यह अक्टूबर के मध्य में रविवार की एक सुबह का वक़्त है, और सर्दियों की ठंड शुरू होनी बाक़ी है. हम जंगल के एक अलग-थलग हिस्से में हैं, जहां अधिकारियों ने एक अस्थायी टेंट लगाया है, जिसे वे पश्चिमी विदर्भ के यवतमाल ज़िले में स्थित लोणी और सराटी गांवों के बीच इस ऑपरेशन का बेस कैंप कह रहे हैं. यह क्षेत्र, कपास के किसानों की लगातार आत्महत्याओं के कारण जाना जाता है.
यह रालेगांव तहसील है, जो राष्ट्रीय राजमार्ग 43 के उत्तर में है और वडकी और उमरी गांवों के बीच स्थित है. यहां मुख्य रूप से गोंड आदिवासी रहते हैं, जिनमें से ज़्यादातर छोटे और ग़रीब किसान हैं, जो कपास और मसूर की खेती करते हैं.
बाघ का पता लगाने वाली टीम में 200 वन्य कर्मचारी हैं - गार्ड, महाराष्ट्र वन विभाग के वन्यजीव विभाग के रेंज फ़ॉरेस्ट अधिकारी, राज्य का वन विकास निगम, ज़िल के वन अधिकारी, मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) और वन्यजीव विभाग के सबसे शीर्ष अधिकारी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ़, वन्यजीव) शामिल हैं. ये सभी मिलकर काम कर रहे हैं, चौबीसों घंटे मैदान में तैनात हैं, इस जंगली बिल्ली और उसके दो शावकों को ढूंढ रहे हैं.
इसके अलावा, समूह में हैदराबाद के तेज़तर्रार निशानेबाज़ों का एक विशेष दल शामिल है, जिसका नेतृत्व नवाब शफ़ात अली ख़ान कर रहे हैं, जो एक अभिजात परिवार के 60 वर्षीय प्रशिक्षित शिकारी हैं. नवाब की उपस्थिति ने अधिकारियों और स्थानीय संरक्षणकर्ताओं को बांट दिया है, जो उनकी भूमिका से बहुत ज़्यादा ख़ुश नहीं हैं. लेकिन वह आवारा जंगली जानवर को शांत करने [नशे वाला इंजेक्शन देकर पकड़ने] या मारने के लिए, भारत भर के वन्यजीव अधिकारियों के लिए एक महत्तवपूर्ण व्यक्ति हैं.
उनकी टीम के सदस्य सैय्यद मोइनुद्दीन ख़ान कहते हैं, “उन्होंने ऐसा कई बार किया है.” कुछ समय पहले, उन्होंने एक बाघिन को शांत करके पकड़ा था, जिसने भारत के 50 नामित बाघ अभ्यारण्यों में से एक, ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान के निकट दो लोगों को मार डाला था.
उन्होंने बिहार और झारखंड में छह महीने में 15 लोगों को मौत के घाट उतारने वाले एक “दुष्ट” हाथी को पकड़ा था, और एक तेंदुए को गोली मारी थी जिसने पश्चिमी महाराष्ट्र में सात लोगों की हत्या कर दी थी.
हालांकि, चश्मा पहने हुए और डार्ट्स फ़ायर करने वाली हरे रंग की राइफल को घुमाते हुए मृदुभाषी निशानेबाज़ नवाब कहते हैं कि यह केस अलग है.
रविवार की सुबह अपने बेटे और वर्दीधारी सहायकों की एक टीम के साथ बेस कैंप पहुंचे शफ़ात अली कहते हैं, “बाघिन अपने शावकों के साथ है. हमें पहले उसे शांत करना होगा और फिर उसके दोनों शावकों को भी पकड़ना होगा.”
इस ऑपरेशन में अपने पिता की मदद कर रहे असगर कहते हैं, “कहना आसान होता है, करना मुश्किल.” बाघिन को स्पष्ट देख पाना बहुत मुश्किल है, जिससे यह काम लंबा खिंच रहा है.
स्पेशल टाइगर फ़ोर्स का एक व्यक्ति बताता है कि वह तेज़ी से अपना स्थान बदल रही है और कहीं भी आठ घंटे से ज़्यादा नहीं रुकती. उसे यहां से लगभग 250 किलोमीटर दूर स्थित नागपुर के पेंच टाइगर रिज़र्व से इस ऑपरेशन के लिए एक महीना पहले बुलाया गया था.
ऐसा लग रहा है कि टीम के कुछ लोग निराश होने लगे हैं. धैर्य ही सफलता की कुंजी है, लेकिन वे इसे खोते जा रहे हैं.