“कुछ बरिस पहले पता चलल कि घरवाली के कैसंर बा. इलाज खातिर उनका असम के सिलचर (120 किमी दूर) ले जावल जाला, अक्सरहा महीना में एक से जादे बार. इलाज में अबले मोटा-मोटी पांच लाख रुपइया खरचा हो चुकल बा. सारा रकम उधारी लेवे के पड़ल. हम करजा में डूबल बानी. आपन कुछ कटहर के गाछो लकड़ी खातिर बेचे पड़ल. अंतिम गाछ से हमरा 4,000 मिलल रहे,” रतीश बतावत बाड़न.
बढ़ई के काम मिलेला, त रतीश दिन के 500 कमा लेवेलन. एक महीना में जादे से जादे उनका 7,000 के कमाई हो पावेला. बाकिर केतना बेरा अइसनो होखेला कि उनका दू-तीन महीना ले काम ना भेंटाए. “तब्बे हम धरमनगर जाके बाजा बेचे के सुरु कइनी. उहे हमनी खातिर आमदनी के एकमात्र जरिया बन सकत रहे. हमरा पास कवनो जमा पूंजी नइखे. बड़का लइका शहर में गहना-जेवर के दोकान पर कमाई करेला आ जेतना संभव हो मदद करेला,” रतीश बतइलन. उनका चार गो बच्चा बा- तीन ठो बेटा आ एक ठो बेटी, जे ज्योत्सना के अस्पताल ले जाए, लावे में मदद करेला. सबले छोट लइकी बाड़ी, रिमिता (17), जे हाईस्कूल में पढ़ेली.
एह लोक कलाकार खातिर संगीते एकमात्र सहारा बा. “हम अपने कवनो गीत, चाहे धुन चुन लीहिला आउर बजावत रहिला. हमरा केहू नइखे सिखइले. जब दोतारा बजाइला, त समय के तनिको ध्यान ना रहे. कबो सोचले ना रहीं कि एकरा से पइसा कमाएम. पांच बरिस पहिले जब बहुते तंगी हो गइल रहे, त केहू सुझाव देलक कि काहे ना दोतारा बना के बेचतार.” अबले ऊ 13 दोतारा बनाके बेच चुकल बाड़न. एक दोतारा खातिर उनका 5,000 रुपइया तक मिल जाला. “एगो बाजा बनावे में 2000 के सामान लाग जाला. बाकिर हम आपन बनावल पहिल दोतारा अबले जोगा के रखले बानी, बेचनी ना. ओकरा से हमरा बड़ा लगाव बा,” अइसन कहत रतीश के चेहरा खिल उठल.
अब उनका ग्राहक मिले लागल बा. “हम संगीत प्रेमी बानी आउर रतीश अपनो बहुत अच्छा बजावेलन. जब हमरा पता चलल कि ऊ दोतारा बनावेलन, त तुरंत उनका से अपना खातिर बनावे के कहनी.” 45 बरिस के विज्ञान मास्टर सुरेंद्र नाथ बतावत बाड़न. ऊ रतीश के पहिल ग्राहक बाड़न. उहे उनका के ई बाजा बनावे के प्रेरित कइले रहस आउर इलाका के एगो क्लब में प्रस्तुति देवे खातिर न्योता देले रहस.