माटी के देवाल से घेरल चाय के एगो छोट आ शांत दोकान. सोझे एगो सादा कागज हाथ से लिख के टांगल बा:


Idukki, Kerala
|MON, MAR 02, 2026
बियाबान जंगल में फरत-फुलात एगो लाइब्रेरी
पी. वी. चिन्नतंबी 73 बरिस के उमिर में केरल के इडुक्की जिला के जंगल आ पहाड़ी सब के बीच चले वाला अपना आप में अनोखा लाइब्रेरी चलावत रहस. ओह लाइब्रेरी में 160 किताब रहे, सभे कालजयी रचना. ई किताब सब गरीब मुथावन आदिवासी लोग बराबर पढ़े खातिर ले जाला आ समय पर लउटा देवेला
Author
Translator
अक्षरा आर्ट्स आ स्पोर्ट्स
लाइब्रेरी
ईरुप्पुकल्लकुड़ी
इडामलकुड़ी

P. Sainath
इडुक्की जिला के अइसन सुनसान जंगल में लाइब्रेरी? देस के सबले साक्षर राज्य केरल के ई इलाका अबहियो बहुत कम पढ़ाई-लिखाई वाला जगह बा. एह बस्ती में मात्र 25 परिवार रहेला. ई राज्य के पहिल चुनाइल आदिवासी ग्राम परिषद बा. एह लोग के अलावे जदि केकरो इहंवा से किताब लेवे के होखी, त ओकरा एह घनघोर जंगल के पैदले पार करके इहंवा आवे पड़ी. का सांचो ऊ लोग आई?
“हां, काहे ना,” 73 बरिस के पी.वी. चिन्नतंबी कहलन. ऊ चाय बेचेलन, स्पोर्ट्स क्लब आ किताबघर के काम संभारेलन. ऊ बतइलन, “लोग सांचो में आवेला.” चाय के उनकर छोट दोकान, जहंवा नमकीन, बिस्कुट, माचिस आ कुछ दोसर जरूरी सामानो सब मिलेला, इडामलकुड़ी के पहाड़ी मोड़ पर बा. ई केरल के एकदम अंतिम छोर पर बसल पंचायत हवे. एहिजा बस मुथावन नाम के आदिवासी समूह के लोग रहेला. उहंवा जाए के मतलब बा, मुनार लगे पड़े वाला पेट्टीमुड़ी नाम के जगह से 18 किमी के पैदल यात्रा. चिन्नतंबी के चाय के दोकान आ लाइब्रेरी तक पहुंचे खातिर एकरो से जादे पैदल चले पड़ेला. ढनढनात, ढिमलात हमनी जब उनका घरे पहुंचनी त उनकर घरवाली काम से बाहर गइल रहस. उनकरो परिवार मुथावन आदिवासी समुदाय से आवेला.
हलकान होखत हम पूछनी, “चिन्नतंबी, हम चाय त पी लेनी. किरानो के सामान देख लेनी. बाकिर राउर किताब सब कहंवा बा?” उनकर चेहरा पर दमकत हंसी खिल गइल. ऊ हमनी के भीतरी एगो छोट जगह ले गइलन. एकदम अन्हार कोना. उहंवा से ऊ दू ठो जूट के बोरा निकलन, अइसन जेकरा में मोटा-मोटी 25 किलो चाउर धइल जा सके. ओह बोरा सब में 160 किताब सब बंद रहे, उनकर कुल जमा पूंजी, उनकर संग्रह. एकरा ऊ सइहार के चटाई पर फइला देलन. इहे रहे उनकर लाइब्रेरी.
हमनी आठ लोग चटाई पर रखल किताब सब के अचरज से पलटे लगनी. हर किताब अपना आप में साहित्य के अनमोल टुकड़ा रहे, सब के सब उम्दा रचना. ओह में राजनीति पर लिखल किताबो रहे. एकरा में ना त कोई सस्ता रोमांच वाला कहानी रहे, ना नाम खातिर बजार में धड़ाधड़ बिके वाला किताब, ना सस्ता प्रेम कथा. एगो किताब तमिल महाकाव्य ‘सिलपट्टीकरम’ के मलयालम अनुवाद रहे. संकलन में वैकम मुहम्मद बशीर, एम.टी.वासुदेवन नायर, कमला दास लोग के भी किताब रहे. एम.मुकुंदन, ललितांबिका अनंतरजनम आउर दोसर किताब भी मिलल. महात्मा गांधी के साहित्य के अलावे नामी उग्र कट्टरपंथी थोपिल भसी के ‘यू मेड मी अ कम्युनिस्ट’ जइसन किताब सब भी उनकर संकलन में रहे.
“बाकिर चिन्नतंबी, लोग का सांचो ई सब पढ़ेला?” हम बाहर आके बइठत पूछनी. मुथावन भी दोसर आदिवासी समुदाय जेका वंचित आ दोसर भारतीय के बनिस्पत पढ़ाई-लिखाई में पीछे रह गइल रहस. एह सवाल के जवाब में ऊ लाइब्रेरी के रजिस्टर निकाल लइलन. एकरा में बहुत करीना से किताब सब के लेन-देन आ हिसाब लिखल रहे. गांव में भले मात्र 25 परिवार होखे, बाकिर सन् 2013 से 37 किताब मंगाकर ले जाएल गइल बा. ई गिनती एह 160 किताब के मोटा-मोटी एक चौथाई होई, जेकरा एगो बेहतर अनुपात कहल जा सकेला. एह लाइब्रेरी के एक बार के सदस्यता खातिर 25 रुपइया देवे के होखेला आउर महीनवारी शुल्क 2 रुपइया बा. कवनो किताब लेवे पर अलग से आउर पइसा ना देवे के होखे. चाय खातिर एको पइसा ना लागे. करियर चाय, बिना चीनी वाला. “लोग पहाड़ से थक के आवेला.” खाली बिस्कुट, नमकीन आ दोसर सामान खातिर पइसा लागेला. कबो-कबो त आवे वाला के मुफ्त में सादा खाना भी मिल जाला.

