इस साल मार्च में, महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम लिमिटेड (एमएसआरडीसी) ने पद्माबाई की भूमि का मूल्यांकन किया – 13 लाख रुपये प्रति एकड़ या छह एकड़ के 78 लाख रुपये। यह आकर्षक लग सकता है, लेकिन उनके लिए पैसा मायने नहीं रखता। “मैंने अपनी बेटियों की शादी की [जो अब 25 और 22 साल की हैं], बेटों को पढ़ाया, अपनी सास की देखभाल की, इस घर को फिर से बनाया है – ये सभी खेत पर काम करके हुए हैं,” वह कहती हैं, क्रोध में। “इसने परिवार को एक साथ रखा है। अगर ज़मीन चली गई, तो आगे मैं किस पर भरोसा करूंगी? हमारी ज़मीन ही हमारी पहचान है।”
पद्माबाई का छोटा बेटा 18 साल का है, विज्ञान की पढ़ाई कर रहा है; बड़ा वाला 20 साल का है। दोनों ही परिवार के खेत पर काम करते हैं। “हम सभी जानते हैं कि आज की दुनिया में नौकरी पाना कितना मुश्किल है,” वह कहती हैं। “अगर नौकरी नहीं मिली, तो उन्हें शहर में दिहाड़ी मज़दूर या चौकीदार के रूप में काम करना होगा। यदि आपके पास ज़मीन है, तो असफलता की स्थिति में कुछ तो है जिस पर आप निर्भर हो सकते हैं।”
लगभग 1,250 लोगों की आबादी वाले गांव, हाडस पिंपलगांव में गाजरे का खेत मौजूदा मुंबई-नागपुर राजमार्ग से ज़्यादा दूर नहीं है। लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, देवेंद्र फड़नवीस, नए राजमार्ग को एक परियोजना के रूप में बढ़ावा दे रहे हैं जो राज्य के भाग्य को बदल देगा। उनका दावा है कि आठ-लेन वाला और 120-मीटर चौड़ा तथा 700-किलोमीटर लंबा एक्सप्रेसवे, खेतों से उपज को सीधे बंदरगाहों, हवाई अड्डों और कृषि-प्रसंस्करण केंद्रों तक तेज़ी से पहुंचाने के कारण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। इस परियोजना की लागत 46,000 करोड़ रुपये होगी।