वह अपनी पुरानी हो चुकी व्हीलचेयर को अपने पास खींचते हैं, जो उनके अस्पताल में उनके बिस्तर के सामने रखा है. वह इन दिनों अस्पताल के इसी बिस्तर से जकड़े हुए हैं. उनका बायां हाथ छत की लकड़ी की बल्ली से लटक रहे खुरदरे कपड़े को पकड़ता है. दाहिने हाथ से शरीर को मोड़ते हुए वह खुद को बिस्तर से धीरे-धीरे खिसकाते हुए व्हीलचेयर पर पहुंचते हैं. फिर वह अपने पैरों को नीचे की ओर ले जाते हैं, जहां वे अपने हाथों से अपने पैरों को तब तक संभालते हैं जब तक कि उनके पैर व्हीलचेयर की फुटप्लेट तक नहीं पहुंच जाते. जिस फुर्ती के साथ वह यह सब करते हैं उससे लगता है कि उन्होंने यह काम हजारों बार किया है. ठीक उसी सहजता के साथ जैसे वह कभी बिलिगिरी रंगन पहाड़ियों के जंगलों में ऊंचे पेड़ों पर चढ़ जाया करते थे जब तक कि… उनके साथ वो हादसा नहीं हुआ.


Chamarajanagar, Karnataka
|THU, MAR 19, 2026
कोई न सुनेगा इस सोलिगा आदिवासी का दुख…
कर्नाटक की बिलिगिरी रंगन पहाड़ियों में ऊंचे पेड़ों से शहद इकट्ठा करने वाला एक युवा सोलिगा आदिवासी एक भयानक हादसे के बाद जैसे अपनी ज़िंदगी का गीत खो बैठा है
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M. Palani Kumar
“शाम के करीब छह बजे थे. बारिश हो रही थी. पेड़ की छाल थोड़ी फिसलन भरी थी. तारे मरा पर एक बड़ा छत्ता था. उसे काटने के लिए मैं उसके पास खड़े होन्ने मरा पर चढ़ गया था. ये बहुत बड़े पेड़ होते हैं, बहुत ऊंचे पेड़.” अरुण कुमार जिन पेड़ों की बात कर रहे हैं वे लगभग 130 फुट तक ऊंचे हो सकते हैं.
“मेरे हाथ में धुएं वाली मशाल थी, लेकिन मधुमक्खियां मुझे डंक मार रही थीं और मैं जल्दी नीचे उतरना चाहता था. अचानक मेरा पैर फिसल गया और मैं करीब 25 फुट नीचे जमीन पर पीठ के बल गिर पड़ा.” वह 12 मई 2024 की उस भयावह शाम को याद कर रहे हैं, वह आखिरी दिन जब वह अपने पैरों पर खड़े थे.
अरुण अपने पुराने व्हीलचेयर को अपने हाथों से खींचते हुए आठ बाई दस फुट के टीन के छोटे कमरे के दरवाजे से बाहर निकलते हैं. भीतर अंधेरा है, बस दरवाजे से आती थोड़ी सी रोशनी. यह कमरा उस ईंट और मिट्टी के घर के एक किनारे लगभग छिपा हुआ है जहां उनका बाकी परिवार रहता है. दूसरी तरफ खंभों पर बने कबूतरखाने हैं, जिनमें उनके पिता के पाले कुछ कबूतर रहते हैं.

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अरुण (24) कहते हैं, “मदद करने वाला कोई नहीं है. सुबह मैं खुद ही इस कमरे से बाहर निकलकर धूप में बैठ जाता हूं.” वह अपनी कुर्सी कमरे के पीछे की छोटी खुली जगह की ओर मोड़ते हैं. वहां सिल्वर ओक के पेड़ों की शाखाओं के बीच से धूप अभी-अभी उतर रही है.
आमतौर पर साल के इस समय तक अरुण इन पेड़ों की ऊपरी शाखाएं काटने में परिवार की मदद करते थे, ताकि कॉफी के पौधों तक ठीक मात्रा में धूप पहुंच सके. इस साल परिवार को मजदूर रखने पड़े हैं. मजदूरी महंगी होने के कारण पेड़ वैसे ही बढ़ते जा रहे हैं.
अरुण धीरे-धीरे सर्दियों की धूप में आकर बैठ जाते हैं.
वह कहते हैं, “मौसम के दौरान कुछ कमाने के लिए मैं शहद इकट्ठा करता था. यह काम अप्रैल से जून के बीच सिर्फ पांच-छह हफ्तों तक चलता है. गर्मियों में बाहर कोई काम नहीं मिलता था. घर में भी पैसों की दिक्कत थी. इसलिए हम चार-पांच दोस्तों ने मिलकर थोड़ा कमाने के लिए यह काम शुरू किया.” यह छोटी-छोटी कमाई उनके घरों का खर्च चलाने में मदद करती थी.