P. Sainath
किताब ले जाए वाला के नाम, ले जाए के दिन आ लउटावे के तारीख सब रजिस्टर में एकदम साफ-साफ लिखल जाला. इलांगो के ‘सिलापट्टीकरम’ किताब एक बार से जादे ले जाइल गइल बा. पहिलहीं, एह साल ढेरे किताब सब पढ़े खातिर लोग लेके गइल बा. सुनसान जंगल में उम्दा साहित्य फरत-फुलाता. समाज के हाशिया पर धकेल देवल गइल आदिवासी लोग ओकरा चाव से पढ़ता. ई देख के मन बेचैन हो गइल. हमनी में से कई जना आपन शहरी माहौल के पढ़े के खतम हो रहल आदत पर सोचे लागल.
उहंवा गइल हमनी के टोली में से कइएक जना के घर लिखाइए से चलेला. ई लाइब्रेरी हमनी के अहंकार के हवा निकाल देले रहे. हमनी संगे आइल केरल प्रेस अकादमी के पत्रकारिता के तीन नौजवान छात्र में से एक, विष्णु एस किताब सब में से ‘एकदम अलग’ किताब खोज के लइलन. ई हाथ से लिखल नोटबुक रहे. एकर कोई नाम ना रहे, बाकिर ई चिन्नतंबी के आत्मकथा रहे. ऊ तनी झेंपत कहलन कि ऊ अबही बहुत ना लिख पइलन ह. बाकिर ऊ एकरा पर काम कर रहल बाड़न. “अरे, चिन्नतंबी... एकरा में से कुछो पढ़ के सुनाईं.” रचना जादे लमहर ना रहे, आउर अधूरा भी रहे. बाकिर बात सब बड़ा साफ-सुथरा तरीका से कहल गइल रहे. ई उनकर सुरुआती दिन के सामाजिक आ राजनीतिक चेतना के प्रमाण रहे. एकर सुरुआत महात्मा गांधी के हत्या के प्रसंग से भइल रहे. तब लेखक मात्र सात बरिस के रहस. एह घटना के असर उनका पर कइसन पड़ल, उनकर लेखनी से बयान होखत रहे.
चिन्नतंबी बतावेलन कि इडामलकुड़ी लउट के लाइब्रेरी सुरु करे के प्रेरणा उनका मुरली ‘माश’ (मास्टर, चाहे गुरु जी) से मिलल. मुरली ‘माश’ एह इलाका के एगो नामी आ आदरणीय शिक्षक मानल जालन. ऊ अपने भी आदिवासी बाड़न, बाकिर दोसर जनजाति से बाड़न. ई जनजाति एह पंचायत से बाहर मंकुलम में बसल बा. ऊ आपन जिनगी के बड़ हिस्सा मुथावन समाज खातिर काम करे में लगा देले बाड़न. ऊ कहेलन, “माशे हमरा एह रस्ता पर लगा देलन.” आपन सरलता चलते ऊ ई काम के बड़ा ना मानस, बाकिर चिन्नतंबी बड़ा काम कर रहल बाड़न.
इडामलकुड़ी वइसन गांव में से बा, जेकरा में 2,500 से कम लोग रहेला. समूचा दुनिया में मुथावल लोग के आबादी मोटा-मोटी एतने बा. ईरुप्पुकल्लकुड़ी में मात्र 100 लोग ही रहेला. इडामलकुड़ी 100 वर्ग किमी से जादे जंगल में फइलल बा. इहंवा राज्य के सबले कम मतदाता, गिनती के पनरह सौ, रहेला. लउटत घरिया हमनी तय रस्ता से ना जा सकनी. जंगली हाथी के झुंड तमिलनाडु के वलपरई तक जाए वाले एह ‘शॉर्ट-कट’ रस्ता कब्जिया लेले रहे.
देखीं, एतना झंझट के बीच चिन्नतंबी इहंई डटल बाड़न, दुनिया के संभवत: सबले सुनसान लाइब्रेरी में से एक, के अकेले चलावत. गरीब पाठक लोग के पढ़े के, जाने के भूख मिटावत. संगे-संगे चाय, नमकीन आ माचिस थमावत. आमतौर पर खूब बोले-बतियावे वाला हमनी के टोली में चुप्पी छाइल रहे. एह भेंट के बाद हमनी तनी संजीदा हो गइल रहीं. नजर लमहर आ फिसले वाला रस्ता पर त रहे, बाकिर मन उहंई पी.वी. चिन्नतंबी के बेजोड़ लाइब्रेरी में छूट गइल रहे.
ई लेख मूल रूप से इंहवा पढ़ल जा सकेला: https://psainath.org/the-wilderness-library/
अनुवाद: स्वर्ण कांता
Want to republish this article? Please write to [email protected] with a cc to [email protected]
Donate to PARI
All donors will be entitled to tax exemptions under Section-80G of the Income Tax Act. Please double check your email address before submitting.
PARI - People's Archive of Rural India
ruralindiaonline.org
https://ruralindiaonline.org/articles/the-wilderness-library-bho

