सम्पादक के नोट: इ ‘लेट देम ईट राईस’ कड़ी के पहिलका कहानी ह. पारी इ कड़ी में दू साल में 21 मल्टीमीडिया रिपोर्ट परकासित करी, जौन किसान कुल के जिनगी के ओ लोग के फसल से दुनिया के देखाई. अपर्णा कार्तिकेयन के इ कड़ी के अजीज प्रेम जी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से मिलल ग्रांट के सहयोग बा.


Thoothukkudi, Tamil Nadu
|SAT, JAN 24, 2026
तूतूकुड़ी: नीमक खेत के मजूर ‘मलकिनी’
तमिलनाडु के तूतुकुड़ी जिला में हर साल छव महीना ले नून के खेत में कार करेवाला मजूर करकरउआ घाम में कार करेलें कुल. खराब स्थिति औरी बहुते कम मजूरी में कार करेलें
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जइसहीं तुतुकुड़ी के घट्टा सुन्नर सोहनौला पीयर रंग के सुरुज से रंगाला- रानी पहिलही से अपना कार के जघ़े प रहेली. इहो लकड़ी के चप्पू से रसोई के सबसे सस्ता बाकिर सबसे जरुरी चीज गोटा करेली- नून!
जौन चौकोन जमीन के खखोरत त कब्बो दलदली जमीन प चलत उ कार करतारी, जौना में उ उज्जर शीशा के टुक्का के एक ओर धरतारी. हर बेर उनकर इ चलल छोट बाकिर जीउ हरा देवे वाला बा. जहां उ इ सब गोट्टा करतारी, उ टुक्का के ढेरी उंच भईल जाता औरी उनकर कार ओतने भारी भईल जाता. काहे से कि हर बेर इ 60 बरीस के मेहरारू 10 किलो से बेसी गील नून खींच के ढेरी में मिलावतारी. जौन उनका अपना भार के एक चउथाई से तनियक्के कम बा.
औरी उ बिना सुस्तईले तब ले कार करेली जब ले 120 गुना 40 फुट के प्लौट सबेरे के घट्टा औरी ओकर चलत परछाई पानी में लउके वाला ना हो जाला. इ नूनछार दुनिया 52 साल से उनकर कार करे के जघे ह. उनकरा से पहिले उनकर बाबू के रहे औरी अब उनकर बेटा के ह. ईंहे एस. रानी हमरा के आपन औरी दख्खिनी तामिलनाडू के तूतूकुड़ी जिला के 25,000 एकड़ में पसरल नून के खेत के कहानी कहली.
मार्च से अक्तूबर ले इ तट वाला जिला नून बनावे खातिर एकदम सही हवे. काहे से कि ओ बेरा इंहां गरम औरी सूखल रहेला. जौना से छव महीना ले बनावे के गारंटी रहेला. इ तमिलनाडु के सबसे बडका उत्पादक हवे. औरी इ राज्य अपने 2. मिलियन टन चाहे भारत के नून के लमसम 11 परतिसत हिस्सा उपज करेला. सबसे बडका हिस्सा गुजरात से आवेला. जहां 16 मिलियन टन से बेसी नून होखेला. जौन देस के सालाना औसत 22 मिलियन टन नून के 76 परतिसत ह. इ राष्ट्रीय आंकड़ा अपने 1947 में देस में भईल 1.9 मिलियन टन से बहुत बड़का उछाल बा.
इ सितम्बर 2021 के बीच के समय ह. औरी तूतूकुड़ी के राजा पांडि नगर के लगे नून के खेत में पारी के इ पहिला भेंट ह. रानी औरी उनकरा साथे कार करे वाला सहयोगी सांझ के हमनी से भेट कयिली. एगो नीम के गाछ के नीचे कुर्सी के गोल घेर बना के बैठल बाड़ी. ओ लोग के घर हमनी के पीछे बा. जौना में कुछ ईंट के दीवार, कुछ मड़ई जौनन के छानी गिरता. ‘सौल्टर्न्स’ चाहे उ इलाका जहां नून बनेला, सड़क के ठीक ओह पार बा. जौन कई पीढी के ओ लोग के कार करे के ठीहा ह. जइसहीं बातचीत सुरु भईल, अंजोर कम होखे लागल. औरी इ बातचीत एगो क्लास बन गईल. सोडियम क्लोराइड , जौन नून के केमिकल नाम ह, बनावे के परकिरिया प एगो खूब तेज सिच्छा हो गईल.

M. Palani Kumar

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तुतुकुड़ी में इ ‘फसल’ जमीन के नीचे से निकालल जाला. जौना में नून के मातरा बेसी होला. औरी इ दरियावो के पानी से बेसी नूनछार होला. एकरा के बोरवेल से पंप क के ऊपर निकालल जाला. 85 एकड़ नून के खेती में, जहां रानी औरी उनकर संघाती लोग कार करेला, सात गो बोरवेल से खेत में चार इंच पानी भर दहल जाला. (हर एकड़ के मोटा-मोटी नौ हिस्सा में बाँट दहल जाला औरी ओमे लमसम चार लाख लीटर पानी आवेला. इ ओतने बा जेतना 40 बड़का, 10,000 लीटर वाला पानी के टैंकर में आ सकेला.)
बी. एंथोनी सैमी से बेहतर उप्पलम (नून के खेत) के लेआउट के बहुत कम्मे लोग बूझ चाहे समझा सकेला. उ 56 साल से नून के खेत के मजूर हवन. उनकर कार अलगे-अलगे खेत में पानी के माप देखे, बनावे के होला. सैमी इ खेतन के आन पथिस (मरदाना खेत) औरी पेन पथिस (मेहरारू खेत) में बांटेलन. आन पथिस उल्लूक (उथलल) खेत होला नून के. जहां पानी अपने आपे सूख जाला. औरी दूसर पेन पथिस (मेहरारू खेत) जहां नून बनेला, जौन नून के ढेला के काम करेला.
उ सब कहेला, “नूनछार पानी के ऊपर पंप कईल जाला औरी सबसे पहिले इवोपोरेटर भरल जाला” फेर उ पूरा तरे से मशीनी हो जाला.
नूनछार पानी के हाइड्रोमीटर से नापल जाला. इ एगो अइसन मशीन ह जौन तरल के बराबर महीनी से भार के नापेला. डिस्टिल वाटर के ‘बौमे डिग्री’ जीरो होला. दरियाव के पानी खातिर इ 2 से 3 बौमे डिग्री होला. बोरवेल के पानी 5 से 10 डिग्री के बीच में हो सकेला. 24 डिग्री पर नून बनेला. सैमी कहेलन, “जइसे-जइसे पानी भाप बन के उड़ेला औरी नूनछार बढ़ेला, एकरा के क्रिस्टलेजर में भेजल जाला.”

