नल्लकन्नु का जन्म श्रीवैकुंठम में हुआ था, फिर वह तिरुनेलवेली ज़िले में रहने लगे. आज, श्रीवैकुंठम का ताल्लुक़ तमिलनाडु के तूतुकुड़ी ज़िले (जिसे 1997 तक तूतीकोरिन कहा जाता था) से है.
हालांकि, नल्लकन्नु बहुत कम उम्र में ही आंदोलनों में सक्रिय हो गए थे.
“बल्कि जब मैं बच्चा था, तभी से. मेरे शहर के पास तूतुकुड़ी में मिल मज़दूरों ने काम बंद कर दिया. वह मिल हार्वे मिल समूह का हिस्सा था. बाद में, इस हड़ताल को पंचलई [कॉटन मिल] मज़दूरों की हड़ताल के नाम से जाना जाने लगा.
“उस समय, इन मज़दूरों की मदद के लिए हमारे शहर के हर घर से चावल इकट्ठा किया जाता था और तूतुकुड़ी में हड़ताल पर बैठे परिवारों तक बक्से में डालकर पहुंचाया जाता था. हम जैसे छोटे लड़के ही इधर-उधर भागकर, चावल इकट्ठा करने का काम करते थे.” वैसे तो ग़रीबी बहुत थी, “लेकिन हर घर से कुछ न कुछ सहयोग किया जाता था. मैं उस समय केवल 5 या 6 साल का था, और मज़दूरों के संघर्ष के साथ इस एकजुटता का मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा. उसी का असर था कि कम उम्र में ही राजनीतिक कार्रवाइयों में शामिल होने की आदत हो गई.”
हमने 1937 के चुनावों की बात फिर से छेड़ी और पूछा: मंजाल पेटी या पीले बॉक्स के लिए मतदान करने का क्या मतलब था?
वह बताते हैं, “तब मद्रास में मुख्यतः दो पार्टियां ही थीं. कांग्रेस और जस्टिस पार्टी. चुनाव चिह्न के बजाय मतपेटी के रंग से पार्टियों की पहचान होती थी. कांग्रेस, जिसके लिए हमने उस समय प्रचार किया था, उसे एक पीला बॉक्स दिया गया था. जस्टिस पार्टी को पच्चई पेटी [हरा बॉक्स] दिया गया था. उस समय इससे मतदाता को यह पहचानने में आसानी होती थी कि वह किस पार्टी का समर्थन करते हैं.”
और हां, उस समय भी चुनावों में बहुत से रंग नज़र आते थे और ड्रामा होता था. द हिंदू लिखता है कि “देवदासी प्रचारक तंजवुर कमुकन्नमल...सभी मतदाताओं को 'सुंघनी के डब्बे’ पर मतदान करने के लिए प्रोत्साहित करेंगी!” उस समय सुंघनी [तंबाकू] के डब्बे सुनहरे या पीले रंग के होते थे. ‘द हिंदू’ ने भी पाठकों के लिए 'पीले बॉक्स को भरें' शीर्षक से ख़बर चलाई थी.
नल्लकन्नु कहते हैं, “ज़ाहिर है कि मैं सिर्फ़ 12 वर्ष का था, इसलिए मतदान नहीं कर सका. लेकिन मैंने प्रचार में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.” तीन साल बाद, वह चुनाव से परे राजनीतिक अभियानों में भी शामिल होने लगे. और 'पराई [एक प्रकार का ढोल] बजाने और नारे लगाने लगे.”