अतियाचार झेलत, लड़ई अऊ खून-खराबा के सामना करत, हमन अक्सर दुनिया मं सांति ला लेके सवाल उठावत हवन. फेर एक दूसर से आगू बढ़े, लालच, डाह, नफरत अऊ हिंसा ले चलत सभ्यता मन ला ये सब्बो कइसने नजर आही? जिहां ले हमन आथन तउन जगा मन मं हमन अइसने संस्कृति नई देखेन. हम आदिवासी मन करा घलो सभ्यता के अपन समझ हवय. हमर इहां अइसने नई होय के पढ़े-लिखे लोगन मन रतिया के अंधेला मं धीरे ले कचरा बगराके चले जांय अऊ एक झिन अनपढ़ ला बिहनिया येला बुहारे ला परे. हमन ये ला सभ्यता नई मानन अऊ अइसने कउनो सभ्यता के हिस्सा होय ला नकार देथन. हमन नदी के पार नई हगन. हमन बखत ले पहिली रुख ले फल ला नई टोरन. जेन बखत होरी नजिक आथे, त हमन खेत जोते ला बंद कर देथन. हमन भूईंया ला नई दुहन, धरती ले बछर भर बिना रुके सरलग उपज के उम्मीद नई करन. हमन वोला साँस लेय के मऊका देथन, वोला दुबारा जिंये के समे देथन. हमन प्रकृति के ओतके मान-सम्मान करथन जतके मइनखे के जिनगी के करथन.


Narmada, Gujarat
|WED, AUG 10, 2022
जंगल के सभ्यता
देहवली भीली मं लिखाय पांच ठन कविता के कड़ी मं ये चउथा कविता मं, ये आदिवासी कवि हमर कहे जावत तउन महत्तम सभ्यता के खुदेघात करेइय्या सुभाव अऊ सांति ऊपर पोंडा समझ के बखिया उधेड़त हवय
Poem and Text
Painting
Editor
Translator
येकरे सेती हमन जंगल ले नई लहूँटेन
हमर पुरखा मन ला तुमन
लाक्षागृह मं जरा देव
कतको के अंगूठा काट लेव
कहूँ भाई-भाई ला लड़ा के मारेव
कहूँ अपन हाथ ले अपन घर फुंकवायेव
तुम्हर ख़ूनी सभ्यता के रूप ख़तरनाक आय साहेब,
येकरे सेती हमन जंगल ले नई लहूँटेन.
रुख ले पाके पाना, गिरके मिल जाय माटी मं
इही मउत के दरसन आय हमर
हमन देंवता मन ला अकास मं नई
प्रकृति के हरेक अंग मं पाथन
निरजीव के कल्पना नई ये हमर जिनगी मं
प्रकृति जिनगी के सरग आय
बिन प्रकृति जिनगी नरक आय
अजादी हमर जिनगी के धरम आय
तुमन गुलामी के फांदा ला धरम कहि देव
तुम्हर ख़ूनी सभ्यता के रूप ख़तरनाक आय साहेब,
येकरे सेती हमन जंगल ले नई लहूँटेन.
हमन भूमिसेना हवन साहेब
अपन बांहचे सेती
खुदेच ला हमन नई बचावन
जल, जंगल, जमीन, जन, जानवर
हमर बांहचे के मूल अधार आंय
तुमन हमर पुरखा मन ला
तोप के मुंह मं बांध देव
रुख मन मं लटका के आगि बार देव
पल्टन बनाके हमर, हमिच ला मरवायेव
प्रकृति के ताकत ला खतम करे
तुमन हमन ला चोर, लुटेरा, सूरा, बागी
का-का नई कहेव हमन ला
कागज ले घलो तुमन हम सब्बो ला मार सकत हव
तुम्हर ख़ूनी सभ्यता के रूप ख़तरनाक आय साहेब,
येकरे सेती हमन जंगल ले नई लहूँटेन.
तुमन अपन जिनगी ला बजार बना देव
पढ़े लिखे मन करा अपन आंखी नई रह गेय
साहेब तुम्हर सिच्छा
हमर बांहचे रहे ला घलो बेंच दिही
बजार मं राख दिही हम सबला
सांस्कृतिक सभ्यता के नांव मं तुमन
असभ्यता के बड़े-बड़े पहाड़ बना लेय हव
हरेक मइनखे एक-दूसर ले नफरत करेंय
इही तुम्हर नवयुग के निर्मान आय?
बंदूख, बारूद से तुमन
दुनिया मं सांति बनाय ला चाहत हवव
तुम्हर ख़ूनी सभ्यता के रूप ख़तरनाक आय साहेब,
येकरे सेती हमन जंगल ले नई लहूँटेन.
अनुवाद: निर्मल कुमार साहू
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