यह महिला खाना पकाने का काम पहले ही कर चुकी है। इसका संबंध तमिलनाडु के उस परिवार से है, जो जीवनयापन के लिए ताड़ के गुड़ बनाता और बेचता है। इस बड़े बर्तन में वह उसी को पका रही है। उसके द्वारा एक छोटी सी गलती इस परिवार की अगले कुछ दिनों की आय छीन सकती है।

इस काम को करने में महिला को थोड़ा समय लगेगा। इतना ही समय खाना पकाने में भी लगा था। उसे दिन भर कोई न कोई काम करते समय, कई घंटे धुएं में सांस लेते हुए गुज़ारने पड़ते हैं। और, एक महिला के रूप में उसे आवंटित किए गए अन्य सभी कामों में, यह काम शीर्ष पर है। चूंकि यह काम उसके ऊपर छोटी उम्र से ही थोप दिया गया है, इसलिए वह – और उस जैसी लाखों दूसरी लड़कियां – जल्द ही स्कूल छोड़ देती हैं।

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घर से जुड़े बहुत से काम हैं। आंध्र प्रदेश के विज़ियानगरम में वह जवान महिला, जो अपने सिर पर टोकरी लेकर जा रही है, उसे खाना पकाना अभी बाक़ी है। उसने खेतों में घंटों गुज़ारने के बाद, खाना पकाने तथा अन्य कार्यों के लिए ईंधन एकत्र किया है। उसी गांव की उसकी पड़ोसन ने खाना बनाना पहले ही शुरू कर दिया है – वह एक खुली जगह पर यह काम कर रही है।

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यह पड़ोसन अपेक्षाकृत भाग्यशाली है। कई महिलाएं छोटी, खिड़की रहित जगहों में पकाती हैं। और खाना पकाने वाले ईंधन से निकलने वाला धुआं, जिसका वे सामना करती हैं, उस धुएं से ज़्यादा ख़तरनाक होता है, जिसका सामना प्रदूषित कारखानों में काम करने वाले औद्योगिक मज़दूर करते हैं।

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उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर में यह महिला कूटने का जो काम कर रही है, उसमें कहीं ज़्यादा ताक़त और तनाव की आवश्यक्ता पड़ती है, जो कि पहली बार में आसान लग सकता है। यह भोजन की तैयारी या प्रसंस्करण के विभिन्न कार्यों में से एक है, जिसे वह कर रही है। खाद्य प्रसंस्करण का काम अधिकतर महिलाएं ही करती हैं। इतने सारे काम और बच्चों को पालने के अलावा, उन्हें मवेशियों की भी देखभाल करनी पड़ती है।

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अन्य कामों में शामिल है कपड़े धोना, पिसाई करना, सब्ज़ियां काटना, बर्तन साफ़ करना, और अलग-अलग समय में परिवार के विभिन्न सदस्यों को खाना खिलाना। बीमार रिश्तेदारों की देखभाल हमेशा उन्हीं की ज़िम्मेदारी होती है। इन सभी कार्यों को ‘महिलाओं के काम’ के रूप में देखा जाता है – और कभी पैसे नहीं दिए जाते। इस तरह से, ग्रामीण महिलाएं शहरी महिलाओं से अलग नहीं हैं। लेकिन पानी और ईंधन के लिए लंबी दूरी तय करना और खेतों में विभिन्न प्रकार के काम ग्रामीण महिलाओं के बोझ को बढ़ाते हैं।

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जैसा कि पलामू, झारखंड की आदिवासी महिला पकाने के लिए गेटी कंद साफ़ कर रही है। सूखा पड़ने के समय इन्हें प्राप्त करना आसान नहीं है। इसे एकत्र करने के लिए उसने अपनी अधिकांश सुबहें जंगल में गुज़ारी हैं। पानी लाने में वह पहले ही अपना बहुत सारा समय ख़र्च कर चुकी है, लेकिन थोड़ा और लाने के लिए उसे शायद एक और चक्कर लगाना पड़ेगा। इन कामों को करने के दौरान, उसे अपने गांव के चारों ओर स्थित बालुमठ जंगल में जंगली जानवरों के रास्ते से भी गुज़रना पड़ा होगा।

महिलाएं सबसे अंत में और सबसे कम खाती हैं, और आराम भी बहुत कम करती हैं। इसीलिए ऊर्जा की खपत वाली इस दिनचर्या से उनका स्वास्थ्य पूरी तरह बिगड़ जाता है।

हिंदी अनुवाद: डॉ. मोहम्मद क़मर तबरेज़

डॉ. मोहम्मद क़मर तबरेज़ दिल्ली में स्थित पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय सहारा, चौथी दुनिया और अवधनामा जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं और इस समय उर्दू दैनिक रोज़नामा मेरा वतन के न्यूज़ एडीटर हैं। उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई के साथ भी काम किया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने वाले तबरेज़ अब तक दो किताबें और सैंकड़ों लेख लिखने के अलावा कई पुस्तकों के अंग्रेज़ी से हिंदी और उर्दू में अनुवाद कर चुके हैं। You can contact the translator here:

पी. साईनाथ People's Archive of Rural India के फाउंडर-एडिटर हैं। वह दशकों से ग्रामीण भारत के पत्रकार रहे हैं और वह 'Everybody Loves a Good Drought' के लेखक भी हैं।

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