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अगिला दू हफ्ता ले, ईंहां के मेहरारू लोग एगो लोहा के भारी बम्मा के घिसिया के ले आवेला. ओकरा के उ लोग रोज बिहाने पानी में नचावत चलावेला. एक दिन खड़ा औरी दुसरका दिने बेड़िया चलावेला कि नून के ढेला मैदान के तल्ली में ना जमे. 15 दिन बाद मरदाना-मेहरारू लोग मिल के लकड़ी के चप्पू सेमें नून काढ़ेला. दुनु मैदान के बीच के जगह मने डंड़ेर प जमा करत जाला.
ओकरा बाद सबसे भारी-भरकम कार सुरु होला. मरद आ मेहरारू दुनू जाना नून के ढेरी के ढो के ले जाला औरी एगो उंच जगह प गिरावत जाला. हर मजूर के अइसन कुछ मेड़ खाली करे के दियाला. जहां से ऊ लोग लमसम हर रोज 5 से 7 टन नून के अपना मूड़ी प लाद के ले जाला. एकर मतलब ई बा कि ऊ लोग अपना मूड़ी प 35 किलो भार ध के नून के ढेरी वाला जगह से करीब 150 से 250 फीट दूर ले जाला. औरी दिन भर में 150 से बेसी फेरा लगावेला. कई फेरा के बाद उ जगह जल्दिये नून के पहाड़ में बदल जाला. दुपहरिया के अंजोर में नून के कण हीरा जइसन चमकेला. अइसन बुझाला जैसे जमीन प खजाना धयिल बा.
*****
“परेमी लोग के आपस के झगरा, खायका में नून जइसन होला. जे बेसी हो जाय, त नीमन ना होला.”
इ सेंथिल नाथन के तिरुक्कुरल (पवित्र दोहावली) से लहल एगो दोहा के अनुवाद ह. इ तमिल संत कवि के रचल तिरुक्कुरल के 1,330 दोहा में से एगो दोहा ह. जेकरा बारे में अलगे-अलगे इतिहासकार लोग के मानता बा कि उ चउथा शताब्दी ईसा पूर्व औरी पांचवां शताब्दी के बीच के कवनो बेर में जनमल रहलन.
आसान भासा में कहल जाय त तमिल साहित्य में रूपक औरी उपमा के रूप में नून के परयोग, दू हजार साल से भी पहिले से होखे लागल रहे. औरी सायद ओकरो से पहिले ऊंहा नून के खेती होत रहे जौन अब तमिलनाडु के तटरेखा ह.
सेंथिल नाथन दू हजार साल पुराण संगम काल के एगो कविता के अनुवादों कईले रहल. जौना में नून के पइसा के बदला में इस्तेमाल के चर्चा बा. एकरा बादो, इ बात के इस्तेमाल एगो प्रेम कविता में कईल बा.
शार्क के सिकार करत घाही भयिल
हमरा बाप के घाव अब भर गईल बा
औरी ऊ फेर नील समुन्दर में चल गईलन
नून के बदला में चाउर पावे खातिर
हमार माई, नून के मैदान के फेरी करतारी
केतना नीमन होईत, जे हमार केहू संघाती होईत
जे लमहर औरी हरा देवे वाला जात्रा में
हमार साथ दीत खुसी-खुसी
कि दरियाव के संत अरिया ले जाईं औरी ऊ आदमी से कहीं
कि जे हमरा से भेंट करे के चाहत होखस त, ईहे बेरा लवट आवे के ह!

