजनी जिनिस ला राख के, रात भर बर छोड़ देथन, जेकर ले ये ह बढ़िया ढंग ले चिपक जाय.”
संझा के सवा 5 बजत हवय. कारीगर मन अपन बूता ला सिरोय मं हड़बड़ावत हवंय. करण कहिथे, “कालि बिहनिया, हमन फ्रेम के प्लायबोर्ड ला सुधारबो.” वो ह कहिथे, “मोर ददा घलो एक ठन अऊ कारखाना मं खेल माल कारीगर रहिस. वो ह क्रिकेट के बेट अऊ स्टंप बनावत रहिस.”
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दूसर दिन बिहनिया 9 बजे काम सुरु हो जाथे. चाहा पीये के बाद,राजेंद्र, मदन, करन अऊ धरम तीनों अपन अपन बूता ला करे बर कारखाना के भीतरी मं अपन जगा मं चले जाथें. अमरजीत बहिर गली मं फ्रेम के धारी ला चिकनाय मं लगे हवय.
करन अऊ धरम एके संग सुरु करथें, प्लाईबोर्ड- चाकड़ी ला सुधार के एक-एक करके फ्रेम के काम ला करथें. हरेक बोर्ड के तय किनारा मं चाकड़ी के तय जोड़ जगा मं ठोंक-पीट के काम करत हवंय.
धरम कहिथे, “फ्रेम के बोर्ड ला सोझ करे मं चार दरजन छोटे खिला के जरूरत परथे.” अचमित ये रहिस के सिरिफ दू झिन मजूर मन मदन के काम के जगा मं रखे बोर्ड ला राखे के पहिली करीबन दू मिनट मं वो 48 खिला ला ठोंक दीन.
आज, मदन कैरम बोर्ड के चारों कोनहा के गोटी पाकिट काटही. पाकिट कटर के घेर चार सेंटीमीटर रखे गे हवय, जऊन ह स्कूली लइका मन के कंपास बाक्स के तकनीक जइसने होथे.
“मंय अपन परिवार मं अकेल्ला खेल समान के कारीगर अंव. मोर तीन झिन बेटा हवंय. एक झिन दूकान चलाथे, दूसर दरजी आय अऊ तीसर ड्राइवर आय,” मदन बतावत कटर के आरी ला दबाय बर बोर्ड मं झुकथे अऊ एक ठन हेंडल ला घूमाथे. वो ला चार ठन पाकिट ला काटे मं मिनट भर घो नइ लगय. ये मं एक जगा ले दूसर जगा छै ले आठ किलो के बोर्ड ला उठाय, पलटे अऊ बेवस्थित रखे के कुछु बखत सामिल नइ ये.
पाकिट काटे के बाद वो ह हरेक बोर्ड ला राजेंदर के टेबल के बगल मं रखथे, जऊन ह दूसर बेर लोहा के पेटी के संग फ्रेम मं मार्मैट पेस्ट के एक परत चढ़ाय बर एक एक करके ले जाथे. जब वो ह मरम्मत ला बगराय बर बोर्ड ला देखथे, त वो खेल के सतह डहर मोर धियान ले जाथे, “देखव, बोर्ड मं दरपन कस मोर ऊँगली दिखत हवय,” वो ह कहिथे.
मालिक शर्मा कहिथे, पहिली नजर मं त ये बोर्ड ह तियार दिखत हवय, फेर पूरा होय अऊ खेले के लइक होय के पहिली बनेच अकन काम अभू घलो छूटे हवय. वो ह कहिथे, “आज के हमर काम सब्बो 40 ठन फ्रेम मं मरम्मत के एक परत लगाय हवय. हमन फ्रेम ला सूखाय के काम कालि बिहनिया करबो.”
दूसर बिहनिया, पांच ले चार झिन कारीगर मन अपन जगा ला छोड़ के बहिर गली मं चले गीन. मदन भीतरी मं हवय. शर्मा कहिथे, “काबर के जम्मो हरेक काम करथें, येकरे सेती फोर फोर के काम कराय के कऊनो मतलब नइ ये. कारीगर ला अपन हुनर के मुताबिक रोजी मजूरी देय जाथे.”
पारी ये अंदाजा नइ लगाय सकिस के वो मन मं मजूरी के फेरफार कतक हवय – खेल समान इण्डस्ट्रीज मन येकर आंकड़ा ला नइ बतायेंव. अइसने लगथे के भारी हुनरमंद कारीगर-जेन मन भारी बारीक़ काम करथें, जेकर एक गलती जम्मो समान ला बरबाद कर सकथे- महिना भर मं 13 हजार रूपिया ले जियादा नइ कमावत हवंय. ये इण्डस्ट्रीज मं अधिकतर महिना मं करीबन 12, 661 रूपिया हुनर वाले मजूर मन के न्यूनतम मजूरी ले कम कमाथें. अऊ ये घलो हो सकथे के ये काम मं लगे बिन हुनर वाले मजूर येकर ले घलो कम कमावत होहीं.