Courtesy: Arun
अरुण कहते हैं, “मुझे दोस्तों के साथ घूमना अच्छा लगता था, लेकिन कक्षा में क्या पढ़ाया जा रहा है उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था. मैंने सातवीं कक्षा में ही पढ़ाई छोड़ दी.” वह आगे कहते हैं, “मैंने दूसरे बच्चों को देखकर पेड़ों पर चढ़ना और शहद निकालना सीखा. शुरुआत में डर लगता था, लेकिन धीरे-धीरे आदत हो गई. लोग आमतौर पर ‘जेनु कुइयो हाडु’ गाते हुए पेड़ों की ओर जाते हैं. मैंने वह गीत कभी नहीं सीखा.” सोलिगा समुदाय पारंपरिक रूप से कुशल शहद संग्राहक माना जाता है. लेकिन अरुण के पिता एम. सन्नरंगे गौड़ा, 53, लंबे समय तक यह काम नहीं करते रहे.
गौड़ा, चामराजनगर ज़िले में किसान और समुदाय के सक्रिय कार्यकर्ता हैं. साल 1970 के दशक में सरकार ने सोलिगा आदिवासियों को जंगल के भीतर बनी छोटी बस्तियों यानी पोडु में बसने और झूम खेती छोड़ने के लिए प्रेरित किया. उनका परिवार 1974 से येलंदुर तालुका के मुत्तुगदगड्डू पोडु में मिली दो एकड़ जमीन पर खेती कर रहा है.

Courtesy: Arun
गौड़ा कहते हैं, “हम अवरेकाई (सेम की फली), जोला (ज्वार), तोगरी (तुअर) और रागी जैसी फसलें उगाते थे. लेकिन हाथियों और जंगली सूअरों ने इन फसलों को बर्बाद कर दिया. इसलिए 1990 के दशक में हमने कॉफी की खेती शुरू कर दी.”
स्कूल छोड़ने के बाद अरुण अपने पिता की खेती में हाथ बंटाने लगे. वे पौधे लगाना, शाखाएं काटना, खेत की सफाई करना, निराई करना और कॉफी की फलियां तोड़ने जैसे काम करते थे. साथ ही उन्होंने छोटे-मोटे काम करके कमाने की कोशिश भी की. वह कहते हैं, “जो भी काम मिलता था करता था — पेड़ काटना, लकड़ी काटना, शहद इकट्ठा करना, पाची यानी लाइकेन जमा करना. कुछ दिनों में 1000 रुपये तक मिल जाते थे, लेकिन कमाई कभी नियमित नहीं रही.”
सामुदायिक कार्यकर्ता और सोलिगा समुदाय के पहले पीएचडी शोधकर्ता डॉ. सी. मादेगौड़ा कहते हैं, “युवा सोलिगा लोगों को बाहर काम नहीं मिलता. उनके पास दूसरे कौशल नहीं हैं और पढ़ाई भी नौकरी की गारंटी नहीं देती.”
मात्र 18 साल की उम्र में अरुण काम की तलाश में बाहर जाने लगे. पहले वह बेंगलुरु में निर्माण मजदूर के रूप में काम करने गए और बाद में कर्नाटक और केरल के कॉफी और काली मिर्च के बागानों में काम किया. फसल कटने के बाद वह मार्च-अप्रैल में गांव लौट आते थे.
इन्हीं महीनों में उनके गांव में शहद इकट्ठा करने का मौसम भी शुरू होता है.