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खिस्सा-कहानी औरी कहाउत में नून के खूब बात होला. रानी हमारा के एगो तमिल कहाउत ‘उप्पिल्ल पान्दम कुप्प्यिले’ के बारे में बतवली. जौना के माने होला कि बिना नून के खयका बहारन जइसन होला. उनका गोल के लोग नून के देवी लक्ष्मी के रूप मानेला. हिन्दू धरम परम्परा में लछमी धन-संपत्ति के देवी मानल जाली. रानी कहेली, “जब केहू नया घर में जाला, हमनी नून, हरदी औरी पानी उनका घर में ध देनी. इ सुभ होला.”
लोकाचार में नून बिस्वास औरी भरोसा के पार्टीक ह. बल्कि, ए. शिव्सुब्रह्मन्यम बतावेलें, तमिल भासा में ‘मजूरी’ खातिर ‘संबलम’ सब्द के प्रयोग होला. जौन दू गो सब्द संबा (जौन धान खातिर बा) औरी ‘उप्पलम’ (जहां से नून काढल जाला) से मिला के बनल बा. उ आपन खूब नामी किताब उप्पिटवरई (तमिल संस्कृति में नून के महत्त औरी ओकर प्रयोग प लिखल एगो प्रबंध ह) में एगो खूब चर्चा वाला तमिल कहाउत ‘उप्पिटवरई उल्ललवुम नेनई’ के बतावेलन. जेकर माने बा कि हमनी अपना नमकदाता के याद राखे के चाहीं. मने जे हमनी के कार देले बा.
मार्क कुर्लान्स्कीं आपन परसिद्ध किताब ‘साल्ट: अ वर्ल्ड हिस्ट्री’ में कहेलन कि “नून अंतर्राष्ट्रीय बजार में सामिल पहिलका सामान रहे. एकर उत्पादन बिस्व के पहिला औद्योगिक इकाई में सामिल बा औरी आखिर इ पहिलका उत्पाद रहे जौना प राज्य के अधिकार भईल.”
रोजमर्रा के खयका में सामिल इ नून भारत के इतिहास के पलट के ध दहलस. जब मह्मत्मा गांधी 1930 में (मार्च अप्रील के महीना में) ब्रिटिस सरकार के बनावल दमनकारी नमक-कानून के अदेखा क के गुरात के दांडी ले पैदल जात्रा कईलन. औरी ऊंहा नून के मैदान में से नून गोट्टा कयिलन. बाद में, अप्रीले महीना में उनकर राजनीतिक साथी सी. राजगोपालाचारी तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली से ले के वेदारान्यम तक चलल इ नमक-सत्याग्रह के अगुअई कयिलन. दांडी यात्रा भारत के स्वतंर्ता संग्राम के इतिहास में एगो महत्त के पन्ना बा.
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“हेतना कड़ा मेहनत के मजूरी एतना कम!”
- एंथनी सैमी, नामक मजूरा
रानी के पहिलका तनखाह एक रोपया पच्चीस पइसा हर दिन रहे. इ 52 साल पहिले के बात ह, जब उ खाली आठ साल के छोट लईकी रहली औरी लमहर घगरी पहिरले नून के मैदान में खटत रहली. एंथनी सैमी आपन पहिलका मजूरी इयाद करेलन, उनका एक रोपया सवा पइसा मिले. जौन कुछ साल में बढ़ के 21 रोपया भयिल. कई साल के मेहनत, लड़ाई के बाद, आज मेहरारू लोग के दिहाड़ी 395 रोपया औरी मरदाना के 405 रोपया बा. औरी जइसन एंथनी कहेलन इ अभियो, ”बहुत कड़ा मेहनत के बदले मिले वाला बहुत कम मजूरी बा.”
अगिला दिने भोरही 6 बजे रानी के बेटा तुतुकड़ी के अलगे तमिल बोली में कह्तरण, “नरम आयिट्टू” मने देर होता. हमनी पहिलहीं मैदान में पहुंच गईल बानी. बाकिर उनका कार में देरी के चिंता होता. दूर से इ मैदान एगो सुन्नर तस्वीर के जइसन लउकता. घट्टा में ला, बैगनी औरी चम्पई रंग छीटाईल बा, खेतन के पानी झिलमिल करता, मद्धिम हवा बहता औरी ईंहां ले कि दूर से कारखान कुली के इमारतों सुन्नर लागता. इ सब मिल के एगो सुन्नर तस्वीर बनावाता. बाकिर खाली आधे घंटा के भीतर हम देख्तानी कि इंहां काम करे वाला मजूरा ला केतना जल्दी इ सुन्नर जगह बदरूप हो जाता.
नून के खेत के बीचे एगो टूटल-फाटल पुरान मचान के नीचे उ सब महिला औरी मरदाना लोग गोटियाला औरी तैयार होला. महिला लोग अपना साड़ी के ऊपर बुस्सर्ट पहिरेली औरी अपना मूडी के उपर सूती कपड़ा से बनल गोल चक्की लगा लेवेली. ओकरा बाद मजदूरा लोग अपना साथे जरुरी सामान बांध लेले. जौना में एल्मुनियम के तसला (सट्टी), बाल्टी औरी पानी के बोतल, खयका (खाना) होला. आपन-आपन खयका खातिर स्टील के एगो बाल्टी (थुक) में ऊ लोग बसिया भात ध के ले जाला. कुमार अपना बंवारी इशारा करत कह्तारन, “हमनी आज उत्तर ओरी जाईल जाई” औरी सब लोग उनकरा पीछे-पीछे चलत जाता, जब ले कि ऊ नून के दू गो घोहा (क्यारी) ले नईखे पहुच जात. आज कुछे घंटा में ओ लोग के इ दुनु घोहा के खलिया देवे के बा.
जल्दिये उ लोग कार प लाग जाता. महिला औरी मरदाना दुनु लोग आपन कपड़ा ठेहुना ले मोड़ लेता. महिला लोग आपन साया मोड़ के आपन साड़ी ठेहुना ले ऊपर उठा लेतारी. मरदाना लोग आपन धोती के ठेहुना से ऊपर बांध लेता. दू फुट गहीर पानी के उ ताड़ के लकड़ी से बनल ‘पुल’ से पार करता. उ लोग आपन बाल्टी से नून निकाल के तसला में दलत जाता. जब तसला भर जाता त ओकरा के उठा के एक दुसरा के मूड़ी प धरत जाता. तब उ अपना माथा प 35 किलो नून के बोझा ले के एगो माहिर नेटुआ जइसन लकड़ी के एगो पातर पुल, जौना के दुनू ओर पानी बा, से बेर-बेर नीचे उतरता. फेर चढ़ता. कुल 6 कदम चल के इ पातर रास्ता से एह पार से ओह पार जाता.
हर बेर आपन फेरा खतम क के, बहुत सावधानी से आपन सट्टी भुईया धरेला लोग. औरी आपन नून के उज्जर बरखा जइसन झार के फेर दुबारा आपन टोकरी ले के आवेला.. औरी बेर.. बेर.. हर केहू 150 बेर, त कब्बो-कब्बो 200 बेर उंहा के फेरा करेला. तब ले, जब ले नून के 10 फीट उंच औरी 15 फीट चाकर एगो पहाड़ ना खड़िया जाए. इ दरियाव औरी सुरुज जइसन प्राकृतिक जर से मिले वाला उपहार ह. जौन रानी औरी उनका साथी लोग के पसीना से अनमोल हो जाला.
मैदान के दुसरा ओर, 53 बरीस के रानी औरी एंथनी सिम अपना काम में लागल बा. उ डंटा से पानी घुमावातारी, औरी उ चप्पू से नून काढतारन. पानी के घुमला से नून के छोट टुक्का आपस में रगडा के बाजता. जौन सुने में नीमन लागता. दिन गरम भईल जाता. परछाहीं गहीर भईल जाता. बाकिर आराम करे चाहे सांसो लेवे खातिर केहू नईखे रुकत. एंथनी से चप्पू ले के, हम नून निकाल के ऊंच जघे प धरे के परयास करतानी बाकिर इ बहुत मस्किल कार बा. खाली पांच बेर चापू चलावला से हमार पंखुरा दुखाये लागल. हमार पीठ में दरद हो गईल. औरी हमार आंख पसीना से जरे लागल.

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बिना कुछु कहले एंथनी हमरा से चप्पू ले के नून के आर खालियावे लगलन. हम फेर से रानी के ओर घूम जातानी. उ आपन कार लमसम खतमे क लेले बाड़ी. बेर-बेर पानी में डंडा घुमावे से उनकर देह तना जाता, खींचा जाता. उ टेबल अइसन करत रहतारी जबले सारा उज्जर नून के कन एक ओर गोटिया नईखे जात. औरी खेत भूअर औरी सूखल नईखे लउकत. अब इ कियारी में फेर से पानी डालल जा सकता औरी नून के एगो अउरी फसल तैयार हो सकता.
एक बेर जब रानी आपन चप्पू से नून के उबड़-खाबड़ ढेरी के बराबर क लहली त हमारा के अपना लगे बइठे के बोलवली. हमनी नून के एगो पहाड़ के लगे जा के बईठ गयीनी औरी दूर से एगो मालगाड़ी के जात देखे लगनी.
रानी हवा में अंगूरी के इसारा से हमरा के ट्रेन के पुरनका रास्ता देखावत कहली, “पहिले मालगाड़ी एही खेतन में नून लेवे आवे. उ अपन कुछ डिब्बा के पटरी प छोड़ के चल जाए. औरी बाद में इंजन ओकरा के वापस ले के चल जाए.” उ बैलगाड़ी औरी घोड़ो गाड़ी के बारे में बतवली. औरी ओ सेड ओर इसारा कईली जहां पहिले कब्बो नून के फैक्ट्री चलत रहे. अब ईंहां खाली सुरुज के ताप, नून औरी ढेर काम बांचल बा. इतना कह के उ अपना कमर में से एगो थैली निकालतारी. ओमे दू रोपया के अमृतांजन बाम औरी भिक्स इन्हेलर रहे. उ मुस्कियात कहली कि “एही (औरी आपन डायबिटीज के दवाई) कुल के सहारे हम चलतानी.”
*****
“जे एक्को दिन बरखा होला त, हमनी के एक हफ्ता ले बईठे के परेला.”
-नून के खेत में कार करेवाली महिला मजूर
समय के साथे काम के घंटो बदल गईल बा. पहिले के ढंग से, खाए के एक घंटा छुट्टी साथे भोरे 8 बजे से सांझ के 5 बजे ले कार करे के घंटा अलगे-अलगे बांट दहल बा. जहं कुछ लोग पंच बजे भोर से 11 बजे ले कार करेला. ऊन्हे कुछ लोग रात के 2 बजे से भोरे आठ बजे ले कार करेला. इ दुनू सिफत अइसन बा जवना में कार कईल सबसे बेसी मस्किल बा. काम के घंटा खतम भईला के बादो तनियक कार बांचल रह जाला. ए चलते कुछ मजूर लोग के रुके के परेला
एंथनी सिम कहेलन, “भोरे 10 बजे के बाद ईंहा इतना गरमी में खड़ा भईल मस्किल बा.” उ जलवायु औरी तापमान में फेरबदल के अनियमित चक्कर के बहुत लगे से जनले बुझले बाड़न. न्यूयार्क टाइम्स के जलवायु परिवर्तन पर आधारित एगो पोर्टल के आंकड़ा, औरी उनकर निजी अनुभव के बात इ सब के गवाही देता.

