मैंने कहीं लिखा है कि आप शायद हमें उखाड़ फेकेंगे और पानी में डुबो देंगे. लेकिन जल्द ही आपके लिए ज़रा सा भी पानी नहीं बचेगा. आप हमारी ज़मीनें, हमारा पानी चुरा सकते हैं, लेकिन हम फिर भी आपकी आने वाली पीढ़ियों की ख़ातिर लड़ेंगे, और अपनी जान देते रहेंगे. जल, जंगल, और ज़मीन बचाने के लिए जारी हमारी लड़ाई सिर्फ़ हमारी नहीं है. आख़िर, हम में से कोई भी प्रकृति से अलग नहीं है, हर कोई उसका हिस्सा है. आदिवासी जीवन प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर चलने का नाम है. हम ख़ुद को इससे अलग करके नहीं देखते. देहवली भीली में मैंने जो तमाम कविताएं लिखी हैं उनमें से कई में मैंने अपने लोगों के मूल्यों को संरक्षित करने की कोशिश की है.
हमारा, यानी आदिवासी समुदायों का वैश्विक दृष्टिकोण आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आधार हो सकता है. अगर आप सामूहिक आत्महत्या के लिए तैयार नहीं हैं, तो आपके पास उस जीवन, उस विश्वदृष्टि की तरफ़ लौटने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा है.


