यहां प्रस्तुत किए जाने वाले नाटक, शंकरदेव और वैष्णव परंपरा के अन्य लोगों द्वारा लिखे गए नाटकों के ही अलग-अलग रूप होते हैं, और अनुभवी कलाकार नवीन स्वरूप में इनका नाट्य रूपांतरण करते हैं. इंद्रनील दत्ता कहते हैं, "जब मैं नाटक लिखता हूं, तो उसमें लोक संस्कृति के विभिन्न अंगों को शामिल करता हूं. हमें अपनी जाति [समुदाय] और अपनी संस्कृति [संस्कृति] को जीवित रखना है.”
मुक्त दत्ता कहते हैं, ''मुख्य रिहर्सल दिवाली के अगले दिन से ही शुरू हो जाता है. इस समय तक कलाकारों के पास पूरी तरह से तैयार होने के लिए, दो सप्ताह से भी कम समय रह जाता है. दत्ता कहते हैं, “हमारे कलाकार अलग-अलग जगहों पर रहते हैं. उन्हें वापस लाना बहुत मुश्किल होता है.” दत्ता एक अभिनेता होने के साथ-साथ गरमूर संस्कृत टोल (स्कूल) में अंग्रेज़ी भी पढ़ाते हैं.
कॉलेज और विश्वविद्यालय में परीक्षाएं अक्सर महोत्सव के दिनों में ही होती हैं. मुक्त कहते हैं, "लेकिन इसके बावजूद भी छात्र नाटक में हिस्सा लेते हैं, फिर भले ही वे एक दिन के लिए क्यों न आएं. वे रास में अपनी भूमिका निभाते हैं और अगले अपनी परीक्षा देने चले जाते हैं.”
इस उत्सव के आयोजन की लागत हर साल बढ़ती जा रही है. साल 2022 में गरमूर में, महोत्सव के आयोजन में क़रीब 4 लाख रुपए ख़र्च हुए थे. मुक्त कहते हैं, “हम केवल तकनीशियनों का भुगतान करते हैं. बाक़ी सभी कलाकार स्वयंसेवक हैं. लगभग 100 से 150 लोग अपनी स्वेच्छा से काम करते हैं.”
बोरुन चितादार चुक में, रास महोत्सव का आयोजन एक स्कूल में किया जाता है. इसका आयोजन मिसिंग समुदाय द्वारा किया जाता है, जो असम में अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध है. पिछले कुछ वर्षों में, इस महोत्सव में युवा पीढ़ी की रुचि कम हो गई है, और साथ ही बड़ी संख्या में उनके पलायन के कारण भी कलाकारों की संख्या में भारी हो आई है. राजा पायेंग कहते हैं, "अगर हम इस महोत्सव का आयोजन न करें, तो हमारे गांव में कुछ अमंगल भी हो सकता है. यह पूरे गांव का विश्वास है."