ककड़े ने 3 लाख रूपये का बैंक लोन और 5 लाख रूपये का निजी लोन ले रखा है। “मैं केवल दोनों फ़सलों की बुवाई की लागत (इस एक एकड़ पर) वापस हासिल करना चाहता हूं। हम सभी प्रकृति की कृपा पर आश्रित हैं। पिछले 10 वर्षों में मौसम और अधिक अनिश्चित बना है। मैं आशा करता हूं कि मुझे अक्तूबर में शुरू होने वाले रबी के मौसम से पहले पैसे नहीं मांगने पड़ेंगे।”
ककड़े अपनी कपास की कुछ फ़सल बाक़ी रखेंगे, क्योंकि वह सभी 10 एकड़ पर दूसरी फ़सलें नहीं लगा सकते, इसके लिए उन्हें और अधिक पैसे की ज़रूरत होगी जो कि उनके पास नहीं है। और उन्हें उम्मीद है कि अगस्त के दूसरे सप्ताह में मराठवाड़ा में बारिश के बाद, मानसून दोबारा आयेगा। अगर बारिश होती रही, तो कपास की फ़सल नवंबर तक काटी जा सकेगी, और उससे अच्छा मुनाफ़ा हो सकता है। पहली बुवाई की सूख चुकी खाद्य फ़सलें हालांकि वापिस नहें आएंगी।
अपनी ज़मीन के एक भाग पर, दोबार पेरनी, अर्थात दूसरी बार बुवाई करके, ककड़े नुक़सान से बचने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। मराठवाड़ा के किसान जब मध्य-जून के आसपास ख़रीफ़ की पहली बुवाई करते हैं, तो इन फ़सलों को बढ़ने के लिए लगातार बारिश की ज़रूरत पड़ती है। अगर बारिश कम हुई या नहीं हुई, तो किसानों को मालूम होता है कि उनकी पहली बुवाई से फ़सल ज़्यादा नहीं होने वाली है। न चाहते हुए भी, वह दोबारा पैसा जमा करते हैं और अगस्त के पहले सप्ताह के आसपास दूसरी बुवाई करने की हिम्मत जुटाते हैं, इस उम्मीद में कि कम से कम उन की लागत निकल जाए। अगर दोबार पेरनी के बाद बारिश हुई, तो इस जुवे का फ़ायदा होगा। अगर बारिश नहीं हुई, तो उन पर दोहरी मार पड़ेगी।
ककड़े, जो कि 80 की आयु में चल रहे हैं, इस आयु में अपने खेत पर टहलते हुए कहते हैं कि अनिश्चितता उन पर प्रभाव डालती है। “हमारे परिवार में कुल 16 सदस्य हैं। मेरे तीनों बेटे विवाहित हैं। अतिरिक्त आमदनी के लिए वह कृषि मज़दूरी भी करते हैं (पास के गांवों में)। मेरे पोते खेती में मदद करते हैं और पढ़ाई कर रहे हैं, वे छोटे हैं।”
खुपसा गांव में, जोकि यहां से तीन किलोमीटर दूर है, 49 वर्षीय साहेबराव दसालकर भी ककड़े के पथ पर चल रहे हैं। अपने 12 एकड़ की कपास में से उन्होंने 1.5 एकड़ ख़ाली कर लिया है; वह भी अपनी शेष फ़सल से कुछ वापसी की उम्मीद कर रहे हैं। “मुझे 1.5 एकड़ पर 25,000 रूपये का घाटा हुआ है,” वह बताते हैं। “अब मैंने इस पर गोभी लगाई है। मैंने फ़सल की ज़्यादा ज़मीन को इसलिए नहीं बदला, क्योंकि अगर बाद में बारिश होती भी है तो, एक एकड़ में 2-3 क्विंटल कपास की पैदावार हो सकती है (अच्छे मानसून में, यह 6-8 क्विंटल तक हो सकती है), और मैं इससे कम से कम कुछ पैसे (प्रति क्विंटल लगभग 4,000 रूपये) हासिल कर सकता हूं।