“आइए, आइए! यहां बैठिए,” 45 वर्षीय नंदू पाल फर्श पर सफ़ेद कंबल को बिछाते हुए मेरे बैठने के लिए जगह बनाते हैं. यह कंबल भेड़ के ऊन की है. गडेरी समुदाय से ताल्लुक़ रखते हैं, जो पारंपरिक रूप से भेड़ पालन के लिए जाने जाते हैं और वे राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में सूचीबद्ध हैं. वह समझाते हैं, “ये आपको गर्मियों में ठंडा और सर्दियों में गर्म रखता है. इतना ही नहीं, ये आपको बरसात में भी सुरक्षा देता है.”
सिर्फ़ इसके व्यावहारिक उपयोगों तक सीमित न रहते हुए, वह आगे कहते हैं, “इसे राजाओं और सम्राटों ने सम्मान दिया है. और यही तो उच्च पुरोहितों का आसन है; इसे शुभ माना जाता है; लेकिन ये परंपरा अब ग़ायब हो गई है.”
यहां शिपुर गांव में नंदू पाल के पास देशी छोटा नागपुरी नस्ल की 650 भेड़ें हैं, जो उस वक़्त वहीं हमारे आसपास मैदान में चर रही थीं. नंदू का परिवार पिछले पांच पीढ़ियों से भेड़ें चराता आ रहा है, और वह इस काम को बहुत गंभीरता से लेते हैं. वह दातुन (दांत साफ़ करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी की टहनी) चबाते हुए कहते हैं, “आप इन्हें एक मिनट के लिए भी अकेला नहीं छोड़ सकते. अगर ज़रा भी लापरवाही की, तो कुत्ते हमला कर देंगे या फिर भेड़ें किसी के खेत में घुस जाएंगी.”


















