ये साल 1989 के बात आय. मंय 8-9 बछर के रहे होहूँ. आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिला के मोर गांव कोलकलूरु मं दुदेकुला मुस्लिम समाज के दू झिन बहिनी, जेन मन के उमर करीबन 40 बछर के रहिस, तुरते टोरे फूल के माला बेचत रहिन. एक ह दुब्बर अऊ ठिगनी रहिस, दूसर लंबी अऊ मोठ. मोला ओखर मन के नांव सुरता नइ ये. मंय वो मन ला पिन्नी (छोटे काकी) कहंव अऊ वो मन मोर दाई ला अक्का (दीदी) कहंय. मोर बबा ह वो मन ला अपन स्कूल मं पढ़ाय रहिस जब वो मं कुछु बखत स्कूल मं भर्ती होय रहिन. हो सकत हे, ते पायके वो मन हमर परिवर ला बनेच भावत रहिन.
वो बखत हमन ला मल्लेपूलू (चमेली) सिरिफ घामेच मं मिलत रहिस. बाकि बखत वो मन चेमंतीपूलू (सेवंती), बेंटी (गेंदा) अऊ कारब्बंतुलू (चन्देनी गेंदा) के माला बनावंय. उधरे जुन्ना लुगरा पहिरे, हाथ मं लटके बांस के टुकना मं रंग-बिरंगा, आनी-बानी के फूल के माला धरे, वो मन तुरते टोरे फूल मन के नांव लेके नरियावंय. मल्लेपूलू, चेमंतीपूलू, कागडालू, कारब्बंतुलू ...
वो बखत रहिस जब घाम के छुट्टी मं मोटीयारिन मन अपन जुड़ा मं सुग्घर माला पहिरे दिखंय. जब घलो कोनो खास डोंटारा माले (बट मोंगरा) फूलय, त पिन्नी वोला खसकरके मोर बर लावत रहिस, आने ग्राहेक मन ला लुकाके, अऊ सब्बो तुरते टोरे पुरइन धन केरा के पत्ता मं लपेटे रहंय.
ये बखत दोंतरमल्ली (बट मोंगरा) बछर भर फुलथें, फेर मोटीयारिन मन ला जूड़ा मं गजरा लगाय नइ भावय. अऊ अब गली-मुहल्ला मं फूल बेचेइय्या मालिन घलो नजर नइ आवंय.
हमर करा कतको एप हवय, नोटिफ़िकेशन हवंय, घर के मुहटा तक लवेइय्या कंपनी मन हवंय, फेर वो आवाज मन नंदागे जेन मन हमन ला नांव धरके बलावत रहिन अऊ रद्दा मं हमर महतारी भाखा गूँजत रहय – न बउवा, न चिन्ना. सुविधा बढ़गे हवय, फेर हमर सब्बो सुरता मन बिसरत जावत हवंय.