M. Palani Kumar

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जब 1965 में एंथनी के जनम भईल रहे, तब एकरा के तूतीकोरिन के नाम से जानल जाए. तब तूतूकुड़ी में साल भर में 136 दिन अइसन होत रहे जब तापमान 32 डिग्री से उपर चल जाए. अब, अइसन दिन के गिनती 258 हो गईल बा. मने उनकरा जिनगिये में गरम दिन के गिनती 90 फीसद बढ़ गईल बा.
संघही बेमौसम बरसातो बढ़ गईल बा.
सब मजूर एकसुरे कहेला, “जे कवनो दिने बरखा होला, त हमनी लगे हफ्ता भर कौनो कार ना रहेला.” बरखा के पानी नून, खेत के आर, औरी ओकर गाद बहवा के ले जाला. ओ घरी हमनी के बिना कार के खलिए बईठे के परेला.
अपना जगहो प भईल कई गो बदलाव जलवायु औरी मौसम के समस्या के बढ़ा देले बा. छांह वाला कई गो गाछ कात के हटा दहल बा. अब नीला घट्टा के नीचे पसरल भूअर जमीन तस्वीर में त नीमन लागेला बाकिर उंहा खड़ा हो के कार कईल नरक के जइसन बा. झांसी हमरा से कहतारी, “मालिक लोग पहिले हमनी खातिर पानी धरत रहे, अब हमनी के अपना घरही से बोतल ले आवे के परेला.” हम ओ लोग के सौच के ब्वस्था के बारे में पूछनी. त उ सब महिला लोग मजाक में हंसत बतावल कि “हमनी पीछे के खेत में जायेनी. काहे से कि भले इंहां सौचालय बन गईल बा, बाकिर ओमे इस्तेमाल खातिर पानी नईखे.”
इ महिला लोग के अपना घरहूं बहुत मस्किल परेला. जौन कि ओ सब के लईकन के बात ह. रानी बतावेली, जब उ सब छोट रहलन, हमनी अपना साथे ले के जाईं. जहां मचान के नीचे कपड़ा के पालना (तूली) में ओकनी के सुता के कार करे चल जाईं. “बाकिर अब अपना पोता-पोती के घरे प छोड़ के आवे के परता. लोग कहेला कि इ खेत लईकन खातिर ठीक नईखे.” ठीक बात बा. एकर मतलब बा कि लईकन के पड़ोसी चाहे नातेदारी में छोड़ के आईं चाहे घरे अकेले छोड़ दीं. “रउआ आपन लईकन के 3 साल के भईला के बादे बालवाड़ी भेज सकेनी. अइसहूं, उंहां सबेरे 9 बजे के बादे कार सुरु होला, औरी हमनी के बेरा से मेल ना खाला.”
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“देखा, हमारा हाथ के छू के देखा, का इ कवनो आदमी के हाथ जइसन नईखे लउकत?”
-नून के खेत में कार करेवाली महिला मजूर
इ मेहरारू लोग अपना देह के बारे में बहुत सरिया के बतियावे. काहे से कि ऊ लोग इ काम के बहुत बडका कीमत चुकावेला. रानी अपना आंख के बारे बतवली. नून से पाटल उज्जर जमीन प एकसुरे ध्यान से देखला के चलते उनका आंख से पानी गिरत रहेला औरी गड़त रहेला. तेज अंजोर में उनकर आंख चोन्हरिया जाला. उ बतवली, “पहिले इ लोग हमनी के करिया चस्मा देत रहे, बाकिर अब हमनी के बहुत कम पइसा मिलेला.” हर साल चस्मा औरी जूता खातिर 300 रोपया दहल जाला.

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कुछ मेहरारू लोग अपना करिया मोजा के नीचे रबर ट्यूब सी के पहिरेला. बाकिर नून के खेत में केहू अइसन नईखे भेंटात जे चस्मा लगवले होखे.हर केहू हमरा से एके बात कहता, “कौनो चस्मा एक हजार रोपया से कम में ना आवेला. औरी सस्ता चस्मा से कौनो फायदा नईखे उल्टे ओसे हमनी के झंझटे होला.” चालीस के उमिर पार होत ओ सब में से हर केहू के नजर कमजोर हो जाला.
रानी के लगे कुछ मेहरारू लोग आ के बईठ गईल औरी खूब जोर से बोलत सिकायीत करे लागल. कि ओ सब के दम मारे के फुर्सत ना मिलेला, पीये के ठीक से पानीयो नईखे, तवत घाम औरी नूनछार पानी से ओ लोग के चमड़ा बर्बाद हो गईल बा. उ लोग कहल, “देखा, हमरा हाथ के छू के देखा, का इ कवनो आदमी के हाथ जइसन नईखे लउकत?” औरी ओकरा बाद, हमरा के आपन हाथ, गोड़ औरी आपन अंगूरी देखावे लागल. ओ लोग के नोह करिया औरी सिकुड़रल रहे, हाथ में घट्टा परल रहे. ओ सब के चमड़ी रुखर औरी बिना जान के रहे, गोड में चकत्ता फाटल रहे. ओ सब के गोड़ में अइसन घाव रहे जौन ठीके ना होत रहे औरी जब उ लोग नूनछार पानी में उतरे, उ सब घाव में बहुते जलन होखे.
जौन चीज हमनी के खयका के नीमन बनावेला ऊहे ओ लोग देह औरी चमड़ी के खईले जाता.
अब सरीर के भीतरी मस्किल के बात सामने होता. जइसे, बच्चादानी निकलवावल, किडनी, पत्थर, हर्निया. रानी के 29 बरीस के बेटा कुमार, छोट बाकिर कसल देह वाला बाड़न. भारी वजन उठावला से उनका हर्निया हो गईल रहे. जेकरा चलते उनका तीन महीना आराम करे के परल, ओकर अपरेसन करा के. अब उ का करेलन? एकरा जवाब में उ कहेलन, “हम अभियो भारी वजन उठावेनी.” उनका लगे दूसर राह नईखे. सहर में बेसी रोजगार नईखे.
इंहां के कुछ जवान लईका झींगा उत्पादन औरी फूल के फैक्टरी में कार करेला. बाकिर नामक-उत्पादन में लागल मजूरन के उमिर 30 बरीस से बेसी बा. इ लोग कई साल से एहीजा कार करता. अइसे, कुमार के पहिलका सिकायत पइसा के बा. “पैकेजिंग के काम करे वाला, ठेका के काम करे वाला मजूर जइसन होलें कुल. इंहां हमनी के बोनस ले ना मिलेला. एगो मेहरारू के एक किलो नून के 25 पाकिट बनावे प 1. 70 रोपया मिलेला. (मने एक पाकिट प 7 पइसा से कम) एगो महिला के उ 25 पाकिट के सीलबंद करे खातिर 1.70 रोपया मिलेला. एगो दूसर कर्मचारी (बेसी कर के मरद) के उ 25 पाकिट के एगो बोरी बनावे, ओकरा के हाथ से सीए, औरी बढ़िया से जमावे के खातिर 2 रोपया मिलेला. बोरी जेतने बढ़त जाला, मजूर के कार ओतने मस्किल होत जाला. बाकिर मजूरी ओतने रहेला: दू रोपया”