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अरुण कहते हैं, “हर बार जंगल जाने पर छत्ते नहीं मिलते. और पूरे मौसम में रोज भी जंगल नहीं जाते. महीने में चार-पांच बार ही जाते हैं. सुबह हम करीब 15 किलोमीटर के दायरे में जाकर जेनु गुडु यानी मधुमक्खियों के छत्ते देखते थे, फिर घर लौट आते और शाम को शहद निकालने वापस जाते. लेकिन कई बार हम जंगल के और भीतर चले जाते थे और दो-तीन दिन का खाना साथ ले जाते थे.”
उनकी कमाई इस बात पर निर्भर करती थी कि कितने और कितने बड़े छत्ते मिलते हैं. एक बार में वे 60 से 70 किलो तक शहद इकट्ठा कर लेते थे. घर लौटने के बाद शहद को साफ कपड़े की जाली से छानकर डिब्बों में भरते थे. फिर इसे एक एजेंट को 200 से 300 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचते थे और पैसा आपस में बराबर बांट लेते थे.
अरुण उस हादसे वाले दिन को याद करते हुए कहते हैं, “मेरे साथ मेरे तीन दोस्त थे. गिरने के बाद मैंने उठने की कोशिश की. लेकिन मैं पीठ के बल जमीन पर गिरा था और दर्द असहनीय था. मेरी हड्डियां टूट गई थीं. मैं बिल्कुल हिल भी नहीं पा रहा था. रात हो चुकी थी, इसलिए मेरे दोस्त घंटों मेरे साथ वहीं रहे और जंगली जानवरों से बचने के लिए आग जलाकर बैठे रहे. सुबह गांव के लोग आए और फिर एंबुलेंस से मुझे अस्पताल ले जाया गया.” यह अस्पताल पास का विवेकानंद ट्राइबल हेल्थ सेंटर यानी वीटीएचसी था.

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उनके पिता कहते हैं, “उस सुबह से अब तक अस्पतालों के चक्कर ही लग रहे हैं.” वीटीएचसी के डॉक्टरों ने पाया कि अरुण की कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह बेकार हो गया है. उनकी रीढ़ की हड्डी को गंभीर नुकसान पहुंचा था. एम. सन्नरंगे गौड़ा कहते हैं, “उन्होंने हमें चामराजनगर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी सीआईएमएस भेज दिया. वहां डॉक्टरों ने कहा कि हड्डी फंस गई है और ऑपरेशन करना पड़ेगा. एक नस भी कट गई थी. अस्पताल ने सारी रिपोर्ट अपने पास रख ली. हमें दवाइयां और इंजेक्शन दिए गए.”
सीआईएमएस में रीढ़ की टूटी नली को ठीक करने और नसों को और नुकसान से बचाने के लिए सर्जरी के बाद अरुण को फिर वीटीएचसी लाया गया. वहां अस्पताल के कर्मचारियों ने उनके परिवार के लोगों, जिनमें उनकी युवा पत्नी भी शामिल थीं, को उनकी देखभाल करने का प्रशिक्षण दिया.

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उनकी शादी को सिर्फ छह महीने हुए थे, जब यह भयानक हादसा हुआ. अरुण की 45 वर्षीय मां मसनम्मा कहती हैं, “उसकी पत्नी पूरी तरह उसकी देखभाल करती थी, जब तक कि…”वह वाक्य पूरा नहीं कर पातीं. वह आगे कहती हैं, “हम पूरा दिन जंगल में रहते हैं. वह घर पर रहता है, मोबाइल देखता रहता है. पहले जैसे दोस्त भी अब मिलने नहीं आते. उसे ऊब होती है, वह खुद को लाचार महसूस करता है. मैं कुछ कर नहीं सकती. बस चिंता करती हूं.”
अरुण कहते हैं, “मुझे नहीं पता डॉक्टरों ने मेरे माता-पिता से क्या कहा. मुझसे उन्होंने कहा था कि मैं फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो सकता हूं. उन्होंने मुझे चलने की कोशिश करने को कहा. लेकिन सहारा देने वाला कोई नहीं था, इसलिए मैंने कोशिश ही नहीं की.” उनकी उंगलियां व्हीलचेयर के बाएं हिस्से पर रखे कैथेटर बैग की प्लास्टिक नली से खेलती रहती हैं.
सर्जरी के कुछ समय बाद ही अरुण को पेशाब रुकने की समस्या हो गई. वीटीएचसी के डॉक्टरों की कोशिशें इसे ठीक नहीं कर सकीं. उनके निचले पेट में दर्द के साथ एक उभरी हुई सूजन महसूस होने लगी. जून 2024 में फिर से अस्पतालों के चक्कर शुरू हुए. पहले सीआईएमएस और फिर मैसूर के के. आर. अस्पताल के एक यूरोलॉजिस्ट के पास ले जाया गया, जहां आगे की जांच के लिए उन्हें भर्ती किया गया और पांच दिन बाद छुट्टी दी गई.