धरम अऊ करन गली के आखिरी छोर मं हवंय. "हमन फ्रेम ऊपर तीन राउंड बरूदे की मरम्मत लगावत हवन, ओकर बाद हमन येला रेतमल कागज मारबो, धरम कहिथे. वो ह आगू बतावत जाथे, “मंय गिने नइ सकंव के कतक बोर्ड मोर हाथ ले बने हवय. लेकिन खेलने का कभी शौक ही नहीं हुआ [ फेर कभू खेले के मन नइ लगिस]. बस एक धन दू बेर कतको बछर पहिली एक दू गोटी मरे रहेंव जब बाउजी [सुनीलशर्मा] मंझनिया खाय के बखत बोर्ड सेट करय.”
राजेंदर पहिली टेबल मं हवय, धरम अऊ करण बढ़िया ढंग ले फ्रेम ऊपर अस्तर (बेस कोटिंग) लगावत हवंय. “ये मरम्मत, करिया रंग अऊ सरेस ला मिला के बनाय जाथे. सरेस सेती ये कोट फ्रेम ले चिपक जाही,” वो ह कहिथे. सरेस एक प्राकृतिक गोंद आय जेन ह मरे जानवर ले बनाय जाथे.
अस्तर लगाय के बाद, अमरजीत रेगमल ले एक बेर अऊ चिक्कन कर देथे. अमरजीत कहिथे, “हमन ओकर बाद फ्रेम ऊपर ब्लैक ड्यूको पेंट लगाबो अऊ ओकर बाद जब सूख जाही त सुंदरस के वार्निश करे जाही. सुंदरस रुख के छाल के गोंद आय जेन ह वार्निश के काम करथे.
जब सब्बो कैरम बोर्ड घाम मं सूखत रहिथे, त मदन कारखाना भीतरी क्रोशिया के पाकेट ला प्लाईबोर्ड के चाकड़ी डहर जोड़े ला अगोरत रहिथे. वो ह चार ठन सुनहरा बुलेटिन बोर्ड पिन ला चारों पाकेट ले चरों डहर आधाच ठोंकथे, अऊ क्रोशिया के पाकेट ला खींचत छेदा ला पिन ला बिठाथे अऊ बढ़िया ढंग ले ठोंक देथे.
शर्मा बताथे, “क्रोशिया ले बने पाकेट मलियाना फाटक अऊ तेजगढ़ी इलाका के माइलोगन मन अपन घर मं बनाथें,” वो ह कहिथे, “12 दरजन 144 नग पाकेट के दाम सौ रुपिया हवय.” येकर मतलब ये होईस के माइलोगन मन ला एक पाकेट के बदला मं 69 पइसा मिलथे.
कैरम बोर्ड अब बन चुके हवय. धरम वोला आखिरी बेर जाँच करे के बाद बोर्ड मन ला सूती कपड़ा ला पोंछथे. अमरजीत एक-एक बोर्ड ला बड़े अकन प्लास्टिक बैग मं पैक करत हवय. “हमन प्लास्टिक बैग मं गोटी के डब्बा अऊ कैरम पाउडर घलो भरथन,” सुनील शर्मा बताथे. “हमन गोटी मन ला बड़ोदा ले मंगवाथन. पाउडर इहाँ मिल जाथे.”
खेले बर तियार बोर्ड ला येकर बाद कार्डबोर्ड के बॉक्स मं पैक करे जाथे अऊ वोला एक दूसर ऊपर रखे जाथे. कालि बिहनिया जब कारीगर मन काम करे आहीं, त वो मन ये आर्डर के आखिरी बचे खेप के 40 बोर्ड ला बनाय सुरु करहीं, अऊ अवेइय्या पांच दिन तक ले इहीच काम करत रइहीं. ओकर बाद सब्बो कैरम बोर्ड ला दिल्ली भेजे जाही, जिहां ले वो ह दूसर देश मं भेजे जाही. ये कारीगर मन तेजी ले बढ़त ये मनभावन खेल ला आगू बढ़ाय मं महत्तम भूमका निभावत हवंय जेकर मजा वो मन खुदेच कभू नइ लेय हवंय.
ये कहिनी मृणालिनी मुखर्जी फ़ाउंडेशन (एमएमएफ) ले मिले फेलोशिप के तहत लिखे गे हवय.
अनुवाद: निर्मल कुमार साहू