मनोज, 46 वर्ष की आयु में, घोड़े के साथ 30 साल बिता चुके हैं। उनके पास दो घोड़े हैं – स्नोबॉय, जो सफेद है, और फ्लफी, जो भूरे रंग का है। पूरी तरह से सफेद या काले घोड़े महंगे होते हैं, जिनमें से “प्रत्येक का मूल्य लगभग 1-1.2 लाख रूपये” है, वे कहते हैं। कसुंडे प्रति घोड़े से हर दिन करीब 1,000 रूपये कमाते हैं। लेकिन, जब कभी स्नोबॉय या फ्लफी बीमार पड़ते हैं और काम नहीं कर सकते, तो कसुंडे को उनके उपचार और स्वास्थ्य पर 5,000 से 15,000 रूपये खर्च करने पड़ते हैं। और उनके दोनों घोड़ों की देखभाल पर, प्रति माह लगभग 12,000 से 15,000 रूपये खर्च होते हैं।
कसुंडे के दिन की शुरुआत माथेरान के पंचवटी नगर में सुबह-सवेरे होती है। यह 40-50 घरों की एक बस्ती है, जहां कसुंडे अपनी पत्नी मनीषा, माता-पिता, 21 वर्षीय बेटी जिसने अभी-अभी स्कूली शिक्षा पूरी की है, और 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले अपने 19 वर्षीय बेटे के साथ रहते हैं। स्नोबॉय तथा फ्लफी को घास और बाजरा की रोटी या गेहूं का आटा खिलाने के बाद, वह उन्हें सुबह 7 बजे मुख्य बाजार में लाते हैं। शाम को 7 बजे, वे इन घोड़ों को वापिस अस्तबल में लाते हैं। “रात में वे रोटी या बिस्कुट या गाजर खाते हैं, और फिर सोने चले जाते हैं।”
घोड़े के ये रखवाले अपने पशुओं के लिए सामान माथेरान के संडे-मार्केट से खरीदते हैं, जहां स्थानीय आदिवासी निकट की पहाड़ियों से इकट्ठा की गई घास सहित विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्रियां बेचते हैं। नेरल के दुकानदार भी बिक्रय के लिए घोड़े के चारे भेजते हैं।
“15 साल पहले, माथेरान और भी सुंदर था,” कसुंडे कहते हैं। “उन दिनों, हमारे घोड़े एक चक्कर से 100 रूपये कमाते थे, लेकिन यह बेहतर था।”
माथेरान के होटलों से बाहर निकलने (चेक-आउट) का समय सुबह 9 बजे से लेकर दोपहर तक है। यह घोड़े के रखवालों के साथ-साथ सिर पर बोझ ढोने वाले कुलियों तथा रिक्शा खींचने वालों की समय-सीमा को भी एक तरह से निर्धारित करता है। चेक-आउट के समय से पहले ही, वे होटलों के दरवाज़े पर इकट्ठा हो जाते हैं और दस्तूरी लौटने वाले ग्राहकों की प्रतीक्षा करने लगते हैं।