1980 के बात बा, तब हम बहुते छोट रहीं, इहे कोई आठ नौ बरिस के रहल होखम. आंध्र प्रदेस के गुंटूर जिला में तेनाली (तालुका) के हमार गांव कोलकलूरु में दु ठो मुस्लिम बहिन लोग के घर रहे. एगो खूब दुब्बर-पातर आउर छोट आ दोसरकी लमहर आ बरियार कद-काठी वाली रहस. ऊ लोग मौसमी फूल आ ओकरा से माला बना के बेचत रहे. हमरा केकरो नाम नइखे इयाद. बाकिर हम ओह लोग के ‘पिन्नी’ (माई के छोट बहिन, यानी मौसी) बोलावत रहीं. लरिकाई में ऊ लोग हमार नाना से पढ़ल रहे, एही से हमार परिवार के बहुत मानत रहे आउर हमार माई के ‘अक्का’ (बड़ बहिन) कहत रहे.
तवन जमाना में चमेली खाली गरमिए में फुलात रहे. बाकी मौसम में ऊ लोग चेमंतीपूलू (गुलदाउदी), बंटी (गेंदा) आ कारब्बंतुलू (फ्रेंच गेंदा) के फूल से माला बनाके बेचत रहे. फूल के ऊ लोग आपन कोहनी में बांस के टोकरी में लटका लेवे आउर घूम-घूम के पुकारे, “मल्लेपूलू, चेमंतीपूलू, कागडालू, कारब्बंतुलू.”
गरमी के छुट्टी होखे, त लइकी लोग फूल के सुंदर-सुंदर चोटी, चाहे पूला जड़ा बनावत रहे. जब भी दोमतरमल्ला (कोमल दोहरा पंखुड़ी वाला अरबी चमेली) खिले, हमार पिन्नी लोग ओकरा हमरा ला बचाके रखे आउर कमल चाहे केला के ताजा पत्ता में लपेटके चोरा के लाके देवत रहे. जड़ा मोग्गा बहुत पसंद कइल जात रहे, बाकिर ई जादे मिलत ना रहे.
आजकल त दोमतरमल्ला (चमेली) के फूल हर सीजन में मिल जाला. बाकिर अब लइकी लोग के बाल में चमेली के वइसन गजरा सजल ना दिखे. गलियन में आवाज लगावे वाली फूलवालियो लोग ना मिले.
आज त ऐप बा, नोटिफिकेशन बा, ब्लिंकिट बा. बाकिर नाम लेके बोलावे वाला ऊ पुकार नइखे, जे हमनी के मातृभाषा के रोज जिंदा रखत रहे. सामान दरवाजा पर पहुंच जाला, पर आवाज ना आवे. न “बउआ”, न “चिन्ना”. सहूलियत बढ़ गइल, बाकिर लोक-स्मृति धुंधलात जा रहल बा.