M. Palani Kumar

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वस्कुलर सर्जन औरी तमिलनाडु राज्य योजना आयोग के सदस्य डाक्टर अमलोरपवनाथन जोसेफ कहेलन, “चिकित्सीय रूप से ऊ लोग जौन जूता पहिरेला ओकरा से नमी आ छूट से गोड़ के रच्छा ना हो सकेला. एक, दू दिन कार कईला में कौनो दिक्कत नईखे बाकिर जे ईहे कार जिनगी भर करे के बा त रउआ ख़ास ढंग से बनावल जूता पहिरे के चाहीं, जौना के समय-समय प बदलल जा सके. जे एतना मामूली सुबिधा नईखे मिळत, त रउआ गोड़ के स्वास्थ्य के कवनो गारंटी नयिखे.
नून से बहरे वाला अंजोर जौन आंख के चोन्हरिया देला, ओसे आंखो खराब होला. ओ कहेलन कि “अइसन जगह में चस्मा के बिना कार कईला से आंख जरी” उ नियम से चिकत्सा सिविर में आंख के जांच करावे के राय देलन. “जे 130/90 से बेसी पधेवाला केहू बा त ओकरा के हम नून के खेत में कार करे के ना कहेम.” उनकर कहनाम बा कि अइसन वातावरण में कार करे से मजूर के देहो तनियक नून सोख सकेला. औरी रोज के नून ढोअल मस्किल सैनिक कसरत से कम नईखे. “जे रोज के मेहनत के गिनल जाव त इ बहुत जेड होई.”
इ मजूर इ जगह में चालीस पचास बरीस से कार करतारें. बाकिर इ लोग के कवनो सामाजिक लाभ नईखे. ना त मजूरी के साथे कवनो छुट्टी बा, ना लईकन के सेहत-देखभाल के सुबिधा बा, औरी ना गरभ के बेरिया कौनो मदद मिलेला. नून के खेत में कार करेवाला मजूर के कहनाम बा कि ओ सब के हाल कुली के जइसन बा.
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“नून के 15,000 से बेसी के कार बा.”
-एम. कृष्णमूर्ति, जिला समन्वयक, तूतूकुड़ी, असंगठित श्रमिक संघ
कृष्णमूर्ती बतावेलन, “अमेरिका औरी चीन के बाद भारत नमक उत्पादन में बिस्व के तीसरा स्थान प बा. नून के बिना जिनगी असम्भव बा. बाकिर इ नून के मजूरन के जिनगी अपना फासले जइसन बा- नूनछार.”
कृष्णमूर्ती के अकनला से तूतूकुड़ी जिला में लमसम 50 हजार से बेसी नून के मजूर बा. 7.48 लाख मजूरा में से इ जिला में हर 15 में से एगो आदमी नून के मजूर ह. ओ लोग के लगे फरवरी, सितम्बर के बीच में खाली 6,7 महीना कार होला. केंद्र सरकार के आंकड़ा से पूरा तमिलनाडु राज्य में खाली 21,528 नमक मजदूर बा, जौन कि असल आकंडा से बहुत कम बा. बाकिर एहीजा कृष्णमूर्ति के संगठन (असंगठित श्रमिक संघ) कार करेला. उ मानल गिनती से बहरा कईल मजूरन के लेखा जोखा राखेला.

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नून के मजूर चाहे उ नून के कण खखोरत होखे, चाहे नून के ले आवे, ले जाए के कार करत होखे, हर रोज 5 से 7 टन नून के बोझा ढोयेला. नून के एह बेरा के दाम 1,600 रोपया टन बा. औरी मजूर लोग के कार देखल जाय त एकर कुल कीमत 8,000 रोपया से बेसी बा. बाकिर एक्को दिन बिना मौसम के बरसात हो जाय त, जौन उ लोग जोर दे के कहेला कि ओ सब के कार एक हफ्ता से पूरा दस दिन ले ठप हो जाला.
कृष्णमूर्ती के जौन बात सबसे बेसी परेसान करेला उ 90 के बेरा में ले आवल नीती बा. जौन एह बेर खूब मानल जाता. जेकरा चलते, “बडका औरी निजी कंपनी के बजार में आवे के छूट दहल गईल.” उ बतावेलन, “कई पीढी से इ कड़ा जमीन प नून के खेती करे वाला मजूर महिला औरी दलित बाड़न. 70 से 80 फीसदी मजूर जनजाति से बाते. काहे नाही ओ लोग के नून के खेत पट्टा प दियाला? ऊ सब कइसे खुलहा नीलामी में बड़हन कॉर्पोरेट कंपनी कुल से मुकाबला करी?”
जब कवनो बड़हन कंपनी बैपार में उतरेला त ओकर मलिकई वाली जमीन कुल बढ़त जाला. (दस हजार से कई हजार एकड़ ले) कृष्णमूर्ती के पूरा बिस्वास बा कि जल्दिये इहो उद्योग मसीनी हो जाई. “तब इ 50 हजार नून-मजूरन के का होई?”
हर साल 15 अक्तूबर से (जब उत्तर-पूरब में मानसून के बेरा होला) ले के 15 जनवरी ले इ मजूरन के लगे कौनो कार ना होला. इ तीन महीना बहुत गाढ़ होला. औरी एही तीन महीना में उधारी के पईसा औरी अपना खर्चा में कमती क के घर चलेला. 57 बरीस के एम्. वेलुसामी इ खेत में कार करेलन. उ नून बनावे के बदलत तरीका प बतियावे लें. “हमरा माई-बाप के जमाना में छोटो आठ के आदमी नून के उत्पादन औरी ओकर बिक्री क सकत रहे.”
दू गो नीती हालात के एकदम बदल के ध दहलस. केंद्र सरकार इ सोचलस कि आदमी के खायेवाला नून के आयोडीनिकरण करे के चाहीं. ओकरा कुछ समय बाद उ नून के सब मैदान के पट्टा समझौता में बदल दहलस. ओकरा लगे अइसन करे के ताकत रहे. काहे से कि नून के संबिधान के संघ सूची में राखल बा.

