ग्या गांव के चरवाहे ताशी फुंत्सोग और तुन्दुप चोसगेल कहते हैं, “प्रजनन ऋतु के दौरान, हमारी मौजूदगी के ख़तरे के बावजूद भेड़िए हमारे पशुओं पर हमला कर देते हैं, क्योंकि भेड़ियों को अपने नवजात और युवा बच्चों को खाना खिलाना होता है.” भेड़ियों को लेकर उनकी राय, जंगली शिकारियों के बारे में उनकी समझ को दर्शाती है, जिनके साथ चरवाहा समुदाय अपना क्षेत्र साझा करते हैं. लेकिन अक्सर इन समुदायों को आर्थिक नुक़सान और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है, जब वे अपनी आजीविका के एकमात्र स्रोत मवेशियों को खो बैठते हैं.
अपने पशुओं की सुरक्षा और मांसाहारी जानवरों को दूर रखने के लिए, ये समुदाय पारंपारिक ढांचे का इस्तेमाल करते हैं, जिसे शांगडोंग कहते हैं. ताशी फुंत्सोग और तुदुंप चोसगेल कहते हैं, “हम बचपन से इस परंपरा को देख रहे हैं. अक्टूबर के महीने में, हर ग्रामीण के लिए अपने झुंड से शांगडोंग के अंदर (प्रलोभन के लिए) एक भेड़ को रखना अनिवार्य था. गांव की ड्यूटी के तौर पर, जनवरी तक सभी ग्रामीण बारी-बारी से भेड़ या बकरी को खाना खिलाते. भले ही किसी के पास मवेशी न हों, फिर भी कुछ घास और पानी का एक कैन हर रोज़ देना होता था. यदि कोई भेड़िया पकड़ा जाता, तो ड्यूटी पर मौजूद व्यक्ति को ही उसे मारना होता था.”


