किसी सिनेमा में नायक का प्रवेश भी इससे बेहतर ढंग से नहीं होता. तक़रीबन छह लोग इस काम को अभी तक कोसते हुए यह घोषणा कर चुके हैं कि कटहल का व्यापार किसी औरत के वश का काम नहीं है - चूंकि भारी वज़न के कारण इसे कहीं से लाना या कहीं ले जाना एक मुश्किल काम है - ऐन इसी वक़्त लक्ष्मी दुकान में दाख़िल होती हैं. उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहन रखी है, उनके बाल पके हुए हैं जिनका उन्होंने गोल सा जूड़ा बना रखा है और उनकी नाक और दोनों कानों में सोने के गहने चमक रहे हैं. थोड़े अजीब से लहज़े में एक किसान बतलाता है, “वह इस धंधे की सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी हैं.”
“हमारी फ़सलों की क़ीमतें भी वही तय करती हैं.”
ए. लक्ष्मी (65 वर्ष) पनरुती की अकेली महिला कटहल व्यापारी हैं. बल्कि यह कहना ज़्यादा मुनासिब होगा कि वह कृषि संबंधी किसी भी व्यापार की कुछ गिनी-चुनी पुराने व्यापारियों में एक हैं.
तमिलनाडु के कडलूर ज़िले का पनरुती शहर अपने कटहल के उत्पादन और क़िस्मों के लिए मशहूर है. कटहल के मौसम में यहां सैकड़ों टन कटहल रोज़ लाए और बेचे जाते हैं. हर साल लक्ष्मी ही उन हज़ारों किलो फ़सलों की क़ीमत तय करती है जो शहर की कटहल-मंडी की 22 दुकानों में बेची जाती हैं. बदले में उन्हें ख़रीदने वाले व्यापारी से प्रति 1,000 रुपए पर 50 रुपए की दर से कमीशन के रूप में मामूली कमाई होती है. इच्छा होने पर किसान उन्हें कुछ पैसे दे अलग से भी दे सकते हैं, लेकिन यह पूरी तरह से उन व्यापारियों की मर्ज़ी पर निर्भर है. लक्ष्मी के ख़ुद के आकलन के अनुसार कटहल की पैदावार के मौसम में उनकी रोज़ की कमाई 1,000 से 2,000 रुपए के बीच होती है.
इतने पैसे कमाने के लिए उनको रोज़ 12 घंटे काम करना होता है. वह रात को 1 बजे बजे ही जाग जाती हैं. लक्ष्मी अपने जल्दी जागने की वजह बताती हुई कहती हैं, “सरक्कु (माल) ज़्यादा होता है, तो व्यापारी मुझे लेने के लिए घर पहुंच जाते हैं.” वह ऑटोरिक्शा पर बैठकर बमुश्किल 3 बजे तक मंडी पहुंच जाती हैं. उनका काम दोपहर 1 बजे के बाद ही ख़त्म होता है. उसके बाद ही वह अपने घर लौट पाती हैं और कुछ खाने-पीने के बाद थोड़ा आराम करती हैं. कुछेक घंटों के बाद उन्हें दोबारा बाज़ार के लिए निकलना होता है...
“मैं कटहल की पैदावार के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानती हूं,” वह मुझसे बताती हैं. घंटों बातचीत करने और चिल्लाने के कारण उनकी आवाज़ कुछ हद तक कर्कश हो गई है. वह अपनी स्वाभाविक विनम्रता के साथ कहती हैं, “लेकिन मुझे इन्हें बेचने के तौर-तरीक़ों के बारे में मुझे थोड़ा-बहुत पता है.” आख़िरकार इस व्यापार में वह पिछले तीन दशकों से हैं, और उससे पहले कोई 20 सालों तक उन्होंने रेलगाड़ियों में घूम-घूम कर कटहल बेचने का भी काम किया है.















