“मेरे जैसे 5 और लड़के थे, जो रात में फ़सलों की सिंचाई करते थे। वह बहुत बड़ा खेत था, इसलिए हम सभी को काम मिल जाता था। वहां के सभी लड़के काम करते थे। गांव में कुछ लड़के ऐसे थे, जिनके पिता नाई थे। इसलिए स्कूल के बाद जब भी उन्हें खाली समय मिलता, वे अपने पिता की दुकान पर चले जाते और काम में उनका हाथ बंटाते। ठीक उसी तरह, जैसे हम अपने पिता की तरह खेतों में काम किया करते थे।”
वज़ीर ने 10वीं कक्षा तक पढ़ाई की है। “मैंने बोर्ड की परीक्षा दी थी, लेकिन उसमें पास नहीं हो पाया। इसलिए, मैंने सोचा कि कोई काम ढूंढ कर पैसा कमाया जाए। लेकिन गांव में तब इतना काम नहीं था। यह 1994 की बात है या शायद 1995 की,” वज़ीर ने बताया।
“इसलिए मैं दिल्ली चला गया, एक भाई के घर। वह मेरे सगे भाई नहीं थे, बल्कि दूर की एक चाची के बेटे थे, मेरे चचेरे भाई। वह एक आईएएस अफ़सर थे।”
शायद चचेरे भाई, आईएएस अफ़सर ने वज़ीर को कहीं कोई नौकरी दिलाई हो?
“नहीं, नहीं। मैं अपने भाई के घर में काम करता था। हर काम करता था – खाना बनाना, घर की सफ़ाई करना, पोछा लगाना, फ़र्श साफ़ करना, बर्तन धोना, कपड़े धोना और कभी-कभी कार धोने का भी काम करता था। मैंने सब कुछ किया।”
क्या अच्छी कमाई हो जाती थी? वज़ीर कितना पैसा कमा लेते थे?
“ज्यादा नहीं। लगभग उतना ही, जितना मैं गांव में कमा लेता था। लेकिन सौभाग्य से, भाई एक अच्छे इंसान थे। मुझे रहने के लिए एक कमरा और हर रोज़ खाना मिल जाता था। इसलिए पांच सौ रुपये महीना में कोई परेशानी नहीं थी। उसमें से कुछ पैसे मैं अपने पिताजी को भेज सकता था।”
“लेकिन एक साल तक यह काम करने के बाद, मुझे ऐसा लगा कि मेरा इस प्रकार जीवन व्यतीत करना सही नहीं है। फिर तो मेरा पूरा जीवन यूंही गुज़र जाएगा। मैं अपनी पूरी जिंदगी इसी प्रकार से नहीं जी सकता था। इसलिए मैंने गाड़ी चलाना सीखा, अपने चचेरे भाई की कार से। क्योंकि वह मेरे रिश्तेदार थे, इसलिए उन्होंने मुझे गाड़ी चलाना सीखने की अनुमति दे दी।”