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2011 के गवर्मेंट औफ़ इंडिया रेगुलेशन के मोताबिक, कौनो आदमी तब तक ले साधारण नून के बिक्री ना करी चाहे बिक्री करे खातिर नून के ना कीनी चाहे बेचे खातिर नून के अपना घर, दुआर में ना राखी जब तक ले ओकरा के मानव उपभोग खातिर आयोडीन वाला नईखे बना दहल जात.” एकर मतलब रहे कि साधारण नून खाली फैक्ट्री-उत्पाद हो सकत रहे. (नून के कुछ औरी श्रेणी जैसे कला नमक औरी सेंधा नामक के इ नियम में छूट दहल गईल.) एकर मतलब इ रहे कि नून के पुरनका उत्पादक लोग आपन अधिकार ख़तम क लहल. एकरा के कानूनी चुनौती दहल गईल. औरी सर्वोच्च न्यायालय इ बात के कड़ा बिरोध कइलस. बाकिर तब्बो इ प्रतिबन्ध परभाव में बनल रहल. भोजन में इस्तेमाल होखे वाला साधारण नून के तब ले नईखे बेचल जा सकत, जब ले ओमे आयोडीन ना होखे.
अक्तूबर 2013 में दूसर बदलाव कईल गईल. एगो केन्द्रीय अधिसूचना में कहल गईल, “नामक-उत्पादन खातिर केंद्र सरकार के जमीन निविदा (टेंडर) से पट्टा प दियाई.” एकरा अलावे, कौनो मौजूदा पट्टा समझौता के नया ना कईल जाई. इ समझौता के बेरा ख़तम भईला प नया निविदा ले आवल जाई. औरी इ परक्रिया में “ए बेरा के पट्टा धारक नया आदमी के साथे आ सकेला.” कृष्णमूर्ती कहेलन कि साफ़ बा कि इ नियम बड़का उत्पादक के लाभ देवे वाला ह.
झांसी मन पार के बतावेली कि चालीस साल पहिले उनका माई-बाप के लगे जमीन रहे, जौन उ लोग एगो पत्तेदार से समझौता प लेले रहे. उन्हां उ पुली से इनार के पानी निकाल के (ताड़ के पत्ता से बनल खयिंची के बाल्टी जइसन इस्तेमाल क के) दस घोहा में नून के खेती करत रहे लोग. रोज उनकर माई 40 किलो नून ताड़ के टोकरी में भर के, अपना मूड़ी प ढोअस. औरी पैदले सहर जा के ओकर बिक्री करस. उ बतावेली, “बरफ बनावे के फैक्ट्री उनकर सारा माल 20 से 30 रोपया में कीं ले.” औरी जब उनकर माई ना जा सके त उ झांसी के एगो छोट टोकरी के साथे भेज दे. उनकरा इंहा ले इयाद बा कि एक बेर उ 10 पईसा किलो नून बेचले रहस. “जौना जमीन प हमनी के घोहा रहे उंहा रहे वाला मकान बन गईल. हमरा नईखे पता कि हमनी के हाथ से जमीन कईसे निकल गईल.” इ कहत उ उदास हो गईली. बुझात रहे कि हवे में नून घोर गईला बा जेसे उनकर बोली भारी हो गईल रहे.
नामक मजूर के जिनगी हमेसा गाढे रहे. कई साल ले ओ सब के थरिया में साबूदाना औरी बजरे रहे. (कभिये कभार भात रहल) जेकरा साथे उ लोग कुजाम्बू (मछरी के रसेदार) खाए. औरी इडली, जौन अब रोजे के खयका में बा, खाए. पहिले सालभर में एक बेर दीवाली प बांट रहे. झांसी बतावेली, उ लयिकाईं में एक रात पहिलही इ खुसी में ना सूत पावस कि तेवहार में उनका भोर के नास्ता में इडली मिली.
दीवाली औरी पोंगल दू गो अइसन बड़का तेवहार रहे जौना में ओ लोग के नया कपड़ा मिले. झांसी बतावेली कि “ओकरा से पहिले ले उ लोग, खासकर के लईका लोग फाटल-पुरान कपड़ा पहिरे. जौना के पायेंट में 16 गो छेद रहे. औरी हर छेद के सूई-धागा से सीयल जाए.” इ कहत उ आपन हाथ हवा में अइसन नचवली जैसे सीयत होखस. अपना गोड़ में उ सब ताड़ के पत्ता से बनावल चप्पल पहिरे, जौना उनकर माई-बाप अपना हाथे बनावे औरी सुतरी से बान्ह दे. एसे ओ लोग के ठीक-ठाक सुरक्षा हो जाए. काहे से कि ओ बेरा नून के घोहा में इतना बेसी छार ना रहे. एबेरा नून एगो उद्योग के उत्पाद ह औरी एकर घरेलू उपयोग में ओकर कुल खपत के एगो छोट हिस्सा ह.

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“हम आपन नाम लिख सकेनी, बस के रास्ता के पढ़ सकेनी औरी हं, हम एमजीआर के गीतों गा सकेनी.”
-एस. रानी, नामक मजूर औरी अगुआ
सांझ के कार ख़तम भईला के बाद रानीई हमनी के अपना घरे ले गईली. एगो छोट कोठरी के उनकर घर के दीवार पक्का के बा. एगो कोना में सोफा धयिल बा. ओकरा पीछे सायकिल बा औरी रस्सी पर सब केहू के कपड़ा टांगल बा. चाय पीयत उ अपना बियाह केके बारे में बतावतारी, जौन रजिस्ट्री औफ़िस में भईल रहे. जब ऊ 29 साल के रहली. एगो गांव के मेहरारू के इतना उमिर में बियाह भईल कौनो साधारण बात ना रहे. ऊहो ओ ज़माना में. सायद उनका परिवार के गरीबी एकर कारन रहे. रानी के तीन बेटी (थान्गमल्ल, संगीता औरी कमला) एगो बेटा (कुमार) बाडन, जे उनका साथही रहेला.
उ कहेली, “बियाह त हो गईल, बाकिर हमनी लगे इतना प ईसा ना रहे कि हमनी कौनो जग (उत्सव) करतीं.” फेर उ अपना परिवार के एल्बम देखावे लागली, एगो बेटी के मासिक संस्कार के जग, दूसर बेटी के बियाह, सज धज के नीमन कपड़ा पहीरले उनकर परिवार, उनकर नाचत बेटा कुमार, गावत... इ सब खुसी के कीमत उ नून के खेत में अपना के जोत के देले बाड़ी.
जौना बेरा हमनी हंसत रहनी औरी बतियात रहनी, ओही बेरा रानी हरिहर तार के खइंची के अरिया औरी ओकर मूठ कसत रहली. यू ट्यूब प गूजबेरी पैटर्न (अमला गांठ) से बनावल एगो खइंची के वीडियो देख के कुमार अपना हाथे ऊ खईंची बनवले रहलन. कब्बो-कब्बो उनका लगे इ सब कार खातिर तनियको बेरा ना रहेला. तनियक औरी कमाए खातिर उ नून के दूसर घोहा में दुसरका पारी करे चल जालन. मेहरारुन के दुसरका paari घर के कार में बीतेला. उ इ बात के जोर दे के कहलन कि “ओकरा सायदे कब्बो आराम मिलेला.”
रानी के त कहियो आराम ना मिलल. इंहा ले कि जब ऊ तीन साल के रहली त उनका माई औरी बहिन के साथे सर्कस में कार करे के भेज दियाइल. “ओकर नाम तुतुकोरिन सोलोमन सर्कस रहे. औरी हमार माई ‘हाई व्हील’ (एक पहिया वाला) साइकिल चलावे के उस्ताद रहे. उहें उनकर बहिन बाजीगरी में औरी रानी कलाबाजी करे में माहिर रहली. “हमार बहीन तानल रस्सी प चले, हम कमर से पाछे हो के मुंह से कप उठाईं.” सर्कस के मंडली के साथे ऊ मदुरई, मनप्परई, नागरकोइल, पोलाच्ची जइसन सहरन के जात्रा कईली.
जब रानी आठ साल के रहली, औरी सर्कस मंडली फेर से तुतुकोरिन आवे त उनका के नून के खेत में कार करे भेज दियाए. तब से ले के आज ले रानी के दुनिया नून के घोहा में बा. आते साल के उमीर में स्कूल छूट गईल. “हम 3 कलास ले पढ़ल बानी. हम आपन नाम लिख सकिने, बस के रास्ता पढ़ सकिने, औरी एमजीआर के गीत गा सकिने.” ओह दिन रेडियो प एमजीआर के गीत बजल त ऊहो ओकरा सठे गावे लगली. गीत के बोल हमनी से दुनिया में कुछु नीमन करे के बात करे.

