

Chandigarh, Punjab
|SUN, JUL 05, 2020
मज़दूर हूं मैं, मजबूर नहीं
25 मार्च के लॉकडाउन के बाद लाखों प्रवासी मज़दूरों का सामूहिक पलायन कवियों और चित्रकारों की कल्पना को साकार करता है। यह कविता श्रमिकों से निपटने में हमारे कई पाखंडों का खंडन करती है
Author

Labani Jangi
मज़दूर हूं मैं, मजबूर नहीं
मैं भी इंसान हूं
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि मैं ग़रीब हूं
मैंने अपना घर छोड़ा, ताकि आपकी ऊंची इमारतें खड़ी हो सकें
जिस घर में, आज आप बैठे हैं
इन्हीं हाथों से मैंने, उस घर के लिए ईंट-पत्थर उठाए हैं
मैं भी देश की तरक़्क़ी का भागीदार हूं
दिन-रात एक कर दिए मैंने मेहनत करने में
कोई एक चीज़ बताओ जो आपने
मेरी मेहनत के बिना बनते देखी हो
मेट्रो हो, बड़े ऑफ़िस हों, या बड़ी सड़क हो
सब में मेरे पसीने की महक होगी
मैं भी अपने सारे साथियों जैसा आत्मनिर्भर था
ठेले पर सब्ज़ी बेचने वाला
या सड़क किनारे मोमोज़ बेचने वाला भैया
आपके घर में काम करने वाली बाई भी हमारी ही साथी हैं
गरीब हैं, पर आत्मनिर्भर हैं
हम सारे अपनी मेहनत से पेट पालते थे
आज आपने हमारे पेट पे लात नहीं मारी
हमारे आत्म-सम्मान पे तमांचा मारा है
हमें, आप लोगों ने जाने दिया
हमें, आप लोगों ने मरने दिया
सहारा जो देना था, हमें बेसहारा बना दिया
मैं भूक से ना मर जाऊं, इसलिए घर जाने की सोची
आपने कोई प्रबंध नहीं किया
रेल और बसें, सब बंद कर दीं
मैंने ट्रेन की पटरी का सहारा लिया, ताकि घर पहुंच जाऊं
जब मैं थक कर, थोड़ी देर आराम करने के लिए लेटा
तो आपने बंद ट्रेन को मेरी लाशों के ऊपर ही शुरू कर दिया
ऐसा क्यों किया आपने? सिर्फ़ इसलिए कि मैं ग़रीब हूं
आप तो नज़ारा देख ही रहे होंगे
मैं और मेरे साथी, हज़ारों की तादात में सड़कों पर हैं
तरस तो आता ही होगा
दुख तो होता ही होगा
शायद, आंखें भी भर आती होंगी
पर, घबराइएगा नहीं
मज़दूर हूं मैं, मजबूर नहीं
इंसान हूं, भले ग़रीब ही सही
जब सब कुछ ठीक हो जाएगा, तब मैं वापस ज़रूर आऊंगा
अगर मैं वापस नहीं आऊंगा, तो विकास कैसे होगा
ऊंची इमारतें कैसे खड़ी होंगी
मेट्रो से देश, कैसे जल्दी भागेगा
मैं आऊंगा, सड़क बनाऊंगा
पुल बनाऊंगा, मकान बनाऊंगा
इस देश को अपने हाथों से आगे बढाऊंगा
मज़दूर हूं मैं, मुझे आप बस सम्मान दें
मैं भी इंसान हूं, भले ग़रीब ही सही
ऑडियो: सुधनवा देशपांडे, जन नाट्य मंच के एक अभिनेता और निर्देशक तथा लेफ्टवर्ड बुक्स के संपादक हैं।
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