कट्टिले कडा मं पहिला ग्राहेक हबरे के पहिलीच, जंगल मं दिन सुरु हो चुके हवय.
बिहान के अंजोर होतेच,ससिकुमारी कानी अऊ आने माईलोगन मन तिरुवनंतपुरम जिला के विथुरा-पेप्पारा बांध वाले रद्दा ले उतर के जंगल डहर निकर जाथें. ये आदिवासी पारा मन के निचला मैदानी इलाका आय.
वो मन अपन मुड़ मं लकरी के गठ्ठा धरे लहूटथें. तभेच रसोई खुलथे. ‘कट्टिले कड़ा’ के शाब्दिक अर्थ आय —‘जंगल मं दुकान’.
रोड तीर मं नानकन होटल के भीतरी, करिया परे बरतन मन के उपर ले धूँआ/ धूँवा उपर निकरत हवय. कोनहा मं बिन बउरे गैस सिलेंडर रखाय हवय. ओकर भरई ह घलो बखत मं नइ होवय, दाम ह बढ़गे हवय, अऊ मिले के घलो कोनो भरोसा नइ ये.
“अब हमन गैस के भरोसे नइ रहे सकन, 49 बछर के ससिकुमारी कहिथे. “ते पायके हमन पहिली मं लहूट आय हवन.”
पूरा केरल भर मं, अमेरिका-इजरायल अऊ ईरान के लड़ई ले लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के सप्लाई मं जेन अड़ंगा आवत हवय, ओकर ले छोटे-छोटे होटल अऊ खवई-पियई के ठेला मन भारी हलाकान हवंय.गैस मिले मं देरी अऊ बढ़त दाम के सेती अब कतको झिन लकरी चुल्हा बउरे बर मजबूर होवत हवंय.
कट्टिले कडा मं, ये बदलाव ह जम्मो दिनेच ला नवा ढंग ले गढ़ ले हवय.
ससिकुमारी ह चार बछर पहिली ये होटल ला तब सुरू करिस, जब ओकर घरवाला 58 बछर के मनियन बीमार पर गे अऊ मिहनत के बूता करे नइ सकिस. कानी समाज – जेन ह दक्खिन-पच्छिम घाट के बासिंदा छोटे आदिवासी समाज आंय अऊ जंगल ले वो मन के गहिर ले नाता हवय- के ससिकुमारी ह इहीच का ला धरिस जेन ला वो ह सबले बढ़िया जानत रहिस: अपन खेत के उपज ले बने खाय पीये के जिनिस.
एकीकृत जनजातीय विकास कार्यक्रम के मदद अऊ ‘कुडुम्बश्री' के जरिया ले लेगे करजा ले, ये माइलोगन मन आमदनी के एक जरिया बनाय बर रोड तीर मं एक ठन नान-कन रसोईघर बनाइन. कोविड-19 लॉकडाउन बखत, 'कुडुम्बश्री' के ये 'होटल' मन कतको लोगन मन के गुजारा मं मदद करिस.






