चांगथांग पठार में याक चरावे वाला लोग खूब बा. बाकिर एकरा उलट, जांस्कर घाटी में कम बा. स्थानीय लोग के कहनाम बा कि जांसकॉपर्स नाम से चर्चित एह घाटी में ओह लोग के गिनती पहिले से कम हो गइल बा. लद्दाख के कारगिल जिला के अबरान, अक्षो आउर चाह गांव के कुछे परिवार लगे अबहियो याक के झुंड बचल बा.
नोरफेल कबो चरवाही करत रहले. साल 2017 में ऊ आपन याक सभ बेचके आपन अबरान गांव में एगो दोकान खोल लेलन. उनकर दोकान मई से अक्टूबर ले खुलल रहेला. उहंवा चाय, बिस्कुट, डिब्बा वाला खाना, केरोसीन, बरतन, मसाला, खाना पकावे वाला तेल, सूखल मांस इत्यादि मिलेला. ऊ आपन चरवाही के काम इयाद करत कहत बाड़न कि ई बहुते थकावे वाला रहे आउर एह में कवनो नफा ना रहे. “पहिले हमरा लगे याक भी रहत रहे, अब गाय रखिला. बाकिर हमार आमदनी के बड़ा हिस्सा दोकाने से आवेला. कबो-कबो महीना के 3,000-4000 रुपइया के कमाई हो जाला. बाकिर तबो ई आमदनी याक चरवाही से होखे वाला आमदनी से जादे बा.”
अबरान के सोनम मोटुप आउर त्सेरिंग एंग्मो दंपत्ति पछिला कुछ दसक से याक चरवाही करत बाड़न. ऊ लोग लगे मोटा-मोटी 120 याक होई. “हर साल गरमी (मई से अक्टूबर) में हमनी घाटी में ऊंचाई ओरी (जहंवा जादे ठंडा होखे) निकल जाइला. उहंवा चार से पांच महीना ले हमनी डोक्सा में रहिला.”
डोक्सा दरअसल गरमी में पलायन करके आवे वाला लोग के बस्ती बा. इहंवा प्रवासी परिवार सभ खातिर रसोई के इंतजाम भी रहेला. गोथ आउर मणि आदि नाम से जानल जाए वाला ई जगह माटी आउर पत्थर जइसन सुलभ सामान से बनल बा. गांव के चरवाहा लोग आमतौर पर परिवार के सदस्य संगे डोस्का साझा करेला आउर बदला में याक के झुंड के देखभाल करेला. सोनम कहले, “हम इहंवा जनावर चराए जाइला आउर ओह लोग के ख्याल रखिला. हमनी इहंवा बहुते व्यस्त रहिला.”
मई से अक्टूबर के बीच सोनम आउर त्सेरिंग के दिन, मुंह अऩ्हारे तीन बजे सुरु होखेला. एतना भोर में ऊ लोग पहिले चुरपी (स्थानीय पनीर) बनावेला जेकरा बाद में बेचल जाला. सोनम, 69 बरिस, कहलन, “पौ फटला पर हमनी जनावर सभ के चरावे ले जाइला. फेरु दुपहरिया में आराम करिला.”