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जुलाई और अगस्त भर यह समस्या बार-बार लौटती रही. हर बार अरुण को मैसूर में एक यूरोलॉजिस्ट की देखरेख में कुछ दिनों के लिए भर्ती करना पड़ता था. कई बार उन्हें संक्रमण हो जाता था, जिसके लिए एंटीबायोटिक दवाएं देनी पड़ती थीं. कभी-कभी उनका ब्लड प्रेशर भी बढ़ जाता, जिसके लिए चिंता कम करने की दवाएं देनी पड़ती थीं. उनकी देखभाल करना और मुश्किल होता गया.
अरुण के पिता कहते हैं, “पेशाब की समस्या शुरू होने के बाद हमें कई बार मैसूर जाना पड़ा. सरकारी अस्पतालों में इलाज मुफ्त है, लेकिन चामराजनगर तक जाने के लिए वाहन 3,000 रुपए लेते हैं और मैसूर जाने के लिए 5,000 रुपए. इसके अलावा खाने और ठहरने का खर्च अलग. हर यात्रा में कम से कम 10,000 रुपए खर्च हो जाते हैं.”
डॉ. मादेगौड़ा कहते हैं कि अरुण जैसे लोगों के लिए सरकार बहुत कम करती है. “अगर किसी को बाघ मार दे या हाथी हमला कर दे, तो लगभग 20 लाख रुपए तक का मुआवजा मिलता है. लार्ज एरिया मल्टीपर्पज सोसाइटीज भी गंभीर दुर्घटनाओं और स्वास्थ्य समस्याओं के लिए बीमा योजनाएं देती हैं. लेकिन अगर शहद इकट्ठा करते समय कोई पेड़ से गिर जाए तो न बीमा मिलता है, न मुआवजा.” बिलिगिरी रंगन की पहाड़ियों से लेकर देश भर के उन सभी आदिवासी समुदायों को ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जो अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं. “अरुण से पहले केरेडिम्ब पोडु का एक लड़का भी पेड़ से गिर गया था और उसका पैर कट गया.” सहकारी समिति कभी-कभी 2000 से 3000 रुपए तक की मदद देती है, लेकिन इतने पैसे में गुजारा संभव नहीं होता.

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उनके पिता कहते हैं, “डॉक्टर अरुण की समस्या को सिर्फ आंशिक रूप से ही ठीक कर पाए. के. आर. अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा है कि उसे बड़े अस्पताल में इलाज की जरूरत है. लेकिन हमारे पास पैसे नहीं हैं. अब वीटीएचसी का एक डॉक्टर हर तीन महीने में आकर बिना पैसे लिए उसका कैथेटर बदल देता है. जब गंभीर रुकावट हो जाती है, तो हमें चामराजनगर जाना पड़ता है.”
अरुण की जिंदगी की रोजमर्रा की लय अब पूरी तरह टूट चुकी है.
अरुण कहते हैं, “मैं सुबह से यहीं बैठा रहता हूं. कभी-कभी अपनी कुर्सी को मुख्य दरवाजे तक खींच ले जाता हूं या थोड़ी देर धूप में बैठता हूं. फिर वापस कमरे में आ जाता हूं. पहले सब लोग एक साथ मुख्य घर में रहते थे. इस चोट के बाद कोई नहीं. मैं मोबाइल पर कुछ न कुछ देखता रहता हूं. यह कमरा पहले से बना हुआ था. मैंने सोचा था यहां रहूंगा, तो आना-जाना आसान होगा. लेकिन सहारा देने वाला कोई नहीं है. मुझे अपनी यह हालत अच्छी नहीं लगती.”
अरुण कहते हैं, “मेरी पत्नी भी मुझे छोड़कर चली गई. वह मेरी पूरी देखभाल करती थी. लेकिन जब मेरी हालत में सुधार नहीं हुआ, तो वह चली गई. एक बार उसने फ़ोन करके कहा था कि ‘जब तुम ठीक हो जाओगे, तब मैं वापस आऊंगी.’ उसे गए तीन महीने हो चुके हैं.” यह कहते समय अरुण की आवाज उतनी ही धीमी और नाजुक लगती है जितना उनका शरीर.