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उनकरा साथे कार करे वाली मेहराऊ कुल उनका के चिढावत कहली कुल कि रानी त नाचहू में माहिर बाड़ी. त रानी लजा जाली. अबे हाले में मेहरारू लोग ला एगो समरोह भईल (जेकर मुख्य अतिथि ऊंहां के संसद कनिमोझी करूणानिधि रहली) उन्हान रानी करगट्टम नचली. रानी मंचो प बोले के सीखातारी. उ अपना कुलु, मने स्वयम सहायता समूह के मेहरारू औरी नामक-मजदूर के नेता के रूप में सरकार के सामने सबकर बात राखे खातिर जतरा करेली. जब उनके साथी मेहरारू कहेली कि “उ हमनी के नून के खेत के रानी हई.” त रानी धीरे से बस मुस्किया देली.
कृष्णमूर्ती के साथे एगो सभा में सामिल होखे 2017 में उ चेन्नई गईल रहली. “हमनी में से बहुत लोग ऊंहा तीन दिन ला गईले रहे. उ एगो मजेदार जतारा रहे! हमनी एगो होटल में रुकल रहनी औरी उंहा से एमजीआर के समाधि देखे गईनी. हमनी नूडल, चिकन, इडली औरी पोंगल खईनी. हमनी जब ले मरीना के आर प पहुंचनी तब ले बहुत रात हो गईल रहे. बाकिर उ जतरा बहुत बढिया औरी यादगार रहे!
ओ सब के घर के खायका बहुत साधारण होला. उ लोग भात के साथे कुजाम्बू बनावेला. कुजाम्बू मछरी के साथे पियाज औरी कौनो छीमी के साथे बनावल जाला. अलगे से खाए खातिर करुवाडू (नमकीन सूखल मछरी) औरी कुछ तरकारी जईसे पत्तागोभी, चाहे चुकंदर खाए खातिर ध दियाला. उ बतावेली, “जब हमनी के लगे पइसा ना होला त हमनी काली कॉफी पियेनी.” बाकिर ऊ सिकायत ना करेली. क्रिस्तान भईला गुने ऊ चर्च जाली औरी भजन गावेली. उनकर मरद एगो दुर्घटना में चल गईलन. ओकरा बाद उ आपन लईकन के साथे रहेली. उनकर लईके उनका साथे नीमन से रहेलें. उ अपना बेटा के नाम बेर-बेर लेली. “हम कौनो बात के सिकायत नईखी कर सकत. (ओन्नुम कुरई सोल्ल मुडीयाद) भगवान हमरा के नीमन लईका देले बाड़न.”
जब उ गरभ से रहली, त लईका होखे ले कार करते रह गईली. जचगी खातिर उ नून के घोहा से पैदले चल के अस्पताल गईली. ठेहुना के लगे आपन जांघ पे थपकी दे के कहली, “हमार पेट ईंहा आराम करे.” जचगी के 13 दिन बाद से ऊ कार प चल अईली. उनकर लईका भूख से ना कलपे, ओकरा खातिर साबूदाना के पातीर घोर बनावत रहली. दू चम्मच आटा के एगो कपड़ा में बांध के, पानी में भिंजा के औरी खउला के ओकरा के ग्राईप वाटर के सीसी में डाल के ओकरा मुंह प रबर के ढक्कन लगा देत रहली. औरी उनकरा दूध पियावे आवे से पहिले ले केहू उनकरा लईका के साथे रहत रहे औरी ओ बोतल से ऊ घोल पियावत रहे.
माह्वारियो ओतने मस्किल रहे. जब उनका गोड़ औरी जांघ में जलन होखे औरी दरद के मारे उनकर झुझुआवन होखे. “सांझ के गरम पानी से नहा के हम अपना जांघ प नारियल के तेल लगायीं. कि अगिला दिने हम कार प जा सकीं.”
इतना साल के अनुभव के बाद रानी नून के देख के चाहे छू के ओकर नीमन, बाउर (खाए में) बता सकेली. नीमन सेंधा नून के दाना एक बराबर होला. औरी आपस में सटेला ना. “जे इ लसलसाह (पिसू-पिसू) होई, त एकर सवाद नीमन ना होई.” बैज्ञानिक ढंग से नामक-उत्पादन में बौम थर्मोमीटर औरी लम्बा-चौड़ा सिंचाई के बेवस्था बनावल जाल. कि नून नीमन औरी सयगर तइयार हो सके. उ हमरा के बतावेली कि इ सब जरुरत के पूरा कईला के बादो इ सारा नून उद्द्योग-धंधा वाला उपयोग खातिर नीमन होला.

