नंदू पाल कंकारी गांव के कुछ गिनल-चुनल चरवाहा में से बाड़न. ई गांव पलामू के चैनपुर ब्लॉक में आवेला. पूरा झारखंड में छव लाख से बेसी भेड़ (2019), 88 लाख से बेसी जनावर आ एक करोड़ दस लाख गाय-गोरू सब बा. सभे के चरे के जगह एके बा.
“कवनो-कवनो दिन त घास के मैदान खातिर 12-13 कोस (मोटा-मोटी 40 किमी) भटके पड़ेला,” पाल के चचेरा भाई रामरती बतइलन. “पहिले दोहर में घास सब अफरात होखत रहे, जइसे के मगर घास आ डंठल सब. बाकिर अभी देखीं, सब गायब हो गइल बा,” ऊ इहो कहलन. मगर घास एह इलाका के दोहर (ताल-तलैया) किनारे गील माटी में खूब उगे वाला मोट आ खुरदुरा घास बा. पालतू जनावर सब इहे खाला. ई खाली गीले माटी में होखेला. बाकिर अब ताल-तलैया सूखला से ई घासो नइखे देखाई देत.
अब त खेतो-खलिहानो में जनावर सब के चरे खातिर जादे कुछ नइखे उगत. पहिले चना (बूंट) आ चकवड़ के पात (सेन्ना ओबटुसिफोलिया) खेत में उगावल जाए आउर एक बिया सब जनावर सब खातिर खेत में छोड़ देवल जाए. अब ई सब दुर्लभ हो गइल बा, काहेकि किसान लोग ई सब फसल अब ना उगावे. एकरा जगह अब त खाली मकई, धान, गेहुंए बोआ रहल बा, जे चराई खातिर कुछो ना छोड़े. नंदू बतावत बाड़न, “भेड़न के अब सही पोषण वाला खाना नइखे भेंटात. अब त बस तनी दूब वाला घास (साइनोडोन डैक्टिलॉन), आ तनी-मनी सवाना घास नजर आवेला.”
इलाका में दू बरिस (2022 आ 2023) सूखा पड़े से इहंवा के ताल-तलैया में पानी खतम हो गइल, गंदा धूर बन के उड़े लागल. कवनो-कवनो जलस्रोत में त कादो भर गइल. पछिला दस बरिस में पानी के बहुते सोता सूखत देख चुकल नंदू कहेलन, “भेड़ के जिंदा रहे खातिर साफ पानी चाहीं.”
पछिला बरिस के अकाल में, “हमनी के हिम्मत टूट गइल. दिन भर चरला के बादो भेड़ सब के पेट ना भरत रहे,” नंदू ऊंच आवाज में बोललन. तनी देर रुकला के बाद ऊ फेरु कहलन, “पछिला बरिस (2023) हमरा 20 ठो भेड़ के नुकसान हो गइल.”
तनिए दिन पहिले, नंदू आउर उनकर संगी-साथा लोग आपन भेड़ के न्यूमोकोकल रोग से बचावे खातिर टीका लगावे ले गइल रहे. ऊ लोग बतइलक कि पिए खातिर साफ पानी ना मिले से भेड़न के ई जानलेवा रोग हो जाला.