इन बांसों की लंबाई उन महिलाओं से लगभग तीन गुना ज़्यादा है जो इन्हें यहां तक लाई हैं। गोड्डा, झारखंड के इस साप्ताहिक बाज़ार में, प्रत्येक महिला एक या एक से ज़्यादा बांस लेकर आई है। यहां तक पहुंचने के लिए, कुछ महिलाओं को बांस अपने सिर या कंधे पर रखके 12 किलोमीटर चलना पड़ा है। ज़ाहिर है, ऐसा करने से पहले, उन्होंने जंगल से बांस काटने में घंटों बिताए।

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इतनी मेहनत के बाद, वे भाग्यशाली होंगी यदि उन्होंने दिन के अंत तक 20 रुपये (40 सेंट) कमा लिए। कुछ महिलाएं गोड्डा के ही एक दूसरे हाट की ओर जा रही हैं, जहां उन्हें इससे भी कम पैसा मिलेगा। जो महिलाएं अपने सिर पर पत्तियों का ऊंचा ढेर लेकर आ रही हैं, उन्होंने इन पत्तियों को इकट्ठा भी किया है और आपस में इनकी सिलाई भी की है। इन पत्तियों से खाने के बाद फेंक दिए जाने वाले बेहतरीन ‘प्लेट’ बनाए जाते हैं। चाय की दुकानें, होटल और कैंटीन इन्हें सैकड़ों की संख्या में ख़रीदेंगे। हो सकता है कि ये महिलाएं 15-20 रुपये (30-40 सेंट) कमा लें। अगली बार जब आप किसी रेलवे स्टेशन पर इन प्लेटों में खाएंगे, तो आपको पता लग जाएगा कि वे वहां तक कैसे पहुंचे।

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सभी महिलाओं को लंबी दूरी तय करनी है और घर की बहुत सी ज़िम्मेदारियां निभानी हैं। बाज़ार के दिन दबाव कुछ ज़्यादा ही रहता है। यह हाट साप्ताह में केवल एक दिन ही लगता है। इसलिए छोटे उत्पादक या विक्रेता आज जो कुछ भी कमाएंगे, उससे अगले सात दिनों तक उनका परिवार चलना चाहिए। उन्हें अन्य दबाव का भी सामना करना पड़ता है। अक्सर, गांव के किनारे, उनका सामना ऐसे साहूकारों से होता है, जो मामूली पैसे में उनसे उनकी उपज ले लेने की कोशिश करते हैं और धमकाते हैं। कुछ तो उनके चक्कर में फंस भी जाते हैं।

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अन्य इस क़रार से बंधे हुए हैं कि वे केवल उन्हीं को बेचेंगे, जिनसे उन्होंने पैसे ले रखे हैं। उड़ीसा के रायगढ़ में दुकान के सामने बैठी इस आदिवासी महिला के साथ भी कुछ ऐसा ही मामला लगता है, जो दुकान के मालिक का इंतज़ार कर रही है। हो सकता है कि वह यहां पर कई घंटों से बैठी हो। गांव के बाहरी इलाके में, उसी आदिवासी समूह के और लोग बाज़ार की ओर जा रहे हैं। चूंकि उनमें से अधिकतर व्यापारियों के क़र्ज़दार हैं, इसलिए वे ज़्यादा मोल-भाव भी नहीं कर सकते।

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महिला विक्रेताओं को हर जगह, यौन उत्पीड़न सहित, धमकियों का भी सामना करना पड़ता है। यहां पर, यह सब केवल पुलिस के हाथों ही नहीं होता, बल्कि वन-सुरक्षकर्मियों द्वारा भी किया जाता है।

उड़ीसा के मलकानगिरी में, इन बोंडा महिलाओं के लिए, बाज़ार में आज का दिन निराशाजनक रहा। लेकिन वे फुर्ती से बस की छत पर इस भारी ट्रंक को चढ़ा रही हैं। उनके गांव से निकटतम बस स्टॉप चूंकि दूर है, इसलिए उन्हें बाद में इस ट्रंक को सिर पर रखके घर ले जाना होगा।

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झारखंड के पलामू में हाट की ओर जा रही यह महिला, अपनी बेटी, बांस और दोपहर का मामूली खाना भी साथ लेकर जा रही है। कपड़े से बंधा एक दूसरा बच्चा भी उसके साथ है।

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देश भर में छोटे उत्पादकों या विक्रेताओं के रूप में काम कर रही लाखों महिलाओं द्वारा अर्जित आय, व्य्क्तिगत तौर पर छोटी है, क्योंकि यह मेहनत और ईमानदारी से संबंधित है। लेकिन यह उनके परिवारों के जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण है।

आंध्र प्रदेश के विज़ियानगरम में, एक गांव के बाज़ार में चिकन काट कर बेचती यह लड़की मुश्किल से तेरह साल की है। जैसा कि उसके पड़ोसी इसी बाज़ार में सब्ज़ियां बेच रहे हैं। इसी उम्र के उसके पुरुष रिश्तेदारों के पास स्कूल में होने का बेहतर मौक़ा है। बाज़ार में अपना उत्पाद बेचने के अलावा, इन लड़कियों को घर पर भी बहुत से ‘महिलाओं के काम’ करने पड़ते हैं।

हिंदी अनुवाद: डॉ. मोहम्मद क़मर तबरेज़

डॉ. मोहम्मद क़मर तबरेज़ दिल्ली में स्थित पत्रकार हैं, जो राष्ट्रीय सहारा, चौथी दुनिया और अवधनामा जैसे अख़बारों से जुड़े रहे हैं और इस समय उर्दू दैनिक रोज़नामा मेरा वतन के न्यूज़ एडीटर हैं। उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई के साथ भी काम किया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त करने वाले तबरेज़ अब तक दो किताबें और सैंकड़ों लेख लिखने के अलावा कई पुस्तकों के अंग्रेज़ी से हिंदी और उर्दू में अनुवाद कर चुके हैं। You can contact the translator here:

पी. साईनाथ People's Archive of Rural India के फाउंडर-एडिटर हैं। वह दशकों से ग्रामीण भारत के पत्रकार रहे हैं और वह 'Everybody Loves a Good Drought' के लेखक भी हैं।

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