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“नून के मैदान कुल के उद्द्योग के रूप में ना बलुक कृषि के रूप में देखे के चाहीं.”
-जी. ग्रहदुराई, अध्यक्ष, तुतुकुड़ी स्मॉल स्केल साल्ट मैन्युफैक्चर्स एसोसियेशन
तूतूकुड़ी के न्यू कॉलोनी में अपना वातानुकूलित दफ्तर (जौन कि नून के मैदान से बेसी दूर नईखे, कहे से कि नून के खेत प उड़त कउअन के उंहा से देखल जा सकता.) में जी. ग्रहदुराई हमरा से जिला में नमक-उद्द्योग के महत्त वाला बातन के चर्चा कईलन. उनका एसोसियेशन में 175 के करीब सदस्य बा. औरी हर सदस्य के लगे दस एकड़ जमीन बा. जिला भर में 25 एकड़ ले पसरल नून के घोहा वाला खेत से लमसम 25 लाख टन के नून उत्पादन होला.
एक एकड़ जमीन से सालाना 100 टन नून के उत्पादन होला.एगो खराब साल में, जब बहुत बेसी बरखा हो जाला त इ उत्पादन घट के 60 टन हो जाला. ग्रहदुराई मजूरी के बढ़त लागत प बात करत कहलन, “नूनछार माटी के अलावे हमनी बिजलियों के जरुरत होला, कि पानी के खींचल जा सके. औरी साथही नून बनावे ला मजूरन के जरुरत होला. मजूरी लगातार बढ़त जाता, औरी अब त काम के घंटो कम हो गईल बा. पहिले आठ घंटा कार होखे, अब खाली चारे घंटा कार होता. ऊ सब सबेरे पांच बजे आवेला औरी नवे बजे चल जाला. इंहा ले कि मालिको जा के देखे त उंहा कवनो मजूर ना लउकेला.” कार के घंटा के ले के ओ सब के हिसाब दूसर बा.
ग्रहदुराई इ मानतारन कि काम करे के परिस्थिति के लिहाज से नून के घोहा में कार कईल बहुत मस्किल बा. “पानी औरी टायलेट के सुबिधा दहल जरुरी बा, बाकिर इ आसन नईखे. काहे से कि नून के घोहा सौ किलोमीटर दूर ले पसरल बा.”
तुतुकुड़ी के बजार अब कम भईल जाता. “पहिले इंहा के नून के के सबसे नीमन खाए वाला नून मानल जात रहे. बाकिर अब एकर खपत खाली दक्खिनी राज्यन में होता. औरी थोर-बहुत एकर निर्यात सिंगापूर मलेशिया में कईल जाला. एमे ज्यादातर हिस्सा के उपयोग उद्द्योग में होला. मानसून के बाद घोहा से निकालल जिप्सम से कुछ मोनाफा हो जाला. अप्रील और मई महीना में भयील बरखा औरी जलवायु परिवर्तन के कारन नमक उत्पादनों तेजी से परभावित हो रहल बा.
एकरा अलावे गुजरात से एकर कड़ा मुकाबिला बा. “तूतूकुड़ी के तुलना में गरम औरी सूखल होखला के चलते देस के कुल नमक उत्पादन के 76 परतिसत हिस्सा अब पच्छिमि राज्य गुजरात के ह. ओ सब के नून के जोत बहुत बडका बा. औरी उत्पादन के काम तनियक मसीनियो बा. एकरा अलावे उंहा बिहार से बहुत ज्यादे मजूर आवेलें कुल. जौन बहुत कम मजूरी में कार करेलन. उनके घोहा के जवार के पानी से भरल जाला, एही से ओ सब के बिजली के खर्चा बांच जाला.”

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तूतूकुड़ी में एक टन नून के उत्पादन के लागत 600 से 700 बा. उ दवा करेलन, “जबकि गुजरात में इ खाली 300 रोपया बा. हमनी ओ सब से कईसे मोकाबिला कर सकेनी? खासकर जब एक टन नून के कीमत अचक्के गिर के 600 रोपाया हो जाला? जइसन 2019 में भईल रहे?” एकर भरपाई खातिर, ग्रहदुराई औरी दूसर लोग चाहता कि नून उत्पादन के “उद्द्योग के जइसन ना बल्कि कृषि के जइसन देखल जाय” (एही कारन नून के ‘फसल’ कहे के बिचार भईल.) नून-उत्पादन करे वाली छोट इकाई के कम ब्याज प कर्जा, सब्सिडी प बिजली औरी कारखान एवं श्रम अधिनियम से छूट के जरुरत बा.
“ए साल, पहिलही गुजरात से आईल जहाज तूतूकुड़ी में आपन नून बेचले बा.”
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“ऊ लोग हमनी के बारे खाली तब्बे लिखेला जब कुछ भयानक घटेला.”
-महिला नमक मजूर
नून-मजूरन के जीउका के सुरक्षा खातिर असंगठित मजदूर संघ के कृष्णमूर्ति आपन कई गो मांग सामने रखेलन. जरूरियात सुबिधा जइसे (पानी, सौचालय औरी बिसराम घर) के अलावे उ मजदूर, मालिक औरी सरकार के अगुआ वाला एगो समिति के मांग करतारन. जेसे देरी वाला मामला सब सझुरावल जा सके.
“हमनी तुरंत एगो लईकन के देखभाल (चाइल्ड केयर) के जरुरत बा. अभी ले जेतना आंगनबाडी बा, उ सब सबेरे 9 बजे से सांझ के 5 बजे ले कार करेला. नून के मजूर भोरे पांच बजे अपना घर से निकल जाला. औरी कुछ इलाका में त औरी पहिले निकले के होला. जे घर में कवनो बड़ लईकी बीया त उ बाक़ी भाई बहीन के देखभाल खातिर रुक जाई. औरी ओकर पढ़ाई खराब होई. का आंगनबाडी कुल के इ लईकन के देखभाल खातिर भोरे 5 बजे से 10 बजे ले कार ना करे के चाहीं?”
कृष्णमूर्ती आपन छोट-छोट सफलता (जईसे मजूरी में तनियक बढ़ोतरी, बोनस) के बारे में बतावेलन कि तब्बे हो पावल जब सब मजूर गोटिया गईल. औरी मिल के आपन लड़ाई लड़ल. तमिलनाडू के नयका डीएमके सरकार उनका एगो पुरान मांग के अपना बजट में सामिल कईले बा, मानसून के बेरा 5,000 रोपया के सहयता राशि. कृष्णमूर्ती औरी सामाजिक कार्यकर्ता उमा महेश्वरी इ बात के सकारता कि असंगठित क्षेत्र के आसानी से संगठित क्षेत्र में नईखे बदल जा सकत. इ ब्यवसाय के आपन सेहत के जोखिम बा. उ पूछता लोग कि “बाकिर का सामाजिक सुरक्षा के कुछ जरूरियात उपाय नईखे दहल जा सकत?” हं, निश्चित रूप से.
आखिरकार जईसन मेहरारू सब कहतारी कि मालिक हमेसा मोनाफा कमाला. झांसी इ नून के घोहा के परतर ताड़ के गाछ से करेली. दुनू कड़ा, सुरूज के करेड़ घाम सहेवाला औरी हमेसा कारगर बा. उ बेर-बेर ‘दूद्दू’ सब्द (पईसा खातिर तमिल सब्द) बोलत कहली कि नून के घोहा हमेसा अपना मालिकन के पईसा देला.
कार सपरा देला के बाद कागज के कप में चाय पीयत इ मेहरारू सब हमरा से कहली, “बाकिर हमनी के ना देला. हमनी के जिनगी के बारे में केहू नईखे जानत. हर जगह रउआ किसानन के बारे में पढ़ेनी. बाकिर मीडिया हमनी से तब्बे बतियावेला जब हमनी बिरोध परदरसन करेनी.” औरी फेर बहुत तीत बोली में पूछली, “ऊ सब हमनी के बारे तब्बे लिखेला जब हमनी के संघे बहुत खराब हो जाला. बताई का रउआ सबनी नून ना खायेनी?”
इ सोध अध्ययन के बेंगलुरू के अजीज प्रेमजी बिस्वबिद्द्यालय के अनुसंधान अनुदान कार्यक्रम 2020 के तहत अनुदान मिलल बा.
अनुवाद: स्मिता वाजपेयी
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