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अरुण की मां कहती हैं, “मैं उसे नाश्ता और खाना देती हूं. मैं ही उसे नहलाती भी हूं. अगर उसे शौच जाना होता है, तो उसके पिता संभालते हैं.” कमरे में वयस्कों के लिए इस्तेमाल होने वाले डायपर का एक पैकेट टंगा दिखता है. उनके पिता कहते हैं, “इस पर हर महीने करीब 1500 रुपये खर्च हो जाते हैं.”
“उसकी बहनें दिन में 5-10 मिनट उससे बात कर लेती हैं, उन्हें कॉलेज का काम भी रहता है.” उनकी मां थोड़ी देर रुककर कहती हैं, “हम बस इतना चाहते हैं कि वह थोड़ा चल-फिर सके और खुद अपना काम कर सके.”
उनके पिता जल्दी से कहते हैं, “इसके लिए बड़े अस्पताल में इलाज जरूरी है.”
वह कुछ कठोर स्वर में कहती हैं, “अब मैं उसे फिर अस्पताल में भर्ती नहीं कराऊंगी. पिछली बार भी कुछ नहीं बदला. मैं फिर से वही सब करने के लिए तैयार नहीं हूं.”
गौड़ा समझाने की कोशिश करते हैं, “मेरी पत्नी को अस्पताल पसंद नहीं, इसलिए वह…”

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मसनम्मा उनकी बात पूरी होने से पहले ही कहती हैं, “वहां उसकी देखभाल कौन करेगा? कोई नहीं. अगर हम वहां जाएं, तो यहां का काम देखने वाला भी कोई नहीं रहेगा. हम ऐसा नहीं कर सकते. हमारे लिए यह बहुत मुश्किल है.” इतना कहकर वह अचानक उठती हैं और बागान के काम में लगने के लिए चली जाती हैं. शायद अपने काम में वह अपने दुख से थोड़ी राहत ढूंढ़ती है.
अरुण अब काम पर लौट नहीं सकते. उन्हें इंतजार करना पड़ता है. किसी के उनकी मदद करने का इंतजार. समय के बीतने का इंतजार.

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मार्च आते ही जामुन के पेड़ों पर फिर फूल खिलेंगे. भारतीय चट्टानी मधुमक्खियां (एपिस डोर्सोटा) उनके हल्के पीले सुगंधित फूलों के रस की तलाश में इन पहाड़ियों पर लौट आएंगी, जो मौसम के हिसाब से अपने प्रवास की जगह बदलती हैं. बीआर हिल्स के जंगलों में एक और शहद इकट्ठा करने का मौसम शुरू होगा. अरुण के युवा दोस्त फिर ऊंचे पेड़ों की ओर बढ़ेंगे. और जंगल में एक बार फिर ‘जेनु कुइयो हाडु’ की गूंज सुनाई देगी:
पुकारो, उसे पुकारो, ओ पुकारने वाले…
उस घने जंगल के राही को पुकारो…
छत्तों में शहद भरा है...
छत्तों में शहद भरा है...
छत्तों का शहद, है गाढ़ा शहद...
छत्तों का शहद, है गाढ़ा शहद...
पुकारो, उसे पुकारो, ओ पुकारने वाले…
अरुण तब भी यह गीत नहीं जानते थे, और अब तो वह इसे गा भी नहीं पाएंगे.

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लेखिका इस कहानी को लिखने में मदद करने के लिए अरुण और उनके परिवार का धन्यवाद करती हैं. इसके साथ ही डॉ. तान्या शेषाद्री, डॉ. संगीता वी, सोलिगा समुदाय के कार्यकर्ता करन केतेगौड़ा, विवेकानंद गिरिजन कल्याण केंद्र बीआर हिल्स और इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ बेंगलुरु की महादेवम्मा कुंबेगौड़ा और डॉ. प्रथमेश का भी आभार व्यक्त करती हैं. साथ ही कहानी लिखने के दौरान अनुवाद में मदद करने के लिए डॉ. शोभना किरण, शंकर केंचनूर और दीपा को भी धन्यवाद देती हैं.
अनुवाद: प्रतिमा
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